अब न कोई शिकायत है, न तुमसे कोई उम्मीद बची है,
मेरी रूह ने अब तुम्हारे ख़यालों से भी, दूरी चुन ली है।
तुम बेवफा नहीं थे, शायद बस मेरी पसंद में ही गलती थी,
पर उस गलती को सुधारने की, अब मुझमें हिम्मत जागी है।
मैं उस आईने को अब तोड़ दूँगी, जिसमें तुम्हारा अक्स दिखता है,
उस रास्ते पर अब नहीं चलूँगी, जहाँ मेरा दिल ही सिसकता है।
मैंने खुद को बहुत छोटा किया, तुम्हारी दुनिया में फिट होने के लिए,
अब मैं उतनी बड़ी हूँ, कि मुझे तुम्हारे साये की ज़रूरत नहीं है।
जाओ, अब तुम आज़ाद हो, और मैं अपनी मंज़िल पर निकल पड़ी हूँ,
बीते हुए कल की राख को छोड़कर, मैं एक नई सुबह पर खड़ी हूँ।
तुम्हें नफरत नहीं, बस अब एक धुंधली याद बनाना है,
मुझे खुद से फिर से मिलना है, खुद को ही गले लगाना है। ( priya Chaudhary)