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Sonu Kumar

Sonu Kumar

@sonukumai


अन्ना हजारे द्वारा चलाया गया आंदोलन महीनों तक चलाया गया और हिंसा की कोई घटना सामने नहीं आयी जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद सभी आंदोलन हिंसा उपद्रव और अराजकता से भरे हुए है, इसके पीछे तार्किक वजह क्या है?
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आन्दोलन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है :
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नेता निर्देशित केन्द्रीकृत आन्दोलन (Leader Guided Centralized Movement)
कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत आन्दोलन (Activist Guided DeCentralized Movement)
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(A) नेता निर्देशित केन्द्रीकृत आन्दोलन ( Leader Guided Centralized Movement ) : इस आन्दोलन के केंद्र में हमेशा एक नेता होता है। यह नेता ही इस आन्दोलन को लीड करता है। कभी कभी शीर्ष स्तर पर एक से अधिक यानी 10-15 नेता भी हो सकते है। किन्तु शीर्ष स्तर पर तब भी एक ही चेहरा रहेगा, और शेष सभी 10-15 नेता मानते है कि हम अमुक व्यक्ति के नेतृत्व में काम कर रहे है।
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इन 10-15 लोगो के इस झुण्ड के अलावा शेष लोग ब्रेन डेड होते है। नेता इन्हें जो निर्देश देगा ये भीड़ वैसा करेगी। ये भीड़ अपने नेता से प्रश्न नहीं करती, उसके किसी कदम का विरोध नहीं करती, उसकी आलोचना नहीं करती और पूर्ण रूप से आज्ञा का पालन करती है। उनकी इस आज्ञाकारिता को "एकता एवं अनुशासन" के आदर सूचक व्यंजक से संबोधित किया जाता है।
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इस प्रकार के आन्दोलन की बॉटम लाइन में कुछ कार्यकर्ता हो सकते है, जिनका दिमाग सक्रिय है, एवं वे पूरी तरह से सोच समझकर अमुक आन्दोलन का समर्थन कर रहे है। किन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि, तब भी इन्हें अपने विवेक से फैसला लेने की अनुमति नहीं होती है। इन्हें नेता द्वारा दिए गये निर्देशों का ही पालन करना होता है। यदि कोई कार्यकर्ता नेता की लाइन से अलग हटकर बात कहेगा तो उसे यह कहकर बाहर कर दिया जाएगा की, यह आदमी अनुशासित नहीं है और हमारी एकता भंग कर रहा है।
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चूंकि इस तरह के आन्दोलन का स्विच नेता के हाथ में होता है, अत: इसे खड़ा करना एवं तोडना बहुत आसान है। नेता को दबाने / मारने / खरीदने या इसी प्रकार का कोई समझौता करके आन्दोलन को आसानी से निपटाया जा सकता है। यदि ऐसे आन्दोलन की रिपोर्टिंग पेड मीडिया द्वारा की जा रही है तो इसका नियंत्रण पेड मीडिया के पास रहता है। पेड मीडिया यदि आन्दोलन को रिपोर्ट करना बंद कर देगा तो आन्दोलन टूटने लगेगा और कुछ ही दिन में ढह जाएगा।
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दुसरे शब्दों में, इस तरह के आन्दोलन में एक हाथी होता है, जिसके पीछे 1 लाख बकरियां खड़ी होती है। बकरियों का कहना होता है कि, हमारी जगह पर ये हाथी सोचेगा और हाथी जैसा करने को कहेगा हम वैसा करेंगे। इस तरह एक लाख के इस झुण्ड में सिर्फ एक दिमाग है। इससे प्रतिद्वंदी का काम आसान हो जाता है।
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अब पूरे झुण्ड को ब्रेन डेड करने के लिए उसे सिर्फ एक गोली चलानी है। वह जैसे तैसे हाथी को कंट्रोल कर लेगा या हाथी को गोली मार देगा। हाथी के मरने के साथ ही, बकरियों में अफरा तफरी मच जाएगी, और आन्दोलन टूट जाएगा। अब बकरियों को नहीं पता कि आगे क्या करना है। अब ये बकरियां तब तक किसी बाड़े में बैठी चारा खाती रहेगी जब तक कोई दूसरा हाथी आकर इन्हें चाबी न दे। स्थिति तब और भी बदतर हो जाती है, जब पेड मीडिया किसी बकरी का फोटो छापकर कर कहता है कि — यही हाथी है !!
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भारत की सभी राजनैतिक पार्टियां एवं संगठन इसी मॉडल पर काम करते है। शीर्ष स्तर पर बैठे नेता उन्हें निर्देश भेजते है और सभी सदस्यों को अमुक निर्देशों का पालन करना होता है।
मुख्य लक्षण : सोचने और फैसला लेने का काम हमेशा नेता करेगा। नेता आन्दोलन को जिस दिशा में ले जायेगा, आन्दोलनकारी बिना किसी प्रतिरोध के उस दिशा में बढ़ने लगेंगे।
उदाहरण : मोहन दास द्वारा किये गए आजादी के सभी आन्दोलन केन्द्रीकृत आन्दोलन थे। मोहन दास इन्हें शुरू भी अपनी मर्जी से करते थे, और ख़त्म भी अपनी मर्जी से। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि, आन्दोलन कारियों ने मोहन से कहा हो कि -- तायाजी, आप थक गए हो तो थोडा रेस्ट करो। हम अब रुकने वाले नहीं है। जाहिर है, मोहन का आंदोलनों पर हमेशा पूर्ण नियंत्रण रहता था। राम मंदिर पर रथ यात्रा भी इसी तरह का आन्दोलन था।
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(B) कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत आन्दोलन ( Activist Guided DeCentralized Movement ) : इसमें शीर्ष स्तर पर नेता नहीं होता। नेता की जगह समानांतर स्तर पर कई छोटे छोटे कार्यकर्ता होते है। ये सभी कार्यकर्ता किसी शीर्ष नेता से निर्देश नहीं लेते है। किसी मुद्दे को लेकर ये अपने छोटे छोटे समूहों के माध्यम से मूवमेंट करते है। किन्तु इन सभी कार्यकर्ताओ का मुद्दा एक ही होने के कारण यह सभी आपस में एलाइन होकर काम करते है।
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यदि इन कार्यकर्ताओ को अमुक मुद्दे पर नागरिको का समर्थन मिलने लगता है तो यह आन्दोलन जनआन्दोलन में बदल जाएगा। किन्तु यदि कार्यकर्ता अमुक मुद्दे पर जन समर्थन जुटाने में असफल रहते है तो यह आन्दोलन बढेगा नहीं। किन्तु तब भी यह आन्दोलन एकदम से ख़त्म नही होता है। कार्यकर्ताओ के निर्देशन में कई इकाइयां होती है और वे इसे बनाए रखते है। यदि इस तरह का आन्दोलन बढ़ने लगे तो इसे रोकना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि आपको सैंकड़ो एवं हजारो कार्यकर्ताओ से संवाद करना होगा, या उन्हें दबाना, मारना होगा।
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मुख्य लक्षण : कार्यकर्ता किसी साझा विषय पर सहमत होते है एवं अपने दिमाग से सोचकर अपने संसाधनों से आन्दोलन आगे बढाते है। यदि आन्दोलन के केंद्र में कोई नेता है तब भी कार्यकर्ता उसके आदेशो का पालन करने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होते। मतलब, आन्दोलन की दिशा पर कंट्रोल नेता का न होकर कई छोटे छोटे कार्यकर्ताओ का ही होता है।
उदाहरण : अहिंसामूर्ती भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी, अहिन्सामूर्ती महात्मा सच्चिन्द्र्नाथ सान्याल, बारहठ बंधू, आदि सभी क्रांतिकारी इसी फोर्मेट में काम कर रहे थे। उनके पास केंद्र में कोई नेता नहीं था। सभी ने अपने अपने स्तर पर कुछ छोटे छोटे संगठन बना रखे थे और नहीं भी बना रखे थे। वे अपने हिसाब से प्लानिंग बनाते थे, और गतिविधियाँ करते थे।

