आशुतोष से रौद्र✨
तुम इतने ऊंचे हो कि मैं मौन हूँ,
उस ऊँचाई तक न पहुँचा, तो 'गौण' किया तुम्हें।
'गौण' स्वभाव नहीं तुम्हारा,
माया तुम्हारी है, और खेल भी तुम्हारा!
उपयोगी लगे तुम, तो घर ले आए,
नहीं लगे—तो विसर्जन के नाम पर फेंक आए।
तुम्हारी ही माया से, तुम्हारा मूल्य तय होता है;
नदी कब नाला बन गई, आराधना कब कर्मकांड,
और मूर्ति कब व्यापार बन गई?
मानव सभ्यता की विद्रूपताएँ ऐसे सामने आईं,
कि अब आना ही पड़ेगा तुमको!
आओ सुधार के लिए; रूप प्रलय का हो, तो भी ठीक है।
बजे डमरू, विध्वंस हो उस अहंकार का—
और उससे उपजे इस समस्त संसार का।
प्रलय अब नहीं, तो कब?
अहंकार अब बेहोशी की सीमा पार कर रहा है,
पंचभूतों पर भी अधिपत्य का प्रयास कर रहा है।
आओ महादेव! इनके कष्ट हरो,
तारो इन्हें और इस जग को भी।
तुम जिस भी रूप में आओगे, स्वीकार्य होगा हमें,
तुम जिस भी रूप में तारोगे, स्वीकार्य होगा हमें।
स्थिति वहीं है, जहाँ 'आशुतोष' की परिभाषा का अंतिम चरण—
और 'रौद्र' की परिभाषा का प्रारंभ है।
अब उठो समाधि से, अब विलंब ठीक नहीं;
बहुत सह लिया तुमने, और सहना अब ठीक नहीं।
मैं वरदान माँगता हूँ...
मैं विध्वंस माँगता हूँ!
~ कपिल तिवारी "यथार्थ"