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जिसने नहीं की कभी हमारी परवाह.. हमने तो बस की है उसी की परवाह..
हालात तो मजबूर करेंगे कि रो ले.. पर तुम सोचो कि कैसे खुश हो ले..
जो अंजाम की परवाह करता है वो कुछ नहीं करता है.. बस डरता है..
समझने को तो वो बहुत कुछ समझा.. पर जो समझना था वही नहीं समझा.. समय रहते वो समझा ही कहाँ मोहन.. वक़्त निकलने पर समझा तो क्या समझा..
सोचा था मोहन इस होली पर मैं उसको खूब दूंगा रंग.. मगर होली के पहले ही देखो वो कैसा दिखा गया है रंग..
थोड़ा सा ऐटिट्यूड़ लगा देता है तुम्हारी सुंदरता में चार चाँद.. हद से बढ़कर ये एट्टीट्यूड़ सुंदरता में लगा देता है ग्रहण..
आँखों से दूर हुआ पर दिल से ना हुआ दूर.. कोई काम तो मोहन तूने ढंग से किया होता..
मोहन कबहू ना कीजिये बेमेलों से मेल.. मेल जोल करके सदा ये कर जाते खेल..
वो मुझे ख़ास लगता भी तो कैसे मोहन.. भीड़पसंद था इसलिए वो भीड़ में खो गया..
मैं तो समझा था मोहन वो मेरा दर्द बाँट रहा है.. क्या ख़बर थी कि वो अपना वक़्त काट रहा है..
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