इंदिरा जी खिलाफ शुरू होने वाला आन्दोलन प्रथम चरण में केन्द्रीकृत था। लेकिन इमरजेंसी के कारण यह विकेंद्रीकृत आन्दोलन में बदल गया, और बाद में नागरिको का भी इसे समर्थन मिलने लगा और यह विकेंद्रीकृत जन आन्दोलन बन गया। हालांकि, इस आन्दोलन में शामिल होने वाले कार्यकर्ताओ, नेताओं, नागरिको के पास कोई साझा एजेंडा नहीं था। राजनैतिक दल इसे सिर्फ "इंदिरा हटाओ" की लाइन पर बनाए रखने में कामयाब रहे, और इस लिहाज से आन्दोलन ने अपने कई लक्ष्यों में से एक लक्ष्य हासिल कर लिया था। आरक्षण विरोधी आन्दोलन भी एक विकेन्द्रीकृत आन्दोलन था।
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विकेन्द्रित आन्दोलन आन्दोलन के 2 और प्रकार है :
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B1. कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत जन आन्दोलन ( Activist Guided DeCentralised Mass Movement ) : जब विकेंद्रीकृत आन्दोलन को जन समर्थन मिलने लगे और आम नागरिक भी इसमें भागीदार हो जाते है तो यह जन आन्दोलन बन जाता है। यदि एक बार जन आन्दोलन खड़ा हो जाए तो इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। यह पूरी तरह से अनियंत्रित होता है, और अमूमन यह अपने लक्ष्य को हासिल करके ही रुकता है। जन आन्दोलन में सत्ता के खिलाफ छिटपुट हिंसा होना मामूली बात है। मतलब, यदि हिंसा शुरू हो गयी है, तो फिर हिंसा रुकेगी भी नहीं। इसी जन आन्दोलन में जब आशय के साथ सशस्त्र संघर्ष शुरू हो जाए तो यह क्रांति बन जाती है।
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मुख्य लक्षण : इसमें एवं विकेन्द्रित आन्दोलन में सिर्फ इतना फर्क है कि, जन समर्थन होने के कारण इसका पैमाना बेहद बड़ा हो जाता है।
उदाहरण : मैग्नाकार्टा, अमेरिका स्वतंत्रता आन्दोलन, बोल्शेविक क्रांति आदि जनआन्दोलन थे। नन्द वंश के खिलाफ आचार्य चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त जिस आन्दोलन को आगे बढ़ा रहे थे, वह भी एक जनआन्दोलन था। आचार्य एवं चन्द्रगुप्त का इस पर उतना नियंत्रण नहीं रह गया था।
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B2. क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में कार्यकर्ता निर्देशित विकेंद्रीकृत जन आन्दोलन ( Draft Leaded Activist Guided Mass movement ) : विकेन्द्रित जन आन्दोलन एवं इस आन्दोलन में सिर्फ इतना फर्क है कि इस आन्दोलन के केंद्र में नेता के रूप में एक लिखित दस्तावेज होता है। इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से आन्दोलनकारियों की मांगे आदि लिखी हुयी होती है, और सभी कार्यकर्ता इस लिखित मांग को अपना नेता मानते हुए आन्दोलन को आगे बढाने के लिए अपने अपने हिसाब से अपने संसाधनों से काम करते है।
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मुख्य लक्षण : यह जन आन्दोलन नेता विहीन नहीं होता। शीर्ष नेता के रूप में कोई न कोई लिखित दस्तावेज अवश्य होता है।
उदाहरण : जूरी कोर्ट आन्दोलन, वोट वापसी पासबुक आन्दोलन, रिक्त भूमि कर आन्दोलन आदि ।
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अन्ना के अनशन को आन्दोलन कहना आन्दोलन शब्द का मजाक उड़ाना है। यह एक पैसिव डेमोंस्ट्रेशन था जिसे पेड मीडिया द्वारा पम्प किया जा रहा था। दुसरे शब्दों में यह अनशन का एक शो था !!
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(1) द अन्ना शो :
1.1. नेतृत्व : यह एक नेता निर्देशित केन्द्रीकृत शो था और दर्जन भर लोगो की टीम सारे फैसले ले रही थी। अनशन का विषय, स्थान, तिथि, फोर्मेंट आदि सभी कुछ अन्ना एवं अन्ना टीम द्वारा तय किया जाता था। उनके मंच के निचे जो लाख-पचास हजार लोग बैठे थे, उनका काम बैठे रहना था। सोचने एवं फैसले लेने में उनकी भूमिका नगण्य थी। जैसे अन्ना तय करते थे, वैसे सब होता था।
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1.2. कार्यकर्ताओ का समर्थन : कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट वह है जो खुद सोचता है और दिशा बनाने के लिए खुद फैसला लेता है। अन्ना के शो में जो भीड़ बैठी थी, उनकी भूमिका सिर्फ टीवी कैमरों के लिए भीड़ बनाने की थी। इनमे ज्यादातर वे लोग भी शामिल थे जिनका जन लोकपाल से कोई लेना देना नहीं था, और मनमोहन सरकार का विरोध करने के लिए वे यहाँ आकर बैठ जाते थे। उनमे से 1% आदमियों ने भी जनलोकपाल के ड्राफ्ट की शक्ल नहीं देखी थी !!
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1.3. जन समर्थन : मुझे नहीं पता कि आपकी उम्र क्या है। लेकिन जब भारत में सिर्फ दूरदर्शन होता था तो हर सप्ताह एक फिल्म आती थी। यह फिल्म शनिवार को सांय 7 बजे दिखाई जाती थी। अब मान लीजिये कि टीवी पर "घरोंदा" आ रही है, तो उस दिन पूरा भारत घरोंदा फिल्म ही देखता था। अब यदि कोई कहे कि लोग घरोंदा इसीलिए देख रहे है क्योंकि लोगो को घरोंदा फिल्म बहुत पसंद है, और घरोंदा पब्लिक डिमांड पर दिखाई जा रही है, मैं ऐसे व्यक्ति को बुद्धिजीवी कहूँगा !! क्योंकि बुद्धिजीवी लोग इस तरह की सामान्य बातों पर विचार नही करते कि, जब एक ही चेनल है, और उस पर सप्ताह में एक ही फिल्म आती है, और आज घरोंदा ही आ रही है, तो घरोंदा ही तो देखेंगे न। शोले किधर से देखेंगे !!
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अन्ना का शो शुरू होने से पहले भारत के कितने करोड़ लोगो ने जनलोकपाल लफ्ज के बारे में सुना था !! क्या आपने सुना था !! उन्होंने देश के “सभी” चैनल्स पर जनलोकपाल का शो दिखाना शुरू कर दिया और लोग देखने लगे। टीवी से लोकपाल गायब और लोगो के जेहन से भी गायब !!
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मेरा बिंदु यह है कि, जन लोकपाल का समर्थन देश में कभी मौजूद नहीं नहीं था। जिन्हें आप समर्थक कह रहे है वे समर्थक नहीं थे। वे दर्शक थे। जैसे उन्हें घरोंदा दिखाई जा रही थी, वैसे ही जनलोकपाल दिखाया जा रहा था। जैसे दूरदर्शन अध्यक्ष तय करता है कि आज घरोंदा दिखाई जायेगी, वैसे ही पेड मीडिया के स्पोंसर्स ने तय किया कि सभी भारतीयों को यह शो दिखाया जायेगा !! उन्होंने ही इस ड्रामे को आन्दोलन भी कहा और यह भी साबित करने की कोशिस की कि यह जन आन्दोलन था !!
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1.4. अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक शो के प्रसारण के लिए पेमेंट क्यों कर रहे थे ?
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भारत ने 2005 में भ्रष्टाचार रोकने के लिए UN ट्रिटी पर साइन किये थे, और इसके प्रावधानों को 2011 तक इम्प्लीमेंट करना था। इस ट्रीटी के अनुसार भारत को केंद्र एवं राज्य स्तर पर एक स्वायत्त संस्था का गठन करना था जिसके पास उच्च स्तर के अधिकारीयों एवं मंत्रियो के खिलाफ जांच करने का अधिकार हो।
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मान लीजिये कि वॉल मार्ट को पूरे देश में स्टोर खोलने है। स्टोर के लिए जमीन चाहिए। राज्यों में अलग अलग दलों की सरकारें होती है, अत: हर चरण पर वॉल मार्ट को इन्हें घूस खिलानी होगी। यदि लोकपाल जैसी संस्था बनाकर उसे मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच खोलने एवं अरेस्ट करने का पॉवर दे दिया जाए तो वॉल मार्ट का काम आसानी से हो जाता है। क्योंकि तब वॉल मार्ट सिर्फ लोकपाल को खरीद लेगा, और लोकपाल के माध्यम से मुख्यमंत्रियों को धमकाएगा कि मुझे चिल्लर दाम में जमीन दें वर्ना लोकपाल को तेरे पीछे लगा दूंगा !!
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1.5. शो की दिशा : पूरा शो स्क्रिप्टेड था, और पेड मीडिया पर निर्भर था। चूंकि भारत UNAC साइन कर चुका था तो लोकपाल आना ही था। पर ड्राफ्टिंग पर विवाद चल रहा था। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भयंकर वाला लोकपाल चाहते थे। ऐसा लोकपाल जो पीएम और सीबीआई डायरेक्टर को भी जेल में डाल सके !! मतलब, भारत के पीएम को कंट्रोल करने के लिए एक और आदमी !! कोंग्रेस एवं बीजेपी समेत सभी सांसद इस ड्राफ्टिंग के खिलाफ थे। अत: ये सब एकजुट हो गए। तब उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से एक फर्जी आन्दोलन खड़ा करने के लिए फंडिंग करनी शुरू की। उन्होंने अरविन्द केजरीवाल को एप्रोच किया और केजरीवाल जी द अन्ना को दिल्ली ले आये।
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दुसरे शब्दों में, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको द्वारा पेड मीडिया के माध्यम से यह ड्रामा खड़ा किया गया था, ताकि जनसमर्थन दिखाकर संसद पर दबाव बनाया जा सके। ( इसके अलावा भी कई राजनैतिक कारण थे )
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1.6. अन्ना के शो में हिंसा क्यों नहीं हुयी ?
दो वजहें है :
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1.6.1. इस तरह के नियंत्रित, स्क्रिप्टेड, नेता निर्देशित और पूरी तरह से पेड मीडिया पर निर्भर शो में जो लोग जुड़े होते है वे स्वत: स्फूर्त नहीं होते है। ऐसे शो में हिंसा सिर्फ तभी होगी जब प्रायोजक हिंसा की स्क्रिप्ट लिखेंगे। शुरू से ही उनकी स्क्रिप्ट इस तरह की थी कि हिंसा उनके एजेंडे में नहीं था। यह एक शूटिंग स्पॉट था। जहाँ मंच था, सामने कुर्सियां थी, जाजम थी, और सभी लोगो एक चार दिवारी में बैठे थे। हिंसा किधर करेंगे ? एक दुसरे के कपडे फाड़ेंगे क्या ?
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1.6.2. खड़ा झुण्ड भीड़ होता है, और यदि झुण्ड को बिठा दिया जाए तो यह सभा बन जाता था। यदि आप लोगो को बिठा देंगे तो उनका दिमाग अलग तरीके से चलने लगता है, और इन्ही लोगो को यदि आप खड़ा कर देंगे ये अलग तरीके से पेश आने लगेंगे। बैठे आदमीयों को यदि आप लाठी एवं पत्थर दे देंगे तो वे इसे हाथ में पकड़ कर नहीं रखेंगे। इसे किनारे रख देंगे, और बोलना, या सुनना शुरू कर देंगे। लेकिन यदि आपने इन्हें खड़ा कर दिया तो अब ये भीड़ है। और थोड़े से आवेश के साथ ही ये हिंसा शुरू कर सकते है। भीड़ का मनोविज्ञान इसी तरह से काम करता है। यदि आपके प्रदर्शन का डिजाइन इस तरह का है की सभी लोग बैठे हुए है तो उन्हें आवेश में नहीं लाया जा सकता, और हिंसा नहीं होगी।
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अन्ना के शो में सभी लोगो बैठे हुए थे, अत: यह प्रदर्शन सभा के रूप में चल रहा था। मोहन भी अपने अनशन इसी तर्ज पर किया करता था। वह लोगो को जाजम पर बिठाकर उन्हें भजन आदि गाने पर लगा लेता था। चोरी चोरा में सभा नहीं थी। लोग खड़े थे, अत: उन्होंने थाना फूंक दिया !!
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(2) CAA पर विरोध प्रदर्शन :
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2.1. नेतृत्व : इसके केंद्र में कोई नेता नहीं है। पेड मीडिया पर निर्भर कई राजनैतिक पार्टियों के छोटे बड़े नेता है, और ये सभी नेता अलग अलग तरीके से ब्रेन डेड कार्यकर्ताओ को चाबी दे रहे है। किन्तु इनके हाथ में भी प्रदर्शन का निर्णायक नियंत्रण नहीं है। वे सिर्फ इन्हें सड़को पर ठेल रहे है, किन्तु लीड नहीं कर रहे है। चाबी देने के बाद इस तरह के प्रदर्शनो की कोई तय दिशा नहीं होती है। यह किसी भी दिशा में चलना शुरू कर कर देता है।
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2.2. प्लग : असम को छोड़कर शेष देश में प्रदर्शनकारियों को पेड मीडिया द्वारा भ्रमित किया गया है। अब पेड मीडिया के स्पोंसर्स ने इसमें हवा भरना बंद कर दिया है, अत: धीरे धीरे यह शांत हो जाएगा। यदि पेड मीडिया के स्पोंसर्स इसमें ईंधन डालना शुरू करें तो यह फिर से बढ़ने लगेगा। किन्तु पेड मीडिया इसे पम्प नहीं करेगा तो यह आगे नहीं बढेगा, क्योंकि इन्हें जन समर्थन हासिल नहीं है। जन समर्थन लेने के लिए वाजिब वजह होनी चाहिए। जो कि यहाँ मौजूद नहीं है।
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2.3. कैसे पेड मीडिया के प्रायोजको ने इसे ट्रिगर किया ?
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संसद ने CAA बिल पास किया था। यदि वे इसे शान्तिपूर्ण ढंग से पास करना चाहते तो उन्हें NRC का नाम लेने की जरूरत ही नहीं थी। लेकिन CAA का भारतीय मुस्लिमो से कोई सरोकार नहीं होने के कारण भारतीय मुस्लिम सड़को पर उतरने से इनकार कर सकते थे। अत: श्री अमित शाह ने संसद में धमकाने के अंदाज में इस बात को बार बार जोर देकर कहा कि, हम NRC लाने वाले है। फिर पेड मीडिया के प्रायोजको ने ध्रुव B के नेताओं, बुद्धिजीवियों एवं मीडिया हाउस से कहा कि वे CAA को NRC से मिक्स करके अपने फोलोवर्स को भ्रमित करें। ध्रुव A के नेताओं, बुद्धिजीवियों, एवं मीडिया हॉउस को कहा गया कि वे अपने फोलोवर्स को जानकारी दें कि भारतीय मुस्लिम जाया तौर पर इस बिल का विरोध कर रहे है !!
2.4. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को इससे क्या लाभ है ?
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अमेरिकी धनिक ईरान के खिलाफ युद्ध में भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते है। इसके लिए हिन्दू-मुस्लिम तनाव को चरम पर ले जाना जरुरी है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे एवं तनाव बढ़ाने से भारत के हिन्दुओ में एंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट बनेगा और तब भारत के हिन्दुओ को कन्विंस किया जा सकता है कि, वे ईरान-अफगानिस्तान में भारतीय सेना भेजने का समर्थन करना शुरू करें।
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दूसरा कारण, अंतराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा है। अभी अंतराष्ट्रीय मीडिया में इस बात को बड़े पैमाने पर रिपोर्ट किया जा रहा है कि, भारत में मुस्लिमों पर जुल्म हो रहा है, और वहां पर हालात बेकाबू होने के कगार पर है। ट्रंप का “भारत में हिन्दू मुस्लिम साथ नहीं रह सकते” बयान इसी कड़ी का हिस्सा था। जब अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो उसे भारत के हिन्दुओ का सहयोग चाहिए, और भारत के हिन्दु-मुस्लिम को आमने सामने लाकर इसी के लिए सधाया जा रहा है।
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तीसरी वजह, अमेरिकी धनिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव को उस उच्च बिंदु तक पहुँचाना चाहते है कि यदि वे “चाहे” तो पेड मीडिया का इस्तेमाल करके किसी भी समय एक सिविल वॉर को ट्रिगर कर सके। और भी इसमें कई पहलू है, मैं फिर किसी जवाब में इस पर विस्तार से लिखूंगा।
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2.5. CAA के प्रदर्शन में हिंसा : इसका स्ट्रक्चर ही ऐसा है कि, हिंसा होने की सम्भावना बढ़ी हुयी है। 90 के दशक में शुरू हुए आरक्षण विरोधी प्रदर्शन, हरियाणा का जाट आरक्षण प्रदर्शन आदि का स्ट्रक्चर भी ऐसा ही था। सड़को पर निकलकर प्रदर्शन करने वाले इस तरह के हुजुम क्यों हिंसक हो जाते है, और किन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करके इस तरह के हिंसात्मक प्रदर्शनों को रोका जा सकता है, इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में बताया है – देश में बढ़ते हिंसक प्रदर्शन के पीछे किसका हाथ है?

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पटाखे जलाना हमारी संस्कृति से जुड़ा है किन्तु पर्यावरण की खातिर क्या आप इनका बहिष्कार करेंगे?
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कृपया कोई ज्यादा बेहतर कारण ढूंढ कर लाइए। क्योंकि दीवाली की आतिशबाजी का पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं है। निचे मैंने इससे सम्बंधित कुछ बिंदु दिए है :
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खंड - अ
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(1) आतिशबाजी से हुआ प्रदुषण सिर्फ 3 घंटे के अंदर वातावरण से पूरी तरह गायब हो जाता है !!! ऐसा दिल्ली के रोहिणी स्टेशन पर लगे प्रदूषण मापक सिस्टम के आंकड़ों से सिद्ध होता है। 2013 में आई आई टी कानपुर ने यह अध्ययन किया था !! उन्होंने कई सेम्पल इकट्ठे करके यह जांचा और पाया कि दिवाली के दिन सुबह 4 बजे तक PM2.5 का स्तर फिर से 300 से 375 micrograms तक आ जाता है, जो कि दिल्ली के नियमित दिनों के लिए प्रदुषण का औसत स्तर है। लिंक देखें -
Firecrackers ban in Delhi-NCR: Not just Diwali, what’s SC plan for other periods?
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(2) 2003 में दिल्ली नगर निगम एवं स्वास्थ्य मंत्रालय नागरिको को आतिशबाजी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था !!!
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वजह ?
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उन्होंने पाया कि घनघोर आतिशबाजी डेंगू के मच्छरों का नाश कर देती है। और इस लिहाज से आतिशबाजी जरुरी है। आतिशबाजी का धुंवा वातावरण की नमी सोख लेता है और धुंवे के कारण मच्छरों की एक बड़ी आबादी नष्ट हो जाती है। नतीजा : इससे नए मच्छरों के पनपने के अवसर भी कम हो जाते है !! पेड द हिन्दू का लिंक देखें -
Say yes to fire-crackers to control dengue
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2006 में पेड टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट किया कि दिवाली की आतिशबाजी मच्छरों से निपटने के लिए प्रभावी उपाय है। पेड टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लिंक -
Cracker cure | Delhi News - Times of India
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उल्लेखनीय है कि पटाखों से जो धुंआ और गर्मी पैदा होती है वह मच्छरों के लिए तो हानिकारक है लेकिन इंसान के लिए नहीं। क्योंकि आतिशबाजी का धुंआ वातावरण में सिर्फ 3 घंटे ही टिका रह सकता है। सांय 6 बजे से आतिशबाजी शुरू होती है और 11 बजे तक यह बड़े पैमाने पर चलती रहती है। इन पांच घंटो में मच्छर मर जाते है और 2 बजे तक प्रदूषण का स्तर फिर से वही हो जाता है जैसा कि आतिशबाजी से पहले था !!!
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दुसरे शब्दों में, दिल्ली में पिछले 15 सालो से जो आतिशबाजी के खिलाफ प्रचार चलाया जा रहा है, उसकी वजह से डेंगू एवं अन्य मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया लगता है। और अगर ऐसा है तो मेरे विचार में इन अतिरिक्त मौतों के लिए जिम्मेदार वे लोग है जो मिशनरीज द्वारा नियंत्रित पेड मीडिया की चपेट में आकर दिवाली की आतिशबाजी के खिलाफ प्रचार अभियान चला रहे है !!!
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बहरहाल, हमें किसी विश्वनीय संस्था द्वारा इस बारे में व्यवस्थित तकनिकी अध्ययन करवाए जाने की जरूरत है, ताकि यह बात एकदम साफ़ तौर पर और भी निर्विवाद रूप से निकलकर स्थापित हो सके कि दिवाली की आतिशबाजी मच्छरो की बड़ी आबादी को नष्ट कर देती है। और इसके लिए यह आवश्यक है कि दीवाली के इन 6 घंटो के दौरान एकदम भयंकर वाली आतिशबाजी की जाए।
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यदि मच्छरों पर दिवाली की आतिशबाजी का प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट हो जाता है तो सरकार को देश व्यापी प्रचार अभियान चलाना चाहिए जिससे नागरिक दिवाली पर आतिशबाजी करने को प्रोत्साहित हो !!
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(3) दिवाली पर प्रदूषण बढ़ जाता है क्योंकि ज्यादातर लोग खरीददारी करने के लिए वाहन लेकर निकलते है। माल की खपत ज्यादा होने से ट्रको का परिवहन भी बढ़ता है और और इस वजह से भी प्रदुषण बढ़ जाता है। दूसरे शब्दों में , दिवाली पर प्रदुषण बढ़ने की एक बड़ी वजह ट्रेफिक का बढ़ना भी है, न की आतिशबाजी।
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(4) इसी समय किसान अपनी पराली भी जलाते है और फूस जलाने से भी प्रदुषण बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए पिछले साल दिवाली के अगले दिन सुबह 5 बजे दिल्ली और लाहौर में प्रदुषण का स्तर एक समान था !!! क्यों ? क्योंकि दोनों इलाको में किसान फूस जला रहे थे। और फूस जलाने से भी प्रदुषण होता है !
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खंड - ब
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उत्सवों में भागीदारी कम होने से धार्मिक जमाव टूटेगा और हिन्दू धर्म के विघटन में तेजी आएगी।
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हिन्दू धर्म का प्रशासन बेहद कमजोर है और इसे दुरुस्त नहीं किया गया तो अगले 50 वर्षो में इसके अनुयायियों की संख्या लगभग आधी रह जायेगी। यह शान्ति काल की स्थिति है। यदि इस दौरान भारत को युद्ध का सामना करना पड़ जाता है तो अगले 50 वर्षो में हिन्दू धर्म पूरी तरह से लुप्त होने की कगार पर जा सकता है।

