सदाबहार यादें।
तेरी ख़ामोशियों का असर कुछ यूँ था,
खुद से ही बेवजह बातें करते रहे हम।
नींद आँखों से रूठी रही सारी रात,
ख़्वाब तेरे ही हर पल सजाते रहे हम।
दिल की वीरानियों में धड़कनें तेरी,
जैसे कोई इबादत निभाते रहे हम।
तुम नहीं थे मगर हर तरफ़ थे तुम ही,
खुद को तेरी ही सौगात देते रहे हम।
वक्त ने हमको पत्थर बना तो दिया,
फिर भी आँसू बरसात सहते रहे हम।
तेरी यादों का मौसम न बदला कभी,
सर्द रातों में भी तड़पते रहे हम।
‘प्रसंग’ नाम लेकर तुझे पुकारा बार-बार,
ख़ुद को ही तेरी तन्हाई में सँवारते रहे हम।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर