*॥ करुणा के कल्पतरु: महावीर ॥*
कुण्डलपुर के राजमहल में, करुणा का केतु लहराया,
सिद्धार्थ-त्रिशला के आँगन, अमृत-अंशु उतर आया।
त्याग दिया कंचन-काया को, कनक-मुकुट भी बिसराया,
अरिहंत हुए वे धीर वीर, जिसने निज आतम को पाया।
*अहिंसा का अलौकिक रूप*
अहिंसा उनकी ऐसी थी, ज्यों शशि की शीतल छाया हो,
प्राणी मात्र के प्रति मन में, बस ममतामयी माया हो।
पदचाप पड़े जिस धरती पर, वह भूमि भी पुलकित होती थी,
हिंसक पशुओं के नेत्रों में, अश्रु-माल पिरोती थी।
तप की ज्वाला में जलकर वे, कुंदन-सम चमक उठे ऐसे,
अंधियारे जग के जीवन में, सूरज संभल उठे जैसे।
*वाणी का सौंदर्य*
उनकी वाणी हितकारी थी, शहद-धार से मीठी थी,मित-भाषण का वह मर्म अनूठा, जीवन-कला की चिट्ठी थी।
बोल वही जो प्रिय लागे, और पीर पराई हर लेवे,
शब्द-बाण न चला कभी, जो अंतर-मन को जर देवे।वाणी में वीणा बजती थी, सत्य-सुधा झड़ती जिससे,
भटके हुए राही को भी, मंजिल मिल जाती तिससे।
*अंतिम संदेश और वंदना*
"जियो और जीने दो" का, मंत्र गूँजता अंबर में,
शांति-दूध की धार बही है, आज विश्व के अंतर में।
पंच महाव्रत के पथ पर, जो पग अपने धर देता है,
वह बाह्य जगत को छोड़, स्वयं को ईश्वर कर देता है।
नमन करे 'आशीष' उन्हें, जो ज्ञान-सिंधु के स्वामी हैं,
अहिंसा के उस महाप्रतीक को, जो अंतर्यामी हैं।
नमन करे 'आशीष' उन्हें...
एड.आशीष जैन
7055301422