तुम हवा से बने एक साए हो,
एक सपना जो मेरे मन में बहता रहता है,
मैं अँधेरे में अपने हाथ बढ़ाती हूँ,
पर तुम वही हो जिसे मैं छू नहीं पाती।
दूरी एक अथाह सागर-सी फैली है,
खामोशियों का अनंत विस्तार,
और मेरे पास बस शब्द ही रह जाते हैं,
तुम्हारे चेहरे की रेखाएँ बनाने के लिए।
मैं तुम्हें कैसे छूऊँ?
काश मैं अपने ख़यालों को पत्थर बना पाती,
या तारों की चमक से एक पुल बना पाती,
तो रात की सारी सीमाएँ पार कर
तुमसे अपने सपनों में मिल आती।
लेकिन मेरी उँगलियाँ सिर्फ़ हवा को छूती हैं,
और तड़प इन दूरियों को मिटा नहीं सकती,
मैं एक जमी हुई स्क्रीन के पीछे कैद हूँ,
घंटों और मीलों को गिनती हुई।
मैं तुम्हें कैसे छूऊँ?
शायद जो हवा मुझे छूकर गुज़रती है,
वह तुम्हारे गालों को भी सहला चुकी हो,
शायद मेरी हथेली पर उतरती चाँदनी
वही रोशनी हो जो तुम्हारे आसमान को भी छूती हो।
जब तक ये दूरियाँ मिट नहीं जातीं,
जब तक ब्रह्मांड हमें एक नहीं कर देता,
मैं अपने हर शब्द से तुम्हारे दिल को छूती रहूँगी,
और इन पंक्तियों के बीच तुम्हें अपने पास संजोए रखूँगी। 🤍🩶🖤