मै ओर मेरे संस्कार
मन तो करता है आग लगा दूँ उस समाज में,
जहाँ सच बोलना भी अब बगावत कहलाता है।
गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं किसी में,
हर चेहरा यहाँ मुखौटा बन जाता है।
जख्म इतने गहरे हैं कि अब दर्द भी चुप है,
सब्र करते-करते दिल पत्थर सा सुन्न है।
हर बार खुद को ही समझाया मैंने,
पर अंदर का तूफान आज भी उतना ही प्रचंड है।
रोका हुआ हूँ मैं, मेरे ही संस्कारों ने,
वरना जवाब देने का हुनर भी खूब आता है।
झुकना मेरी फितरत नहीं थी कभी,
पर अपनों के लिए खुद को हर बार रोक जाता हूँ।
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