"अधूरा भी पूरा है"
क्या ज़रूरी है कि जो शुरू किया उसे पूरा करना ही है…
क्या हम कुछ अधूरा नहीं छोड़ सकते?
कोई रास्ता, कोई याद, कोई सपना, कोई किताब…
क्या होगा अगर कुछ बात बीच में ही रह जाए तो?
क्या हर नदी का समंदर तक जाना ज़रूरी है?
क्या हर चाँद का पूरा गोल दिखना ज़रूरी है?
अगर कोई गीत बीच में ही रुक जाए,
तो क्या वो कम सुंदर लगेगा?
देखो तो सही…
भगवान ने भी दुनिया पूरी नहीं बनाई।
कहीं पहाड़ आधे, कहीं नदियाँ प्यासी,
कहीं धूप कम, कहीं छाँव उदास।
उसने चाँद पर भी दाग छोड़ दिया,
शायद इसलिए कि कमी में भी खूबसूरती होती है।
हम क्यों डरते हैं अधूरेपन से?
अधूरी बात में ही तो फिर मिलने की आस होती है।
अधूरी किताब में ही तो नया सपना पलता है।
अधूरे रास्ते में ही तो लौट कर आने का मन करता है।
जो पूरा हो गया, वो कहानी बनकर खत्म हो जाता है,
पर जो अधूरा रह गया, वो साँस बनकर चलता रहता है।
पूरा होना मतलब रुक जाना है,
अधूरा होना मतलब चलते रहना है।
तो रहने दो कुछ बातें अनकही,
कुछ रास्ते बिना मंज़िल, कुछ सपने बिना रंग के।
शायद भगवान ने भी हमें अधूरा बनाया है…
ताकि हम एक-दूसरे से जुड़ कर
उसकी दुनिया को पूरा कर सकें।
प्राची गुर्जर…..