मौसम की बदलाव या मन की मनोदशा
कविता
मुझे
शाम के मौसम सबसे ज्यादा पसंद है
पर पता नहीं क्यों
अब यही शाम मुझे शांत लगता है
सुन्नतों से भरी हुई प्रतीत होता है
आसमान में चमकती हुई लाल रोशनी नहीं है
और लगता है
समय बीत रहा है पर हवाई ठहर चुकी है
नहीं पता यह मौसम की बदलाव से हुआ
यह बदलाऊ महसूस हो रहा है
ऐ यह मेरी मनोदशा है
जो अब बदल चुका है
वह शाम जो मुझे नायाब लगता था
जिसमें खो जाने का मन करता था
वह एकदम से शांत लगता है
जैसे अकेलापन जैसे इस अकेलेपन में समय रुक गया हो
कुछ चहल-पहल नहीं कोई हरकत नहीं
बस है गहरी खामोशी
और उदासी
जिसे देखकर मुझे खुशी बिल्कुल महसूस नहीं होती
ऐसा लगता है
कि
कोई कहानी नहीं है
सब कुछ खत्म हो गया है
बस इस गहरे सन्नाटे मे
बस समय ठहर गया है
यहां कोई दुख भी नहीं है
बस उसे देखकर दुख महसूस होता है
जैसे कि सब कुछ बदल गया हो
या तो कुछ भी नहीं है
और इस बदली हुई शाम को देखकर मन में हजारों सवाल है
क्या सच में मौसम के बदलाव है या
मेरे मन के मनोदशा
मैं नहीं समझ पा रही
आखिर में सच क्या है