ईसाई धर्म लगातार विस्तार कर रहा है , क्योंकि उनके पास जूरी सिस्टम है।
इस्लाम ने भी लगातार विस्तार किया है क्योंकि उनके पास हर सप्ताह एकत्र होने की प्रक्रिया है।
सिक्ख धर्म अब तक टिका हुआ है क्योंकि उनके पास गुरुद्वारा प्रमुख को चुनने की प्रक्रिया है। ( हालांकि अब यह कमजोर हो रहा है )

हिन्दू धर्म के प्रशासन में इनमे से कुछ भी नहीं है, और न ही ऐसी कोई प्रक्रिया है जो इनकी कमी को पूरा करे। इसीलिए वह लगातार जमीन एवं अनुयायी खो रहा है। लेकिन फिर भी इसके विघटन की दर धीमी है। आखिर , हिन्दू धर्म का क्षरण उतनी तेजी से क्यों नहीं हो रहा है, जितनी तेजी से होना चाहिये ?
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मेरे विचार में इसकी 2 बड़ी वजहें है :

हिन्दू धर्म को अब तक किसी ताकतवर प्रतिस्पर्धी का सामना नहीं करना पड़ा और इस वजह से विघटन की दर धीमी रही। किन्तु अब एफडीआई के माध्यम से मिशनरीज की घुसपेठ भारत में तेजी से बढ़ रही है।
उत्सवो पर धार्मिक जमाव। किन्तु अब इसे तोड़ने के निरंतर प्रयास किये जा रहे।
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हिन्दू धर्म में साल भर बेतहाशा त्यौहार आते है और इनमें से ज्यादातर त्योहारों में अध्यात्म / भक्ति के साथ साथ मनोरंजन का तत्व भी शामिल है। मनोरंजन का तत्व होने से सभी तबके के सभी आयु वर्ग के लोग इन उत्सवो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है। इस कवायद से उत्सवो पर भारी संख्या में धार्मिक जमाव देखने को मिलता है और धर्म के प्रति जुड़ाव बना रहता है।
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उदाहरण के लिए , दिवाली पर आतिशबाजी, मिठाई और नए कपडे का चलन बच्चो एवं युवाओ को आकर्षित करता है, जबकि गृहणियां साफ़ सफाई रंग रोगन में व्यस्त हो जाती है। बुजुर्गो एवं वरिष्ठ जनों के लिए इसमें लक्ष्मी पूजा। फिर धनिकों के लिए जुआ भी है। सामुदायिकता बढ़ाने के लिए अगले दिन "राम राम"। कुल मिलाकर दिवाली सभी आयु वर्ग के लोगो को खींच लेती है, और लोग इसमें उत्साह के साथ भाग लेते है। किन्तु यहाँ मनोरंजन और रोमांच का मुख्य तत्व आतिशबाजी है जो दीवाली को हिट बनाता है। इसमें सामूहिक गतिविधि है।
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इसी तरह होली पर सिर्फ होलिका दहन उत्साह बनाये नहीं रख सकता। रंग, गुलाल खेलना और ढपली पर फाग गाना वह तत्त्व है जो लोगो की भागीदारी बढाता है। फिर जन्माष्टमी पर मनोरंजन के लिए दही हांड़ी प्रतियोगिता एवं झांकियां है। दुर्गा पूजा एवं गणपति स्थापना पर 9 दिनों तक नाच-गान। और पूजा तो खैर है ही। तो हिन्दू धर्म के ज्यादातर उत्सवो में मनोरंजन के तत्व डाले गए है, ताकि इनमे नागरिको का उत्साह बना रहे। विभिन्न उत्सवो जैसे दुर्गा पूजा / महाशिवरात्रि / कुम्भ आदि पर मेले इस धार्मिक जमाव में और भी वृद्धि कर देते है।
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तो यदि प्रतिस्पर्धी धर्म भारत में हिन्दू धर्म को और भी कमजोर करना चाहते है तो उन्हें हिन्दू धर्म के त्योहारों पर होने वाले धार्मिक जमाव को तोड़ना होगा। वे ऐसा कैसे कर रहे है ?
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प्रदुषण का हवाला देकर वे आतिशबाजी का विरोध करते है और अन्य लोगो को भी दिवाली पर आतिशबाजी का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करते है !! इससे सामूहिकता घटती है, और रोमांच चला जाता है।
अगले दौर में वे यह तर्क लेकर आयेंगे कि, देश में बिजली की कमी है और कई गरीब लोगो तक बिजली नहीं पहुँच रही है , किन्तु दिवाली पर हम महज सजावट के लिए इतनी बिजली बर्बाद कर दे रहे है, अत: हमें सोच समझकर बिजली खर्च करनी चाहिए !!
फिर वे इस तरह का अभियान लायेंगे कि दिवाली पर दीपक जलाने से तेल की घी-तेल की हानि हो रही है। ज्यादा से ज्यादा एक-दो दीपक जलाए और बाकी तेल-घी किसी गरीब को दान कर दें !!!
फिर वे होली पर आयेंगे और होली को पानी की बर्बादी से जोड़ देंगे। लोगो को समझायेंगे कि होली खेलने में करोडो गेलन पानी व्यर्थ हो रहा है और इस बर्बादी के कारण लोग प्यासे मर रहे है !!!
जन्माष्टमी पर वे दही हांडी की उंचाई घटाने की मुहीम छेड़ देंगे। वे लोगो को समझाएंगे कि जन्माष्टमी पर चुपचाप घर पर पंजरी बना कर खा ले। दही हांडी जैसे उत्सवो में हिस्सा न ले। क्योंकि इससे चोट आती है। हांडी की उंचाई घटने से रोमांच चला जाता है, और धार्मिक जमाव टूटता है।
गरबा पर वे आपको बताएँगे कि इससे किस प्रकार का जानलेवा ध्वनी प्रदुषण होता है। यदि फिर भी लोग इकट्ठे होने से न माने तो उन्हें साइलेंट गरबा करने की सलाह देंगे। साइलेंट गरबा में प्रत्येक खिलाडी कान में हेडफोन से गाना सुनता रहता है और नाचता रहता है। इस तरह पंडाल पूरी तरह से साइलेंट रहता है। उत्सवों के लिहाज से यह सन्नाटा है, लेकिन पेड मीडिया की अफीम चाटने वाले इसे शांति बताते है।
शिवरात्रि आने पर वे आपको कहेंगे की शिवलिंग पर दूध चढाने की जगह यह दूध किसी बच्चे को पिला दो। इससे व्यक्ति के पास शिवरात्रि पर मंदिर जाने की वजह खत्म हो जायेगी और धार्मिक जमाव एवं मेला टूटेगा।
अंतिम संस्कार का वे यह कह कर विरोध करेंगे कि इससे लकड़ी की हानि और प्रदुषण हो रहा है !! अत: शव को बिजली से जला दो।
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ये छोटे में लिखा है। उनके दिमाग काफी उर्वर है। वे सभी त्योहारों में ऐसे ढेर सारे बिंदु खोजकर ला सकते है, जिससे उत्सवो को सुट्ट किया जा सके। यहां तक कि वे करणी माता मंदिर ( चूहों वाली माता ) में प्रसाद, नारियल, ध्वजा, धूपबत्ती आदि चढाने पर भी रोक लगा चुके है। वजह - इससे मंदिर में प्रदुषण होता है !!
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साइलेंट गरबा, आतिशबाजी मुक्त दिवाली, जल विहीन होली, दही हांडी मुक्त जन्माष्टमी के बाद अब उन्होंने एक नयी चीज पेश की है - रावण बर्निंग विद कोल्ड फायर !!
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रावण दहन के कारण होने वाले धूम्र प्रदुषण से बचने के लिए पिछले वर्ष उदयपुर नगर निगम ने दशहरे पर धुआं मुक्त आतिशबाजी करने का फैसला किया !! उम्मीद है कि जल्दी ही हमें साइलेंट आतिशबाजी ( विशेष तौर पर दशहरे और दिवाली पर ) भी देखने को मिलेगी !!!
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किन्तु , यदि आप हिन्दू धर्म की परम्पराओं में मानते है और इन्हें जारी रखना चाहते है तो दिवाली पर आतिशबाजी करें , होली पर रंग खेले, शिवरात्रि पर मेले में भाग ले , साइलेंट गरबा का विरोध करे और उन लोगो का भी विरोध करे जो "पर्यावरण के नाम पर" हिन्दू त्योहारों की परम्पराओं पर रोक लगाना चाहते है। यह हर तरीके से साबित है कि दिवाली पर आतिशबाजी का प्रदुषण से कोई लेना देना नहीं है। आतशबाजी से सिर्फ एक दिन प्रदुषण होता है और उस एक दिन भी आतिशबाजी का प्रदुषण में हिस्सा सिर्फ 6% है !!! और यह प्रदुषण में अगले 8 घंटे में वातावरण से पूरी तरह से तिरोहित हो जाता है।
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कुल मिलाकर सयानो की बातों में न आये और दिवाली पर खुद भी आतिशबाजी करें, और दुसरो को भी प्रेरित करे। लेकिन आतिशबाजी करते समय अपनी सुरक्षा का ध्यान रखे। सूती कपडे पहने और यदि उपलब्ध हो तो प्लेन ग्लास का चश्मा लगा ले। अनार, फुलझड़ी , चकरी आदि सुरक्षित पटाके चलाये और मिर्ची बम, रोकेट आदि पटाको की अवहेलना करे। तथा बच्चो को अपने पर्यवेक्षण में आतिशबाजी करवाएं।
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बहरहाल , जब से पेड मीडिया ने दिवाली की आतिशबाजी को प्रदुषण से कनेक्ट करने में पैसा फूंकना शुरू किया है, तब से मैंने भी आतिशबाजी का अपना बजट बढ़ा दिया है। मैं आतिशबाजी भी करता हूँ, और इसका चित्र सोशल मीडिया पर पोस्ट भी करता हूँ। कृपया आप भी दीवाली की आतिशबाजी के चित्र सोशल मीडिया पर पोस्ट करके इसे प्रदर्शित करें ताकि ताकि अन्य नागरिक भी आतिशबाजी करने के लिए प्रेरित हो।
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आतिशबाजी युक्त दिवाली की शुभकामनाएं।
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खंड - स
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संघ=बीजेपी के मंत्रियों का आतिशबाजी पर स्टेंड :
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संघ के नेता और मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने पिछले साल 3 हिन्दू उत्सव-विरोधी ट्वीट किये थे, जिन्हें अब उन्होंने डिलीट कर दिया है !!! एक कार्यकर्ता ने इन ट्वीट्स को सेव कर लिया था। डिलीट किये गए ट्वीट के लिंक और विवरण :
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(1)
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https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh...
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Welcome decision by the SC on ban of fire crackers sales in NCR. Comes as a huge support for my #GreenDiwali initiative for our environment
बहुत ख़ुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में दीवाली पर आतिशबाजी बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इस फैसले से मेरे #GreenDiwali मिशन को भारी समर्थन मिलेगा !!

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(2)
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https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh...
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And of course, we must spare a thought for poor birds and animals who spend a terrible evening scared by all the fire & noise #GreenDiwali "
और हाँ, हमें उन निरीह पक्षियों एवं जानवरो की फ़िक्र भी करनी चाहिए जो आग और धुएं के कारण दिवाली की शाम काफी सदमे में बिताते है, #GreenDiwali !

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(3)
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https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh... "> https://twitter.com/drharshvardh...
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Instead of spending thousands on crackers, lets buy food & sweets and share it with poor/underprivileged, make it an awesome #GreenDiwali "
आतिशबाजी पर हजारो रूपये फूंकने की जगह हमें उन पैसो से मिठाइयाँ व भोजन खरीद कर गरीबों में बाँट देनी चाहिए। तभी सच्चे अर्थो में दिवाली होगी, #GreenDiwali !

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ये तीनो ट्वीट अब गायब है !!
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शर्म की बात है कि एक मंत्री ट्वीट करता है और फिर उन्हें डिलीट कर देता है !! यहाँ तक कि मेरे जैसे छोटे और पार्ट टाइम एक्टिविस्ट को भी इतना शउर है कि - यदि मैंने सार्वजनिक रूप से कुछ गलत लिखा है तो, या तो मुझे इसके लिए खेद प्रकट करना चाहिए या फिर इसे सम्पादित करके ठीक करना चाहिए। किन्तु रिकॉर्ड को मिटा देना किसी भी तरीके से ईमानदार व्यवहार नहीं है।
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दरअसल डॉक्टर हर्षवर्धन को आतिशबाजी से कोई समस्या नहीं है। लेकिन उन्हें दिवाली पर की जाने वाली आतिशबाजी से ख़ास एलर्जी है। डॉक्टर साहेब दिवाली पर आतिशबाजी न करने की मुहीम चलाते है, लेकिन बीजेपी के चुनाव जीतने पर यही हर्षवर्धन कार्यकर्ताओ से कहते है कि — आतिशबाजी करो !!
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(i) यहाँ आप देख सकते है कि हर्षवर्धन ने दीपावली पर आतिशबाजी न करने की अपील की - Health minister Harsh Vardhan advocates for a silent Diwali in Capital
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(ii) हर्षवर्धन यह समझाते हुए कि किस तरह सिर्फ दीपावली पर आतिशबाजी करने से स्वास्थ्य को नुक्सान होता है : Union Health Minister on dangers of Diwali Cracker
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(iii) और चुनाव जीतने पर यही हर्षवर्धन खुद खड़े होकर आतिशबाजी करवा रहे है - Celebrations on Narendra Modi arrival, Harshvardhan dances - Live Video
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महिला सशक्तिकरण के नाम पर क्या गलत हो रहा है?
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(1) भारत सरकार ने 2017 में गेजेट में छापा कि - यदि कोई व्यक्ति 20 कर्मचारियों से अधिक की कम्पनी चला रहा है और यदि उसकी महिला कर्मचारी गर्भ धारण कर लेती है. तो कम्पनी का मालिक अमुक महिला को 6 महीने की छुट्टी देगा और इन 6 महीनो के दौरान उसे पूरा वेतन भी देगा !!
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इस क़ानून के 2 उद्देश्य थे :
छोटी इकाइयों के प्रोडक्ट की लागत एवं उनके झमेले बढ़ाना
देश की प्रोडक्टिव युवतियों के अवसरों को कम करना
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बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको ने यह क़ानून छापने के लिए लॉबीइंग की थी। 50 से 500 स्टाफ की छोटी इकाइयां सीमित बजट में काम करती है, और यदि उन पर 1-2 एम्प्लोयी को मुफ्त में सेलेरी देना पड़ जाए तो उनकी लागत बढ़ जाती है। किन्तु बड़ी एवं विशालकाय कम्पनियां इस भार को आसानी से उठा सकती है।
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नतीजा :
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छोटी स्टार्ट अप इकाइयों ने ऐसी महिलाओं को किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकालना शुरू किया जिनके बारे में सम्भावना थी कि वे गर्भ धारण कर सकती है। मैं किसी भी संस्था द्वारा किये गए सर्वे वगेरह में नहीं मानता हूँ, क्योंकि ज्यादातर सर्वे फर्जी होते है, और सर्वे में उन्ही नतीजो को दिखाया जाता है, जो नतीजा दिखाने के लिए सर्वे के स्पोंसर ने भुगतान किया है।
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किन्तु मेरी स्वयं की जानकारी में ऐसे 7-8 मामले है जिनमे मालिक ने महिला एम्प्लोयी को नौकरी से निकाल दिया था। और सर्वे वालो की माने तो 2 साल में लगभग 6-7 लाख महिलाएं इस क़ानून की चपेट में अपना जॉब गँवा चुकी है। और ऐसी कितनी ही महिलाएं है जिन्हें यह पता नहीं है कि उन्हें इस नए क़ानून वजह से रिजेक्ट किया जा रहा है !!
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कुछ स्टार्ट अप्स ने काबिल महिलाओं से कांट्रेक्ट साइन कराने शुरू किये कि वे अमुक अमुक अवधि तक गर्भ धारण नहीं करेगी। और इस तरह उन्हें स्थायी नौकरी की जगह कांट्रेक्ट पर काम करना पड़ा।
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उल्लेखनीय है कि अमेरिका में प्रसव कालीन अवकाश के एवज में नियोक्ता पर एक रूपये का भी अतिरिक्त भार नहीं डाला जाता है, और नियोक्ता उसे अन पेड लीव देता है। प्रसव के बाद महिला फिर से नौकरी पर आना शुरू कर सकती है। और इस वजह से न तो छोटी इकाइयों के मालिक महिलाओ को नौकरी देने से कतराते है, न ही महिलाओं को नौकरी गंवानी पड़ती है !!
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आप इस उदाहरण को अपने ऊपर लागू करके देख सकते है कि, यदि आप एक 50 एम्प्लोयी की इकाई खोलते है, जिसमें 8 से 10 महिलाएं है और इनमें से सभी 22 वर्ष से 32 वर्ष के बीच की आयु की है, तो क्या आप इन्हें नौकरी पर रखने का जोखिम उठाएंगे ? मेरे विचार में आप यह जोखिम उठाने से बचेंगे।
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तो महिला सशक्तिकरण के नाम पर क्या गलत हो रहा है ?
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इस क़ानून को महिला सशक्तिकरण का टैग लगाकर लागू किया गया, और महिला अधिकारों पर लिखने वाले पेड विशेषज्ञों और फुरसतियों ने इसके पक्ष में मुहीम चलायी !! इन महिला अधिकार कार्यकर्ताओ की तरफ से इस क़ानून के कारण नुकसान उठा रहे कारखाना मालिक और युवा महिलाएं चाहे तो भाड़ में जा सकते है !!
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इसके अलावा पेड मीडिया ने दंगल जैसी गलीज़ फिल्म को महिला सशक्तिकरण से जोड़ा और सरकार ने इस फिल्म का प्रमोशन किया !!
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मतलब सरकार की महिला सशक्तिकरण की नीति है कि महिलाओं को स्टार्ट अप्स, कारखानों, कम्पनियों में काम करने की स्किल जुटाने की जगह पर पहलवानी करनी चाहिए !! और महिला अधिकार कार्यकताओ ने इस फिल्म को प्रोत्साहित करने में भी कोई कसर नहीं रखी !! यह सामान्य समझ की बात है कि यदि 500 लड़कियां पहलवानी करेगी तो उनमे से सिर्फ 1–2 को ही रोजगार मिल सकता है, और शेष को कोई रोजगार नहीं मिलने वाला है। और ज्यादातर सम्भावना है कि स्टेराइड वगेरह लेने की वजह से उनका शरीर भी ख़राब हो जाए।
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समाधान ?
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मेरे प्रस्ताव इस तरह है :
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काम काजी महिला यदि आयकर दाता है तो प्रसव कालीन स्थिति में सरकार उसे वेतन के बराबर की राशि की आयकर में छूट देगी। इस छूट को उसके एवं उसके पति के आयकर में तब तक समायोजित किया जाएगा, जब तक उसके 6 महीने के वेतन के बराबर राशि समायोजित न हो जाए।
नियोक्ता पर कोई भार नहीं होगा। महिला प्रसव के बाद जब फिर से ज्वाइन करती है तो उसके सेवा वरिष्ठता के लाभों में नियोक्ता कटौती नहीं कर सकेगा।
यदि काम काजी महिला आयकर दाता नहीं है तो सरकार उसे 6 माह तक X रूपये माँहवार देगी।
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(2)
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2011 में सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने यह रूलिंग छापी कि -

बलात्कार के मामले में पीड़ित लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा, और आरोपी को सजा देने के लिए पीड़ित लड़की के बयान को पर्याप्त सबूत माना जाएगा !!
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हाँ आपने सही पढ़ा है !! इसे फिर पढ़िए -
बलात्कार के मामले में पीड़ित लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा, और आरोपी को सजा देने के लिए पीड़ित लड़की के बयान को पर्याप्त सबूत माना जाएगा !!

Rape victim's testimony sufficient for conviction: SC
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यह पंक्ति बॉलीवुड के किसी स्क्रिप्ट रायटर की नहीं है, यह रूलिंग सुप्रीम कोर्ट के जजों ने दी थी।
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आपने नोटिस किया होगा कि पिछले कुछ वर्षो से अचानक यौन शोषण / बलात्कार के मामलों के दर्ज होने और इसके मीडिया में आने की संख्या में इजाफा हो गया है। इसकी असली वजह यह रूलिंग थी। इस रूलिंग ने महिलाओ / युवतियों को यह मौका दिया कि वे अपने बॉस, मैनेजर, वरिष्ठ सहकर्मियों, मालिक, नियोक्ता या किसी बड़े आदमी को अदालत में घसीट सके।
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कुछ अवसरवादी महिलाओं ने इसका इस्तेमाल पुरुष साथियों को ब्लेकमेल करने में किया और पेड मीडिया द्वारा इन्हें जमकर कवरेज दिया जाने लगा। नतीजा, नियोक्ताओ को लगने लगा कि महिलाओं के साथ एक निश्चित दूरी बनाकर रखना जरुरी है, और उन्होंने भीतरी दायरे में महिलाओं को नियुक्तियां देना बंद कर दिया !!
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नियोक्ताओ ने उन महिलाओं को भी निकालना शुरू किया जहाँ कई पुरुषो के बीच काफी कम महिलाएं काम कर रही है। उन्हें लगा कि यदि मेरा कोई पुरुष कर्मचारी महिला के साथ कोई गड़बड़ कर देता है तो मामला मीडिया में रिपोर्ट हो गया तो मैं झमेले में आ जाऊँगा।
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बाद में नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को भी फंसाने के लिए इस क़ानून का इस्तेमाल करना शुरू किया, और हिन्दू धर्म के सभी संतो को महिला अपराधो के आरोप में जेल में डालने के लिए इसी रूलिंग का इस्तेमाल किया गया।
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अब भारत में जिस तरह का पुलिस सिस्टम एवं अदालतें है उस हिसाब से आप साफ़ तौर पर देख सकते है कि इस रूलिंग का इस्तेमाल करके कोई भी अपेक्षाकृत छोटा आदमी किसी बड़े एवं बहुत ताकतवर आदमी को फंसा नहीं पायेगा, किन्तु बहुत बड़ा आदमी किसी लड़की का इस्तेमाल करके अपने से कमतर प्रतिद्वंदी को आसानी से गिरा देगा।
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उदाहरण के लिए एक मंत्री किसी भी कारखाना मालिक या विधायक आदि को गिरा सकता है, किन्तु ये लोग मंत्री को नहीं फंसा पायेंगे। और सामान्य मामलो में हर बार वो आदमी फंस जायेगा जिसके पास ज्यादा पैसा है। मलतब वह सेटलमेंट करके मुकदमे से तो बच जाएगा किन्तु बदले में पुलिस, नेता एवं जज उससे अच्छा ख़ासा पैसा खींच लेंगे। भ्रष्ट जजों और भ्रष्ट नेताओं ने इस रूलिंग का इस्तेमाल करके अपने काफी प्रतिद्वंदियों को यौन शोषण के मामलों में फंसाया और उनसे पैसा खींचा !!
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नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के क्लोज़ सर्किल में एपोइंट होने के अवसर सिकुड़ गए। पिछले 3 साल में मेरे खुद के सामने ऐसे दर्जन भर वाकये गुजर चुके है जब महिलाओं को इस वजह से नौकरियां गंवानी पड़ी है। और विडम्बना यह है कि उन महिलाओं / लडकियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि इस रूलिंग की वजह से वे नौकरियां गँवा रही है !! ऐसे सैंकड़ो वाकिये है जब महिलाओं ने समृद्ध पुरुषो / नियोक्ताओ को इस रूलिंग का सहार लेकर धमकाया और उनसे पैसा वसूल किया। और इन 0.1% मामलों को पेड मीडिया द्वारा इस तरह कवरेज दिया गया कि शरीफ लोग महिलाओं को नियुक्तियां देने से कतराने लगे !!
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तो महिला सशक्तिकरण के नाम पर क्या गलत हो रहा है ?
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भ्रष्ट जजों की इस रूलिंग को महिला अधिकार कार्यकर्ताओ और पेड विशेषज्ञों ने महिला सुरक्षा से जोड़ा और इसे महिला सशक्तिकरण की तरह प्रचारित किया !!
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समाधान ?
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यदि महिलाओ की सुरक्षा का लिए प्रावधान नहीं बनाए गए तो पुरुषो द्वारा उनके शोषण के मामलों में वृद्धि हो सकती है, और यदि महिलाओं को गलत रूप से अतिरिक्त फायदे दिए गए तो कुछ 0.1% महिलाएं इसका बेजा फायदा उठाएगी और शेष महिलाएं आइसोलेट होने लगेगी। इस स्थिति से निपटने के लिए हमें संतुलन बनाने की जरूरत है। और जूरी कोर्ट के अलावा मैं इस संतुलन का कोई मार्ग नहीं देखता !!
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मेरा प्रस्ताव है कि —
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महिलाओं से सम्बंधित सभी प्रकार के अपराधो की सुनवाई करके का अधिकार महिलाओं की जूरी को दिया जाए। इस जूरी में सिर्फ महिलाएं होंगी।
महिलाओं का चयन मतदाता सूची से किया जायगा और उनका आयु वर्ग 25 वर्ष से 55 वर्ष होगा।
जूरी मंडल में 12 महिलाएं होंगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जायेगी।
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(3)
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दहेज़ वाला क़ानून : दहेज़ वाले क़ानून की वजह से भी काफी गदर मची हुयी है। इस क़ानून को खतरनाक बनाने के लिए इसमें यह प्रावधान जोड़ा गया था कि, लड़की के बयान में लड़की जितने भी सदस्यों के नाम लिखवा देती है, पुलिस को एक बार उन सभी को अरेस्ट करना पड़ता है, और बाद में जमानत शेषन कोर्ट एवं कुछ मामलो में हाई कोर्ट से होती है।
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तो लड़की परिवार के सभी सदस्यों के नाम लिखवा देती थी, और पुलिस परिवार से हफ्ता वसूलने पहुँच जाती है। आज की तारीख में दहेज का क़ानून सबसे ज्यादा कमाई का क़ानून बन गया है, और महानगरो में दहेज़ के मामलो से एक Dysp सर्किल साल के 2 से 5 करोड़ बना लेते है। बाद में यह पैसा जजों समेत उच्च अधिकारियों तक बंट जाता है। यह क़ानून काफी पुराना है (शायद 1985 के आस पास का ) किन्तु बाद में वे इसे धीरे धीरे कठोर बनाते गए।
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इस क़ानून को भी महिला सशक्तिकरण से जोड़ा जाता है !!
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इस क़ानून की वजह से महिलाओ को फर्स्ट राउंड में फायदा होता है किन्तु सेकेण्ड राउंड में बेहद नुकसान होता है। एक बार मुकदमा दर्ज होने के बाद मामला अदालत में जाकर फंस जाता है, और सालों तक महिला का भविष्य अधर में लटका रहता है।
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लाखों परिवारों को लूटने के बाद जब यह बात नागरिको की कॉमन नोलेज में आ गयी कि यह क़ानून लोगो की जिंदगियां बर्बाद कर रहा है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने इस समस्या का समाधान करने का ड्रामा किया। उन्होंने इस आशय की रूलिंग छापी जिसमे — जमानत देने का जिम्मा स्थानीय जज को दे दिया और गिरफ्तारी होगी या नहीं यह फैसला करने के लिए प्रत्येक जिले में एक 5 सदस्यीय कमेटी बनाने की अनुशंषा की।
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इस कमेटी में एक रिटायर्ड जज भी होता है और जज द्वारा नियुक्त कुछ उनके आदमी होते है। इस रूलिंग के आने के बाद अभी दहेज़ के छोटे मोटे मामलो में तत्काल गिरफ़्तारी एवं जमानत को लेकर राहत मिली है, किन्तु बड़े मामलों में कमेटी के लोग गिरफ़्तारी ना होने देने के एवज में पैसा खींच रहे है।
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छोटे मोटे मामलो में भी राहत थोड़े समय के लिए है, और किसी भी समय वे फिर गदर मचाना शुरू कर देंगे। क्योंकि उन्होंने इसका स्विच अपने हाथ में रखा हुआ है।
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यह क़ानून युवतियों / युवको / तलाक शुदाओ / अदालत में फंसे दम्पत्तियों को लिव इन रिलेशन शिप की और धकेल रहा था। किन्तु लिव इन का क़ानून न होने की वजह से समस्या हो रही थी।
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तो अभी पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने बिना शादी के लिव-इन में रहने को कानूनी बनाने के लिए रूलिंग छापी जो कहती है कि -
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1. Two adults have the right to live together even if they have not attained marriageable age.
2. A domestic cohabitation between an adult unmarried male and an adult unmarried female.
3. A domestic cohabitation between a married man and an adult unmarried woman (entered mutually).
4. A domestic cohabitation between an adult unmarried man and a married woman (entered mutually).
5. Partners living together for a long time may have kids together.
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1. दो वयस्कों को एक साथ रहने का अधिकार है, भले ही उन्होंने विवाह योग्य आयु प्राप्त नहीं की हो।
2. एक वयस्क अविवाहित पुरुष और एक वयस्क अविवाहित महिला के बीच एक घरेलू सहवास वैध होगा।
3. एक विवाहित पुरुष और एक वयस्क अविवाहित महिला ( आपसी सहमती के साथ ) के बीच एक घरेलू सहवास वैध है।
4. एक वयस्क अविवाहित पुरुष और एक विवाहित महिला के बीच एक घरेलू सहवास जायज होगा (आपसी सहमती )।
5. लंबे समय तक साथ रहने वाले पार्टनर संतानोत्पत्ति भी कर सकते हैं।

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दहेज़ के क़ानून की वजह से शादी करने में जोखिम बढ़ गया है। अत: युवक अब लिव-इन को तरजीह देने लगे है !! साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ कर दिया है कि यदि लिव इन में रहते हुए संतान हो जाती है तो यह मान्य होगी !! तो अभी कुछ सालो बाद आपको इन सब गेजेट नोटिफिकेशन के साइड इफेक्ट देखने को मिलेंगे।
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और तब तक आपका ध्यान इन कानूनो से हटाने के लिए पेड विशेषग्य अपने अखबारों में महिला सशक्तिकरण के बारे में लिखते रहेंगे और "जागरूक नागरिक" अन्य लोगो को जागरूक करने लिए उन्हें बताते रहेंगे कि देखो भारत की संस्कृति को क्या हो गया है, और हम कहाँ जा रहे, च्च च्च !! और इसी टाइप की ज्ञान और उपदेश की बातें !! उनके हिसाब से च्च च्च करना, लानत भेजना और उपदेश करना ही समाधान है !! मेरे हिसाब से से समाधान से ध्यान हटाने का नुस्खा है, ताकि समस्या पनपती रहे !!
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समाधान ?
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दहेज़ और घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई महिलाओं की जूरी द्वारा की जाए। दहेज़-घरेलू हिंसा की शिकायत आने पर जूरी का गठन होगा रोजाना सुनवाई के कारण हफ्ते दो हफ्ते में फैसला आ जाएगा। जूरी कोर्ट के आने से अगले 6 महीने में भारत की अदालतों में लंबित सभी दहेज़ के मुकदमो का निस्तारण हो जाएगा। ( जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट जूरी मंच में देखें। )
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अब यदि आपको Hypocrisy at its Best देखनी हो तो किस भी नारी वादी विशेषग्य से पूछ सकते है कि, क्या महिला सम्बन्धी अपराध की सुनवाई करने का अधिकार महिलाओं की जूरी को दिया जाना चाहिए ?
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वे आपको एक बहुत ही फैला हुआ किन्तु परन्तु से युक्त बौद्धिक जवाब देंगे, लकिन इसका निचोड़ यही होगा कि -- नहीं !! नहीं !! नहीं !! महिलाओं के खिलाफ मुकदमो की सुनवाई का अधिकार महिलाओं की जूरी को नहीं दिया जाना चाहिए !!
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और यही जवाब आपको दहेज़ वाले क़ानून पर भी मिलेगा। उनका हमेशा से यही स्टेंड रहता है, कि दहेज़ के मामलो की सुनवाई का अधिकार महिलाओं की जूरी को नहीं दिया जाना चाहिए।
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जहाँ तक महिला आयोग की बात है, मेरा स्टेंड है कि महिला आयोग का महिला सशक्तिकरण से कोई लेना देना ही नही है। असल में बहुधा नारीवादी संगठन संवेदनाएं बेचने के कारोबार में है और जिस नीति पर काम कर रहे है वह नीति महिलाओं को सशक्त होने से रोकने का काम करती है। इनकी नीति महिलाओं को उत्पादक और आत्मनिर्भर बनाने की जगह उन्हें अनुत्पादक बनाती है।
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AIMIM के विधायक रहे वारिस पठान के विवादास्पद बयान "हम 15 करोड़ हैं लेकिन हम 100 करोड़ पर भारी हैं" को आप किस तरह से देखते हैं?
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2014 के लोकसभा चुनावों से पहले की बात है, जब PMP10 के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने कुछ इसी आशय का एक विभाजनकारी बयान दिया था। यदि ओवैसी का जूरी ट्रायल किया जाता तो यह 100% तय था कि उसे हफ्ते भर में ही कम से कम 3 से 5 साल की जेल हो जाती।
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तब PMP02 के सभी नेताओं एवं कार्यकर्ताओ ने अकबरुद्दीन ओवैसी के जूरी ट्रायल का विरोध किया था। दरअसल, वे इस हेट स्पीच को भारत के प्रत्येक हिन्दू तक पहुँचाने का टार्गेट* लेकर काम कर रहे थे !!
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हिन्दू जब – “लोग-बाग़ बोल रहे है कि मोड़ी वजीरे आजम बन जायेगा। देखते है कि कईसा बनता है” डायलॉग सुनता था, तो इसे चुनौती की तरह लेता था, और यह तय कर लेता था कि पीएम तो मोदी ही बनना चाहिए !! इस अकेली हेट स्पीच ने PMP02 के नेता के खाते में लगभग 5 करोड़ वोट जोड़ दिए थे !!
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लगभग 3 करोड़ वोट मोदी साहेब के खाते में पेड रविश कुमार एवं पेड राजदीप सरदेसाई ने जोड़े थे। इन दोनों आदमियों को 2013 में यह पेमेंट मिलनी शुरू हुयी कि वे गोधरा काण्ड को फिर से जिन्दा करें, और हिन्दुओ को यह सूचना दें कि मोदी साहेब एंटी मुस्लिम एवं हिंदूवादी है !!
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दोनों ने यह काम बेहद सफाई से किया !! पेड रविश कुमार आज भी इसी लाइन पर प्रसारण करने की पेमेंट ले रहे है। वे अपने किसी भी एपिसोड में हिन्दुओ को यह सूचना देना नहीं भूलते कि मोदी साहेब हिंदूवादी है !! और यह सुनकर हिन्दू मोदी साहेब की और जाना शुरू कर देते है। ( भारत में कितने प्रतिशत हिन्दू है ? 80% !! )
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यह ध्रुवीकरण एवं प्रतिध्रुविकरण का सीधा फार्मूला है। यदि आप हिन्दुओ को किसी एक ध्रुव पर इकट्ठा करना चाहते है तो आपको दो तरह के समूह चाहिए होते है –
ध्रुवीकरण करने वाला समूह A : ऐसे नेता जो हिन्दुओ को ध्रुव X की तरफ खींचेंगे
प्रतिध्रुविकरण करने वाला समूह B : ऐसे नेता जो हिन्दुओ को ध्रुव X की तरफ धकेलेंगे
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यदि समूह B के नेता हिन्दुओ को धकेलते नहीं है तो हिन्दुओ को खींचने की समूह A के नेताओं की क्षमता घटती जाएगी, और हिन्दुओ को लगेगा कि समूह A के नेता ध्रुवीकरण करने के लिए हिन्दुवाद को जाया तौर पर बेच रहे है।
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दुसरे शब्दों में, मोदी साहेब एवं श्री अमित शाह जैसे नेताओ को टिकाये रखने के लिए ओवैसी, वारिस पठान, ममता बनर्जी, मुलायम सिंह जैसे समूह B के नेताओ का होना जरुरी है। यदि समूह B के नेता प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर रहे है तो उन्हें पेड मीडिया का इस्तेमाल करके टुकड़े टुकड़े गैंग, शरजिल इमाम और इस तरह के टोकन जमूरो को प्लांट करना पड़ेगा, ताकि संतुलन बनाकर रखा जा सके। ध्रुवीकरण की गाड़ी में दो पहिये होते है, यदि दुसरे पहिये में हवा कम होने लगे तो रफ़्तार धीमी हो जाती है।
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भारत में साम्प्रदायिक अलगाव बढ़ाना पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा है, और वे अपनी पार्टियों एवं नेताओं का इस्तेमाल ऐसा करने में कर रहे है। जैसे जैसे ईरान एवं अमेरिका में तनाव बढेगा वैसे वैसे भारत में भी हिन्दू-मुस्लिम तनाव एवं अलगाव बढ़ता चला जाएगा।
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मेरा बिंदु यह है कि, यदि 2013 में ओवेसी का जूरी ट्रायल एवं सार्वजनिक नार्को टेस्ट हो जाता तो पिछले 7 वर्षो से भड़काऊ बयानों का जो सिलसिला आप देख रहे है, वह शुरू होते ही ख़त्म हो जाता था !!
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PMP10 के नेता वारिस पठान के बयान पर मेरा स्टेंड :
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मेरा मानना है कि, यह बयान स्क्रिप्टेड है। पठान को किसने यह बयान देने को कहा इस बारे में मैं पक्के तौर पर कुछ कह नहीं सकता। इसके लिए मेरा प्रस्ताव निम्नलिखित है :
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मुंबई की मतदाता सूची में से 250 नागरिको की जूरी बुलायी जाये और पठान को इस जूरी के सामने पेश किया जाए। जूरी बहुमत से यह तय करेगी कि पठान का सार्वजनिक नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए या नहीं। यदि मुझे जूरी में आने का अवसर मिलता है तो मैं पठान से एक भी सवाल पूछे बिना इसका सीधा नार्को टेस्ट लेने की अनुशंषा करूँगा। ज्यादातर सम्भावना है कि नारको टेस्ट के इंजेक्शन में सोडियम पेंथानोल की दवाई भरी जा रही होगी उसी समय पठान सब कुछ बोलना शुरू कर देगा और सुई लगाने की नौबत नहीं आएगी।
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साथ ही मैं पठान पर निम्नलिखित दंड लगाने के लिए वोट करूँगा :
वारिस पठान पर उसकी संपत्ति का 20% आर्थिक दंड के रूप में वसूला जाए
1 वर्ष का कारावास (यदि कोई साजिश नहीं पायी जाती है तो)
उसे जेल से छूटने के बाद अगले 3 माह तक किसी भी टीवी चेनल पर आने की अनुमति नहीं होगी
यदि यह बात सामने आ जाती है कि पठान को यह बयान देने के लिए किसने कहा था तो वारिस पठान की सजाएं 3 गुना हो जाएगी एवं सूत्रधार को भी यही सजाएं मिलेगी।
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पठान को यदि जूरी दण्डित कर देती है तो आप देखेंगे कि अगले दिन से भारत में कोई भी नेता साम्प्रदायिक तनाव भड़काने वाले बयान देने की हिम्मत नहीं दिखाएगा !!
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वारिस पठान द्वारा 3 मार्च 2019 को यह फ़ोटो पोस्ट की गयी थी !! साथ में PMP02 यानी संघ के नेता पियूष गोयल एवं डेविड फड़नवीस भी है।
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(i) पियूष गोयल, जिनका कहना है कि — ला इलाहा इल्ल्लाह.... रसूलउल्लाह ( कलमा ) मेरे दिल के बेहद करीब है, और रोज जब मैं पूजा करता हूँ तो यह कलमा अवश्य पढता हूँ !!
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37 सेकेण्ड का यह वीडियो देखें - Union Minister Piyush Goyal : I recite "La ilaha illallah Muhammadur rasulullah" every morning
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( मैं किसी के धार्मिक विश्वास में दखल नहीं करता, अत: मैं यहाँ उनके कलमा पढ़ने को मुद्दा नहीं बना रहा हूँ। मैं सिर्फ एक सूचना रख रहा हूँ। ताकि आम पाठक इससे सूचित रहे।)
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(ii) देवेन्द्र फड़नवीस ने जब से पेड मीडिया के प्रायोजको ( बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक एवं मिशनरीज ) के निर्देश पर महाराष्ट्र के मंदिरों को टेक ओवर करना शुरू किया ताकि मंदिरों की संपत्ति बेचकर पैसा उगाया जा सके, तब से वे डेविड फड़नवीस के नाम से भी जाने जाते है। डेविड फड़नवीस ने महाराष्ट्र के 4,000 मंदिर ट्रस्टो की जमीन हथियाने के आदेश गेजेट में छापे थे
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State govt. to allow sale of temple land
इसके अलावा डेविड फड़नवीस ने मुख्यमंत्री रहते हुए मिशनरीज को आगे बढाने के लिए काफी प्रयास किये थे। उदाहरण, के लिए मुंबई में कोई आचार्य विकास मैसी कन्वर्जन के वर्क शॉप चला रहे थे, तो डेविड फड़नवीस ने अपने नेताओ को आदेश किये थे कि वे जनता को इस कार्यक्रम में शिरकत करने को कहे ताकि यीशु का सन्देश ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुँचाया जा सके।
✔@ShelarAshishAdv. Ashish Shelar - ॲड. आशिष शेलारAll r welcome ! Pls join !3405:25 pm - 16 दिस॰ 2017Twitter Ads की जानकारी और गोपनीयता
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हालांकि अब मध्य प्रदेश में PMP01 के नेता कमलनाथ जब अपने प्रायोजको के निर्देश पर मंदिरों की जमीन हथिया रहे है तो PMP02 के नेता कमलनाथ के इस फैसले का विरोध कर रहे है !!
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कमलनाथ सरकार मकान-दुकान बनाने के लिए मंदिरों की जमीन बिल्डर्स को बेचेगी ]
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[ टिप्पणी : फोटो में PMP10 के नेता वारिस पठान PMP02 के नेताओं के साथ नजर आ रहे है, किन्तु इस चित्र से मेरा आशय यह नहीं है कि, PMP02 के नेता डेविड फड़नवीस के कहने पर वारिस पठान ने यह बयान दिया है, या फिर वारिस पठान डेविड फड़नवीस के कंट्रोल में काम करते है। दरअसल, दोनों का प्रायोजक पेड मीडिया है, और वे सीधे पेड मीडिया के मालिको को ही रिपोर्ट करते है। इस तरह के बयान देने के लिए जजों पर कंट्रोल चाहिये। वर्ना जज पठान को 2 साल के लिए जेल में डाल देगा। हमारे जज भी सीधे पेड मीडिया के मालिको को रिपोर्ट करते है, अत: इस तरह की हरकत आदमी सिर्फ तभी कर सकता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक उसे निर्देश दें !! ]
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समाधान ?
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भारत के जिन कार्यकर्ताओ को हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने वाले इस सिलसिले को रोकने में रुचि है, उन्हें जूरी कोर्ट एवं सार्वजनिक नार्को टेस्ट के क़ानून को गेजेट में छपवाने को गंभीरता से लेना शुरू करना चाहिए। जूरी कोर्ट गेजेट में आने 24 घंटे के अंदर तनाव भड़काने वाला यह सारा तमाशा बंद हो जायेगा। क्योंकि तब आग लगाने वाले बयान देने वाले नेता जान जायेंगे कि अब उनके प्रायोजक उन्हें बचाने की क्षमता खो चुके है।
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पेड मीडिया पार्टियों का वारिस पठान के बयान पर स्टेंड :
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पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित सभी पार्टियाँ एवं उनके नेता वारिस पठान को जूरी के सामने पेश किये जाने एवं उसका सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेने के सख्त खिलाफ है। आपको यदि विश्वास न हो तो आप खुद उनके नेताओ से इस बारे में ट्विटर पर पूछ सकते है। वे यही कहेंगे कि न तो वारिस पठान को नागरिको की जूरी के सामने पेश किया जाना चाहिए और न ही उसका सार्वजनिक नार्को टेस्ट होना चाहिए !! उनका साफ़ स्टेंड है कि, वारिस पठान का मुकदमा जज ही सुनेगा।
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पेड मीडिया पार्टियों के सभी कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी भी वारिस पठान के जूरी ट्रायल एवं सार्वजनिक नार्को टेस्ट के खिलाफ है। वे वारिस पठान को गालियाँ देंगे, और वारिस पठान के बयान का इस्तेमाल हिन्दुओ का खून गरम करने में करेंगे।
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दरअसल, आप आस पास नजर डालेंगे तो अपने चारो तरफ उन्ही लोगो को पायेंगे जो समाधान की अवहेलना करके इस तरह की घटनाओं का इस्तेमाल साम्प्रदायिक तनाव बढाने में कर रहे है !! और इनमे से कई लोगो को इस बात का अहसास तक नहीं है। और यही पेड मीडिया की ताकत है।
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( PMP = पेड मीडिया पार्टी। PMP01 - कोंग्रेस, PMP02 - संघ=बीजेपी , PMP03 - आम आदमी पार्टी, PMP10 - आल इण्डिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लमीन ( AIMIM )
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क्या कारण हैं कि निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की उत्पादन क्षमता सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों से अधिक होती है?
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निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को नौकरी से निकालने एवं उन्हें पदोन्नत करने का अधिकार कम्पनी के मालिको एवं शेयर होल्डर्स के पास होने के कारण निजी क्षेत्र के कर्मचारी एवं मैनेजर निरंतर कुशलता एवं ईमानदारी से कार्य करते है - बस यही वजह है। इसके अलावा कोई वजह नहीं।
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यदि भारत में निचे दिया गया क़ानून लागू कर दिया जाए तो मेरा मानना है कि अगले दिन से ही निजी क्षेत्र के कर्मचारी भी सरकारी अधिकारियों एवं नेताओं के स्तर को छू लेंगे :

यदि किसी फैक्ट्री के शेयर होल्डर्स ( मालिक ) किसी मैनेजर को नौकरी पर रखते है तो उसे 5 वर्ष से पहले नौकरी से नहीं निकालेंगे। और यदि उन्होंने किसी कर्मचारी को नौकरी पर रखा है तो शेयर होल्डर्स उसे अगले 30 वर्षो तक नौकरी से नहीं निकाल सकेंगे। यदि मालिक किसी कर्मचारी के आचरण से पीड़ित है तो वह मेनेजर से शिकायत कर सकते है। और मैनेजर की इच्छा है तो वह अमुक कर्मचारी को नौकरी से निकाल भी सकता है, और नहीं भी निकाल सकता है।

स्पष्टीकरण : शेयर होल्डर्स को मैनेजरो के बारे में जितनी छानबीन करनी है, उसे नौकरी पर रखने से पहले ही करनी होगी। यदि एक बार नौकरी पर रखने के बाद मैनेजर को 5 वर्ष से पहले नौकरी से निकाला नही जा सकेगा ।

मैनेजरो एवं सभी कर्मचारियों को हर महीने की एक तारीख को तय वेतन का भुगतान अनिवार्य रूप से किया जायेगा।

स्पष्टीकरण : यदि नौकर काम पर नही आता है, या केवल टाइम पास करने के लिए घंटे दो घंटे के लिए आकर चला जाता है, तब भी नौकर को पूरे वेतन का भुगतान किया जाएगा। हालांकि शेयर होल्डर्स सम्बंधित यूनिट के मैनेजर से इसकी शिकायत कर सकते है। मैनेजर चाहे तो कर्मचारी को चेतावनी दे सकता है, या उसे नौकरी से निकाल सकता है, और नहीं भी निकाल सकता है।

फैक्ट्री की विभिन्न यूनिट्स के मेनेजरो को यह अधिकार होगा कि वे आपस में सलाह मशविरा करके अपने वेतन, भत्तो, सुविधाओं में वृद्धि करना चाहे तो कर सके। मैनेजर चाहे तो नौकरों के वेतन में भी वृद्धि कर सकते है।

स्पष्टीकरण : मैनेजरों ने खुद के वेतन में जो भी वृद्धि की है शेयर होल्डर्स अदा करने के लिए बाध्य होंगे। इसमें विशेष बिंदु यह है कि मैनेजरो का समूह अपनी वेतन वृद्धि के बारे में शेयर होल्डर्स को सिर्फ सूचित करेगा किन्तु उनसे अनुमति नहीं लेगा। यदि फैक्ट्री में पैसा कम है तो मैनेजर शेयर होल्डर्स पर टेक्स या पेनेल्टी लगाकर और पैसा मांग सकते है, या फैक्ट्री के स्वामित्व में स्थित अन्य कोई संपत्तियां बेचकर अपनी पूर्ती कर सकते है।

5 वर्ष बाद शेयर होल्डर्स को अपने मैनेजरों को बदलने का एक दिवसीय मौका मिलेगा। तब वे चाहे तो किसी मैनेजर को बदल सकते है। किन्तु नौकर वही रहेंगे और उन्हें किसी भी सूरत में बदला नही जा सकेगा।

यदि शेयर होल्डर्स किसी नौकर के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराते है तो शिकायत की जांच उसकी यूनिट का मैनेजर ही करेगा, एवं अपील किसी अन्य यूनिट के मैनेजर के यहाँ की जा सकेगी। किन्तु शेयर होल्डर्स को नौकरों के खिलाफ जांच करने और फैसला सुनाने का अधिकार नही होगा।

यदि कोई शेयर होल्डर्स अपने किसी मैनेजर या नौकर के कार्य से संतुष्ट नही है या नौकर फैक्ट्री को गंभीर क्षति पहुंचा रहा है, तो वे अमुक मैनेजर को सीधी राह पर लाने के लिए रोड़ पर आकर अनशन, धरने, प्रदर्शन आदि विधियों का प्रयोग कर सकेंगे। किन्तु शेयर होल्डर्स न तो मैनेजरो का वेतन रोक सकेंगे और न ही उन्हें नौकरी से निकाल सकेंगे। यदि अमुक शेयर होल्डर्स समृद्ध है तो सोशल मीडिया आदि पर भी अपना असंतोष वगेरह प्रकट कर सकते है।
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शेयर होल्डर्स के लिए सुझाव :
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कृपया नौकरी पर रखने से पूर्व अपने मेनेजरो के बारे में गहन जांच पड़ताल करें तथा ईमानदार मैनेजर को ही चुने। बेहतर होगा कि आप मेनेजर का ब्लड टेस्ट करवा ले कि उसमें HBC ( Honest Blood Cells ) यानी ईमानदारू कोशिकाओ का स्तर क्या है। प्रत्येक मनुष्य के खून में ये कोशिकाएं पायी जाती है। पेड मीडिया कर्मी जब भी आपको ईमानदार मेनेजर को नौकरी पर रखने की सलाह देते है तो उनका आशय HBC काउंट चेक करने से ही होता है। HBC टेस्टिंग के बारे और अधिक जानकारी के लिए आप किसी भी पेड मीडिया कर्मी या पेड बुद्धिजीवी से सम्पर्क कर सकते है।
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इस क़ानून के आने से क्या परिवर्तन आयेंगे ?
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मेरा मानना है कि, जल्दी ही फैक्ट्री की अलग अलग यूनिट्स के सभी मैनेजर आपस में गठजोड़ बना लेंगे और नौकर भी इनके गठजोड़ में शामिल हो जायेंगे। यदि शेयर होल्डर्स 5 वर्ष बाद मेनेजरो को बदल भी देंगे तो नियुक्त होने के साथ ही वे भी भ्रष्ट हो जायेंगे। और यदि इत्तिफाक से कोई ईमानदार मैनेजर आ भी जाता है तो शेष मेनेजर मिलकर या तो उसे दबा देंगे या फिर शेष मैनेजरों का भ्रष्टाचार जारी रहेगा।
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फैक्ट्री को सबसे अधिक नुकसान नौकरों की तरफ से होगा। चूंकि उन्हें 30 वर्ष से पहले किसी भी स्थिति में निकाला नहीं जा सकता अत: उनमे से ज्यादातर भ्रष्ट हो जायेंगे, और ईमानदार मैनेजर के आने के बावजूद नौकरों का भ्रष्टाचार जारी रहेगा। जो भी नये मैनेजर आयेंगे, ये भ्रष्ट नौकर जल्द ही उनसे गठजोड़ बना लेंगे। अब मैनेजरों एवं नौकरों का ये गठजोड़ फैक्ट्री में चोरी चकारी करना शुरू करेगा, और धीरे धीरे फैक्ट्री की उत्पादन क्षमता गिरने लगेगी। और तब एक बिंदु के बाद फैक्ट्री की दशा यह हो जायेगी कि उसे चलाना मुश्किल हो जाएगा। तब मैनेजर वगेरह इसकी विभिन्न यूनिट्स को घूस खाकर बेचना शुरू करेंगे, और एक एक करके सभी यूनिट्स बेच देने के बाद फैक्ट्री बंद हो जायेगी।
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यदि आपको ये सब मजाक लग रहा है तो आप वही बात कह रहे है, जो कि 1925 में अहिंसा मूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल एवं अहिंसा मूर्ती महात्मा चन्द्र शेखर आजाद ने कही थी, तथा 1927 में अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी ने इस बात को दोहराया था।
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भारत में पिछले 70 वर्षो से देश की राजनेतिक व्यवस्था इसी तरीके से चल रही है। ऊपर दी गयी व्यवस्था में यदि आप मैनेजरों की जगह जन प्रतिनिधियों ( विधायक, सांसद, पार्षद, सरपंच ) को तथा नौकरो की जगह सरकारी अधिकारियों को रख ले तो आप इस फैक्ट्री के शेयर होल्डर है !!
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भारत के नागरिको के पास शीर्ष सरकारी अधिकारियों को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है। इसके अलावा भारत के नागरिको के पास सरकारी अधिकारीयों को दण्डित करने की शक्ति भी नहीं है। नागरिको के प्रति वे शून्य जवाबदेह है। उन्हें बस अपने उच्च अधिकारी को खुश रखना होता है। तो वे जनता से जो घूस वसूलते है उसमे से एक हिस्सा उच्च अधिकारियों को दे देते है। और जो अधिकारी ज्यादा घूस ऊपर पहुंचाता है उसकी पदोन्नति के अवसर भी बढ़ जाते है। इस तरह यहाँ नकारात्मक प्रोत्साहन है।
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निजी क्षेत्र में मालिक के पास अपने नौकर को नौकरी से निकालने एवं पदोन्नत करने का अधिकार होता है, अत: कर्मचारी अपना बेहतर योगदान देने की कोशिश करते है।
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अमेरिका के सरकारी विभागों में भारत की तुलना में कम भ्रष्टाचार क्यों है ?
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अमेरिका के नागरिको के पास अपने कई जिला एवं राज्य स्तर के अधिकारियों जैसे एसपी, शिक्षा अधिकारी, जिला जज, मुख्यमंत्री आदि को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को वोट वापसी कहते है। नौकरी से निकाले जाने के इस भय की वजह से वे जनता के प्रति जवाबदेह बने रहते है, और कार्यकुशलता का प्रदर्शन करते है। यदि कोई अधिकारी निकम्मापन एवं भ्रष्ट आचरण करता है तो वहां के नागरिक बहुमत का प्रदर्शन करके उन्हें नौकरी से निकाल देते है। इसके अलावा यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो उसकी सुनवाई करने एवं दंड देने की शक्ति भी वहां के नागरिको के पास है।
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मेरा मानना है यदि अमेरिका के नागरिको से वोट वापसी का क़ानून छीन लिया जाए तो महीने भर में ही अमेरिका के सरकारी अधिकारी भारतीय अधिकारियों से भी ज्यादा निकम्मे हो जायेंगे और आम अमेरिकी से किसी न किसी बहाने से घूस वसूलना शुरू कर देंगे।
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बहरहाल, हमें अमेरिका की व्यवस्था को बदतर बनाने की जगह इस बात पर विचार करना चाहिए कि भारत के सरकारी विभागों को किस तरह ईमानदार एवं कार्यकुशल बनाया जा सकता है।
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भारत के सरकारी विभागों को कार्यकुशल एवं ईमानदार बनाने के लिए क्या उपाय करना चाहिए ?
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मेरा मानना है कि यदि भारत में वोट वापसी एवं जूरी सिस्टम कानून लागू कर दिए जाते है तो भ्रष्टाचार में तेजी से गिरावट आएगी, और सरकारी अधिकारीयों की कार्य कुशलता में सुधार होने लगेगा। मैंने इसके लिए जूरी कोर्ट का क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निम्नलिखित अधिकारी इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे :

जिला पुलिस प्रमुख
जिला शिक्षा अधिकारी
जिला चिकित्सा अधिकारी
जिला जूरी प्रशासक
मिलावट रोक अधिकारी
DD चेयरमेन
RBI गवर्नर
CBI डायरेक्टर
BSNL चेयरमेन
सेंसर बोर्ड चेयरमेन
जिला जज
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
राष्ट्रिय जूरी प्रशासक
केन्द्रीय सूचना आयुक्त
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तब यदि आप ऊपर दिए गए किसी अधिकारी के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है।
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इसके अलावा यदि उपरोक्त अधिकारियों के खिलाफ को शिकायत आती है तो इसकी सुनवाई आम नागरिको की जूरी करेगी। यदि आपका नाम वोटर लिस्ट में है तो यह कानून पास होने के बाद आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। जूरी का चयन वोटर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा और मामले की गंभीरता देखते हुए जूरी मंडल में 15 से 1500 तक सदस्य होंगे।
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जूरी कोर्ट का पूरा ड्राफ्ट जूरी कोर्ट मंच पर देखा जा सकता है

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क्या कारण हैं कि निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की उत्पादन क्षमता सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों से अधिक होती है?
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निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को नौकरी से निकालने एवं उन्हें पदोन्नत करने का अधिकार कम्पनी के मालिको एवं शेयर होल्डर्स के पास होने के कारण निजी क्षेत्र के कर्मचारी एवं मैनेजर निरंतर कुशलता एवं ईमानदारी से कार्य करते है - बस यही वजह है। इसके अलावा कोई वजह नहीं।
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यदि भारत में निचे दिया गया क़ानून लागू कर दिया जाए तो मेरा मानना है कि अगले दिन से ही निजी क्षेत्र के कर्मचारी भी सरकारी अधिकारियों एवं नेताओं के स्तर को छू लेंगे :

यदि किसी फैक्ट्री के शेयर होल्डर्स ( मालिक ) किसी मैनेजर को नौकरी पर रखते है तो उसे 5 वर्ष से पहले नौकरी से नहीं निकालेंगे। और यदि उन्होंने किसी कर्मचारी को नौकरी पर रखा है तो शेयर होल्डर्स उसे अगले 30 वर्षो तक नौकरी से नहीं निकाल सकेंगे। यदि मालिक किसी कर्मचारी के आचरण से पीड़ित है तो वह मेनेजर से शिकायत कर सकते है। और मैनेजर की इच्छा है तो वह अमुक कर्मचारी को नौकरी से निकाल भी सकता है, और नहीं भी निकाल सकता है।

स्पष्टीकरण : शेयर होल्डर्स को मैनेजरो के बारे में जितनी छानबीन करनी है, उसे नौकरी पर रखने से पहले ही करनी होगी। यदि एक बार नौकरी पर रखने के बाद मैनेजर को 5 वर्ष से पहले नौकरी से निकाला नही जा सकेगा ।

मैनेजरो एवं सभी कर्मचारियों को हर महीने की एक तारीख को तय वेतन का भुगतान अनिवार्य रूप से किया जायेगा।

स्पष्टीकरण : यदि नौकर काम पर नही आता है, या केवल टाइम पास करने के लिए घंटे दो घंटे के लिए आकर चला जाता है, तब भी नौकर को पूरे वेतन का भुगतान किया जाएगा। हालांकि शेयर होल्डर्स सम्बंधित यूनिट के मैनेजर से इसकी शिकायत कर सकते है। मैनेजर चाहे तो कर्मचारी को चेतावनी दे सकता है, या उसे नौकरी से निकाल सकता है, और नहीं भी निकाल सकता है।

फैक्ट्री की विभिन्न यूनिट्स के मेनेजरो को यह अधिकार होगा कि वे आपस में सलाह मशविरा करके अपने वेतन, भत्तो, सुविधाओं में वृद्धि करना चाहे तो कर सके। मैनेजर चाहे तो नौकरों के वेतन में भी वृद्धि कर सकते है।

स्पष्टीकरण : मैनेजरों ने खुद के वेतन में जो भी वृद्धि की है शेयर होल्डर्स अदा करने के लिए बाध्य होंगे। इसमें विशेष बिंदु यह है कि मैनेजरो का समूह अपनी वेतन वृद्धि के बारे में शेयर होल्डर्स को सिर्फ सूचित करेगा किन्तु उनसे अनुमति नहीं लेगा। यदि फैक्ट्री में पैसा कम है तो मैनेजर शेयर होल्डर्स पर टेक्स या पेनेल्टी लगाकर और पैसा मांग सकते है, या फैक्ट्री के स्वामित्व में स्थित अन्य कोई संपत्तियां बेचकर अपनी पूर्ती कर सकते है।

5 वर्ष बाद शेयर होल्डर्स को अपने मैनेजरों को बदलने का एक दिवसीय मौका मिलेगा। तब वे चाहे तो किसी मैनेजर को बदल सकते है। किन्तु नौकर वही रहेंगे और उन्हें किसी भी सूरत में बदला नही जा सकेगा।

यदि शेयर होल्डर्स किसी नौकर के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराते है तो शिकायत की जांच उसकी यूनिट का मैनेजर ही करेगा, एवं अपील किसी अन्य यूनिट के मैनेजर के यहाँ की जा सकेगी। किन्तु शेयर होल्डर्स को नौकरों के खिलाफ जांच करने और फैसला सुनाने का अधिकार नही होगा।

यदि कोई शेयर होल्डर्स अपने किसी मैनेजर या नौकर के कार्य से संतुष्ट नही है या नौकर फैक्ट्री को गंभीर क्षति पहुंचा रहा है, तो वे अमुक मैनेजर को सीधी राह पर लाने के लिए रोड़ पर आकर अनशन, धरने, प्रदर्शन आदि विधियों का प्रयोग कर सकेंगे। किन्तु शेयर होल्डर्स न तो मैनेजरो का वेतन रोक सकेंगे और न ही उन्हें नौकरी से निकाल सकेंगे। यदि अमुक शेयर होल्डर्स समृद्ध है तो सोशल मीडिया आदि पर भी अपना असंतोष वगेरह प्रकट कर सकते है।
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शेयर होल्डर्स के लिए सुझाव :
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कृपया नौकरी पर रखने से पूर्व अपने मेनेजरो के बारे में गहन जांच पड़ताल करें तथा ईमानदार मैनेजर को ही चुने। बेहतर होगा कि आप मेनेजर का ब्लड टेस्ट करवा ले कि उसमें HBC ( Honest Blood Cells ) यानी ईमानदारू कोशिकाओ का स्तर क्या है। प्रत्येक मनुष्य के खून में ये कोशिकाएं पायी जाती है। पेड मीडिया कर्मी जब भी आपको ईमानदार मेनेजर को नौकरी पर रखने की सलाह देते है तो उनका आशय HBC काउंट चेक करने से ही होता है। HBC टेस्टिंग के बारे और अधिक जानकारी के लिए आप किसी भी पेड मीडिया कर्मी या पेड बुद्धिजीवी से सम्पर्क कर सकते है।
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इस क़ानून के आने से क्या परिवर्तन आयेंगे ?
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मेरा मानना है कि, जल्दी ही फैक्ट्री की अलग अलग यूनिट्स के सभी मैनेजर आपस में गठजोड़ बना लेंगे और नौकर भी इनके गठजोड़ में शामिल हो जायेंगे। यदि शेयर होल्डर्स 5 वर्ष बाद मेनेजरो को बदल भी देंगे तो नियुक्त होने के साथ ही वे भी भ्रष्ट हो जायेंगे। और यदि इत्तिफाक से कोई ईमानदार मैनेजर आ भी जाता है तो शेष मेनेजर मिलकर या तो उसे दबा देंगे या फिर शेष मैनेजरों का भ्रष्टाचार जारी रहेगा।
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फैक्ट्री को सबसे अधिक नुकसान नौकरों की तरफ से होगा। चूंकि उन्हें 30 वर्ष से पहले किसी भी स्थिति में निकाला नहीं जा सकता अत: उनमे से ज्यादातर भ्रष्ट हो जायेंगे, और ईमानदार मैनेजर के आने के बावजूद नौकरों का भ्रष्टाचार जारी रहेगा। जो भी नये मैनेजर आयेंगे, ये भ्रष्ट नौकर जल्द ही उनसे गठजोड़ बना लेंगे। अब मैनेजरों एवं नौकरों का ये गठजोड़ फैक्ट्री में चोरी चकारी करना शुरू करेगा, और धीरे धीरे फैक्ट्री की उत्पादन क्षमता गिरने लगेगी। और तब एक बिंदु के बाद फैक्ट्री की दशा यह हो जायेगी कि उसे चलाना मुश्किल हो जाएगा। तब मैनेजर वगेरह इसकी विभिन्न यूनिट्स को घूस खाकर बेचना शुरू करेंगे, और एक एक करके सभी यूनिट्स बेच देने के बाद फैक्ट्री बंद हो जायेगी।
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यदि आपको ये सब मजाक लग रहा है तो आप वही बात कह रहे है, जो कि 1925 में अहिंसा मूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल एवं अहिंसा मूर्ती महात्मा चन्द्र शेखर आजाद ने कही थी, तथा 1927 में अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी ने इस बात को दोहराया था।
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भारत में पिछले 70 वर्षो से देश की राजनेतिक व्यवस्था इसी तरीके से चल रही है। ऊपर दी गयी व्यवस्था में यदि आप मैनेजरों की जगह जन प्रतिनिधियों ( विधायक, सांसद, पार्षद, सरपंच ) को तथा नौकरो की जगह सरकारी अधिकारियों को रख ले तो आप इस फैक्ट्री के शेयर होल्डर है !!
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भारत के नागरिको के पास शीर्ष सरकारी अधिकारियों को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है। इसके अलावा भारत के नागरिको के पास सरकारी अधिकारीयों को दण्डित करने की शक्ति भी नहीं है। नागरिको के प्रति वे शून्य जवाबदेह है। उन्हें बस अपने उच्च अधिकारी को खुश रखना होता है। तो वे जनता से जो घूस वसूलते है उसमे से एक हिस्सा उच्च अधिकारियों को दे देते है। और जो अधिकारी ज्यादा घूस ऊपर पहुंचाता है उसकी पदोन्नति के अवसर भी बढ़ जाते है। इस तरह यहाँ नकारात्मक प्रोत्साहन है।
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निजी क्षेत्र में मालिक के पास अपने नौकर को नौकरी से निकालने एवं पदोन्नत करने का अधिकार होता है, अत: कर्मचारी अपना बेहतर योगदान देने की कोशिश करते है।
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अमेरिका के सरकारी विभागों में भारत की तुलना में कम भ्रष्टाचार क्यों है ?
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अमेरिका के नागरिको के पास अपने कई जिला एवं राज्य स्तर के अधिकारियों जैसे एसपी, शिक्षा अधिकारी, जिला जज, मुख्यमंत्री आदि को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को वोट वापसी कहते है। नौकरी से निकाले जाने के इस भय की वजह से वे जनता के प्रति जवाबदेह बने रहते है, और कार्यकुशलता का प्रदर्शन करते है। यदि कोई अधिकारी निकम्मापन एवं भ्रष्ट आचरण करता है तो वहां के नागरिक बहुमत का प्रदर्शन करके उन्हें नौकरी से निकाल देते है। इसके अलावा यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो उसकी सुनवाई करने एवं दंड देने की शक्ति भी वहां के नागरिको के पास है।
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मेरा मानना है यदि अमेरिका के नागरिको से वोट वापसी का क़ानून छीन लिया जाए तो महीने भर में ही अमेरिका के सरकारी अधिकारी भारतीय अधिकारियों से भी ज्यादा निकम्मे हो जायेंगे और आम अमेरिकी से किसी न किसी बहाने से घूस वसूलना शुरू कर देंगे।
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बहरहाल, हमें अमेरिका की व्यवस्था को बदतर बनाने की जगह इस बात पर विचार करना चाहिए कि भारत के सरकारी विभागों को किस तरह ईमानदार एवं कार्यकुशल बनाया जा सकता है।
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भारत के सरकारी विभागों को कार्यकुशल एवं ईमानदार बनाने के लिए क्या उपाय करना चाहिए ?
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मेरा मानना है कि यदि भारत में वोट वापसी एवं जूरी सिस्टम कानून लागू कर दिए जाते है तो भ्रष्टाचार में तेजी से गिरावट आएगी, और सरकारी अधिकारीयों की कार्य कुशलता में सुधार होने लगेगा। मैंने इसके लिए जूरी कोर्ट का क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निम्नलिखित अधिकारी इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे :

