मैं और मेरे अह्सास
औरत एक साहस
औरत एक साहस और निगाहें उस की l
घायल कर देती तिरछी निगाहें उस की l
जब मौन व्रत ले लेती है वो सब कुछ तो l
ख़ामुशी बहुत सना देती बातें उस की ll
बस उसकी एक आँख ही काफी है सखी l
ममता का धोध बरसाती आँखें उस की ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह