“माँ का बचपन ……”
एक दिन मैंने माँ से पूछा,
"माँ... मैं कब बड़ी होऊंगी?"
माँ ने ऐसे देखा,
जैसे मैंने उनकी सबसे प्यारी चीज़ माँग ली हो।
वो बोलीं,
"काश मैं तेरी उम्र की घड़ी रोक देती।
तू बस गिरती, रोती, और फिर हँस देती।"
मैंने कहा,
"मैं बड़ी होकर तुम्हारी जैसी बनूंगी।"
माँ की उँगलियाँ रुक गईं।
वो धीरे से बोलीं,
"मेरी जैसी बनने की दुआ मत माँगना।
मुझे बड़ा नहीं किया गया...
बड़ा कर दिया गया।"
वो बोलीं,
"लड़की का बचपन शोर नहीं करता।
पहले गुड़िया छूटती है,
फिर ज़िद,
फिर हँसी।
और एक दिन खुद को भी याद नहीं रहता
कि आखिरी बार बिना वजह कब हँसी थी।"
मैंने पूछा,
"क्या बड़ा होना इतना दुख देता है?"
माँ बोलीं,
"नहीं।
दुख उस दिन है
जब तुम अपने अंदर की बच्ची की आवाज़ सुनना बंद कर दो।
जब झूला बच्चों की चीज़ लगे,
बारिश बीमारी लगे।"
आखिर में उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा,
"औरत बन जाना...
पर इतनी मत बदलना
कि तेरे भीतर की बच्ची
तुझे पहचानना छोड़ दे।"
प्राची गुर्जर…….