Hindi Quote in Poem by prachi Gurjar

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"मैं और मेरे अक्षर”…….

आईने से डरती हूँ मैं, वो सच दिखा देता है,  
मैं तो वो हूँ जो लफ़्ज़ों में ख़ुद को छुपा लेता है।


मैंने कभी देखना नहीं चाहा ख़ुद को दर्पण में…  
मेरी आँखों के कोर पर काजल टिकता नहीं,  
माथे पर बिंदी का बोझ उठता नहीं,  
नहीं चाहिए मुझे खन-खनाती चूड़ियों का श्रृंगार…  
मेरा शोर तो मेरे अक्षरों के पार है।

मैं अक्सर बह जाती हूँ स्याही की नदी में,  
अक्षर से भाषा, भाषा से वेदना की गहराई में।  
मेरा जी अटका है एक अजीब तड़पन में…  
जिसे न गहने चाहिए, न डोली का क़रार,  
बस चाहिए एक कोना किताब के हाशिये का उधार।

लोग कहते हैं “औरत हो, सँवर जाओ”,  
मैं कहती हूँ “शब्द हूँ, बिखर जाओ”।  
मेरी माँग का सिंदूर कविता की सुर्ख़ लकीर है,  
मेरा गजरा ग़ज़लों की महकती तहरीर है।

रात जब दुनिया सोती है, मेरी क़लम रोशन होती है,  
मेरे ख़्वाब पाँव में पायल नहीं,  
नज़्मों की पाज़ेब पहन कर जागते हैं।  
मेरा आँचल शब्दों से सिला है,  
मेरी मेहंदी अख़बार की सुर्ख़ियों से रची है।

मुझे दुनिया से नहीं, ख़ुद की परछाईं से पर्दा है,  
क्योंकि दर्पण में सिर्फ़ जिस्म उतरता है 
और मैं तो रूह की इबारत हूँ।  
मैं प्रेमचंद के पन्नों की कोई थकी हुई औरत हूँ,  
महादेवी के आँसू से भीगी कोई प्रार्थना हूँ,  
अमृता के ख़त की आख़िरी अधूरी सतर हूँ।

मेरी तड़प न मायके की देहरी की है, न ससुराल की दीवार की,  
मेरी तड़प उस सुबह की है 
जहाँ औरत को पढ़ने से पहले नापा न जाए,  
जहाँ उसके क़लम की नोक को उसके गहनों से पहले सराहा जाए।

तो रहने दो मुझे यूँ ही बे-रंग, बे-साज़…  
बिना काजल, बिना बिंदी, बिना चूड़ियों के अल्फ़ाज़।  
मैं ख़ामोश सही, मगर मेरे हर लफ़्ज़ में इनक़लाब है,  
मैं तन्हा सही, मगर मेरी किताबों में पूरा हिसाब है।

प्राची गुर्जर…..

Hindi Poem by prachi Gurjar : 112029208
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