मैं और मेरे अह्सास
निशाँ
कोशिशों के बाद भी हम ना छुपा पाये निशाँ ll
सिर्फ पानी की लकीरें थी हमारी राजदां ll
आँखों के रास्तों से निकले ओ पहुँचे दिल तलक l
भावनाओ का युगों से दूर फेला कहकशाँ ll
रोनके होती दिखावे की भरोसा मत करो l
बेतुकी सी राज ना आई मुझे रंगीनियाँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह