मिले जो ज़ख़्म लफ़्ज़ों से, उन्हें आंखों से धो लेना,
मैं आँखों से कहूँ सब कुछ, तुम आँखों से ही सुन लेना।
न होंठों को हिलाने की ज़रूरत है यहाँ कोई,
मेरे दिल के हर इक किस्से को पलकों से ही बुन लेना।
ज़माना शोर करता है, मोहब्बत चुप ही रहती है,
खामोशी जो सुनाती है, वही तुम ख़्वाब चुन लेना।
हज़ारों लफ़्ज़ हारे हैं जहाँ इज़हार-ए-उल्फ़त में,
नज़र की गुफ़्तगू को तुम हकीकत का सकूँ देना।
मेरी ख़ामोश नज़रों में छिपी है दास्तां अपनी,
मैं आँखों से ही बोलूँगी, तुम आँखों से ही सुन लेना।