जिला पुलिस प्रमुख
जिला शिक्षा अधिकारी
जिला चिकित्सा अधिकारी
जिला जूरी प्रशासक
मिलावट रोक अधिकारी
DD चेयरमेन
RBI गवर्नर
CBI डायरेक्टर
BSNL चेयरमेन
सेंसर बोर्ड चेयरमेन
जिला जज
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
राष्ट्रिय जूरी प्रशासक
केन्द्रीय सूचना आयुक्त
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तब यदि आप ऊपर दिए गए किसी अधिकारी के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है।
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इसके अलावा यदि उपरोक्त अधिकारियों के खिलाफ को शिकायत आती है तो इसकी सुनवाई आम नागरिको की जूरी करेगी। यदि आपका नाम वोटर लिस्ट में है तो यह कानून पास होने के बाद आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। जूरी का चयन वोटर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा और मामले की गंभीरता देखते हुए जूरी मंडल में 15 से 1500 तक सदस्य होंगे।
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जूरी कोर्ट का पूरा ड्राफ्ट जूरी कोर्ट मंच पर देखा जा सकता है

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मैं अगर "जय श्री राम" या "भारत माता की जय" बोलता हूँ तो लोग मुझे भाजपा से क्यों जोड़ते हैं?
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यदि किसी राष्ट्रीय-धार्मिक प्रतीक या विषय जिस से देश का एक बहुत बड़ा समुदाय सहमत हो, पर कोई झुंड कब्ज़ा कर ले तो अमुक प्रतीक से सम्बद्ध सभी नागरिको को अमुक विषय का समर्थन करने के लिए उस झुण्ड में शामिल होने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
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तब अमुक झुण्ड इस प्रतीक को अपना लेबल बनाकर आपको उनके झंडे के निचे आने के लिए कहेगा। यदि आप उनके झुण्ड में शामिल होने से इंकार करते हो तो वे कहेंगे कि आपमें अमुक राष्ट्रिय-धार्मिक प्रतीक के प्रति निष्ठा नहीं है। अब आपके पास सिर्फ 2 रास्ते बचते है -
या तो आप खुद को अमुक राष्ट्रिय-धार्मिक प्रतीक से अलग कर लो, या
उस झुण्ड में शामिल हो जाओ।
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और इस तरह कोई राष्ट्रीय-धार्मिक प्रतीक किसी झुण्ड के हवाले होकर अपनी आदर्श स्थिति से गिरकर विभाजनकारी एवं विवाद का विषय बन जाता है !! और यदि ये झुण्ड कोई राजनैतिक झुण्ड है तो विभाजन की प्रक्रिया में तेजी आती है, और स्थिति और भी बदतर हो जाती है !!
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संघ=बीजेपी के नेताओं ने अपना आधार बढ़ाने के लिए भारत माता की जय, जय श्री राम, हिन्दू, हिंदुत्व जैसे जोड़ने वाले प्रतीकों का इसी तर्ज पर इस्तेमाल किया है।
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स्पष्टीकरण :
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(1) भारत माता की जय !!
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कुछ 2-3 साल पहले तक भारत के ज्यादातर (लगभग 80%) नागरिक 'भारत माता की जय' बोलने पर सहमत थे, या उन्हें 'भारत माता की जय' बोलने में कोई आपत्ति नहीं थी, तथा शेष (20%) लोगो का भी यह स्टेण्ड नहीं था कि — हम भारत माता की जय नहीं बोलेंगे !!
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लेकिन भारत में लगभग 25 से 30% नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक समूह के नेता अचानक इस प्रकार के बयान देने लगते है कि -- 'तुम्हें भारत माता की जय बोलना पड़ेगा', 'तुम नहीं बोलोगे तो हम तुम्हें सिखाएंगे', 'जो भारत माता की जय नहीं बोलते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए' या 'भारत माता की जय नहीं बोलने वाले गद्दार है' आदि आदि।
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कृपया इस बात पर ध्यान दें कि बीजेपी=संघ के नेता यदि भारत माता की जय के नारे लगाते है तो इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है, और यह विभाजन पैदा नहीं करता। किन्तु वे प्रत्येक भारतीय को बाध्य करने लगते है कि उन्हें भी भारत माता की जय बोलना चाहिए !!
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मतलब, आप किसी दुसरे व्यक्ति के बारे में यह बलात रूप से तय करना चाहते हो, कि तुम्हे भारत माता की जय का नारा लगाना पड़ेगा।
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लेकिन आप इसके लिए क़ानून बनाने की हिम्मत नहीं दिखाना चाहते !!
भारत का राष्ट्र गान जन गण मन है, और यह कानूनी रूप से राष्ट्र गान है। और यदि कोई व्यक्ति जन गण मन का अपमान करता है तो उस पर संदेह करने की हमारे पास वाजिब वजह होती है।
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लेकिन यदि किसी राजनैतिक पार्टी का नेता मुझ पर धौंस जमाता है कि, मुझे भारत माता की जय बोलना पड़ेगा, और यदि मैं किसी अन्य राजनैतिक पार्टी का समर्थक हूँ तो मैं उनसे यही कहूंगा कि — तुम क़ानून पास करके इसे राष्ट्रिय नारा बना दो, और सिर्फ तब ही मैं यह नारा लगाउंगा। और जब तक आप ऐसा क़ानून नहीं बनाते मेरा मानना है कि, आपकी मंशा सिर्फ राजनैतिक विभाजन करने की है।
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मामला भारत माता की जय बोलने का नहीं है। मामला यह है कि कोई राजनैतिक समूह 'देश की एकता से सम्बंधित' नारे या कवित्त या सूक्ति को अपनाता है तो बात समझ आती है, लेकिन फिर वह इस पर "एकाधिकार बनाने के लिए नागरिकों को अमुक नारा लगाने के लिए ललकारता है या धमकाता है" तो देश को एकता में पिरोने वाले ऐसे उद्घोष का राजनैतिक करण हो जाता है, और शेष 70% में से कुछ या ज्यादा लोग यह उद्घोष करने से इंकार कर देते है, या इससे दूर छिटक जाते है !!
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यदि किसी राजनैतिक दल की देश के महिमा गान से सम्बंधित और पहले से प्रचलित किसी नारे में आस्था है तो बेशक उन्हें ऐसा नारा लगाना चाहिए। जब आप इसे बार बार दोहराएंगे तो स्वत: ही अमुक दल की पहचान ऐसे नारे से बन जायेगी और अमुक पार्टी के अलावा अन्य दलों के नेता/कार्यकर्ता/नागरिक भी अनायास इसका अनुसरण करेंगे। लेकिन जब आप अन्य राजनैतिक दलों को भी यह नारा लगाने के लिए ललकारने लगते है तो यह साफ़ है कि आप इसका इस्तेमाल अपना झुण्ड बढ़ाने के लिए कर रहे है। और इसीलिए इसे एक बड़े वर्ग द्वारा खारिज कर दिया जायेगा !!
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उदाहरण के लिए हो सकता है कि किन्ही व्यक्तियों को 'जय भीम' कहने से इंकार न हो, लेकिन यदि माया मेडम उन्हें ललकारे कि 'तुम्हे जय भीम कहना पड़ेगा', तो स्वाभाविक रूप से मुलायम या बीजेपी समर्थक जय भीम कहने से इंकार कर देंगे। तब मायावती यह कह सकती है कि तुम जय भीम कहने से इनकार कर रहे हो अत: तुम दलित विरोधी हो। और इस तरह मायावती का वोट बैंक तो बढ़ेगा, लेकिन वो लोग इस नारे से दूरी बना लेंगे जो डॉ भीम राव अम्बेडकर में तो मानते है लेकिन मायावती में नहीं मानते।
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तो बीजेपी के नेता जानते थे कि 'भारत माता की जय' बोलने के लिए ललकारने से इस उद्घोष को करने वाले नागरिकों की संख्या घटेगी, किन्तु हमारे झुण्ड में संख्या बढ़ेगी।
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(2) जय श्री राम !!
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अपने अंतिम वर्षो में अशोक सिंघल ने बयान दिया था — मैंने आडवाणी जी से कहा था कि, राम मंदिर मुद्दे का राजनैतिकरण हो जाने से भारतीय हिन्दू राजनैतिक पार्टियों के अनुसार विभाजित हो जायेंगे, और मंदिर आन्दोलन को नुकसान होगा !!
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(टिप्पणी : हालांकि वे यह बात पहले से जानते थे, लेकिन पूरे 25 वर्षो तक इसमें भागीदार रहकर खामोश बने रहे, और अपने अंतिम वर्षो में खुद को क्लीन चिट देने के लिए उन्होंने यह बयान दिया )
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जय श्री राम हिन्दू धर्म के सभी अनुयायियों का नारा है, और 1990 से पहले तक प्रत्येक धार्मिक जुलुस वगेरह में इसका उदघोष किया जाता था। मतलब कोंग्रेस के मतदाताओ द्वारा भी और अन्य पार्टियों के मतदाताओ द्वारा भी। राम मंदिर आन्दोलन ( 1989 - 1999 ) के दौरान जुलूसो, रैलियों आदि में हिन्दुओ द्वारा यह नारा लगाया जाता था। बाद में राम मंदिर आन्दोलन के अलावा भी बीजेपी=संघ के नेताओं में इस नारे को अपना मुखड़ा बना लिया, और फिर उन्होंने इसका इस्तेमाल कोंग्रेस को चिड़ाने में किया। नतीजतन, अन्य पार्टियों के हिन्दू कार्यकर्ता इस नारे से कतराने लगे और यह नारा एक राजनैतिक हिन्दू* की पहचान बनने लगा।
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*1990 से पहले तक भारत में सिर्फ हिन्दु होते थे। बाद में एक नयी वैचारिक नस्ल का उत्पादन शुरू हुआ - राजनैतिक हिन्दू। जब हिन्दू धर्म एवं अपनी राजनैतिक पार्टी के हितो में से किसी एक को चुनने की बारी आये और ऐसे में यदि कोई हिन्दू हमेशा धर्म की जगह अपनी पार्टी के हितो को तरजीह दे तो उसे राजनैतिक हिन्दू कहा जाता है।
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(3) गर्व से कहो मैं हिन्दू हूँ !!
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जब बीजेपी के शीर्ष नेता मोहन भागवत कहते है कि - "भारत में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है।" तो यह बयान हिन्दुओ को विभाजित कर देता है। किंतु यही कथन यदि किसी धार्मिक संगठन या आम हिन्दू नागरिक द्वारा कहा जाएगा तो यह हिन्दुओ को विभाजित नहीं करता !!
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कैसे ?
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जब यह बयान कोई राजनैतिक संगठन देता है तो यह बयान हिन्दुओ का धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक रूपांतरण करने की मंशा बताता है।
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फर्स्ट राउंड में संघ=बीजेपी के नेता बार-बार कहते है कि तुम हिन्दू हो, वो भी हिन्दू है, ये भी हिंदू है, और भारत में रहने वाला हर एक व्यक्ति हिन्दू है।
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सेकेण्ड राउंड में फिर वे बार बार कहते है कि - हिन्दू खतरे में है।
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थर्ड राउंड में फिर वे दावा करते है कि - हम हिन्दूवादी पार्टी है।
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तो चूंकि हिन्दू खतरे में है, और हम हिंदूवादी पार्टी है, और अगर तुम सच्चे हिन्दू हो या तुम्हे हिन्दुओ की फ़िक्र हो तुम हमें वोट देकर हिन्दूओ और हिन्दू धर्म की रक्षा करो !! यदि तुम हमें वोट नहीं दोगे तो हिन्दू नष्ट हो जाएगा, और इसके जिम्मेदार तुम होओगे !!
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और फिर अगले राउंड में वे उन हिन्दुओ को हिन्दू धर्म का दुश्मन बताने लगते है जो उन्हें वोट नहीं कर रहे है !!!
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इस पूरी राउंड ट्रिपिंग का घूम फिर कर सार यही निकलता है कि - यदि तुम खुद को हिन्दू कहलाना चाहते तो हमें वोट कर दो, और यदि तुम हमें वोट नहीं कर रहे हो तो इसका मतलब है कि तुम फर्जी हिन्दू हो, और इसीलिए या तो वामपंथी हो या कोंग्रेसी हो, और चूंकि हम राष्ट्रवादी भी है और तुम हमारी साईड नहीं हो इसीलिए तुम गद्दार भी हो !! और एक बार यदि आप किसी को गद्दार "ठहरा" देते हो तो आपको उसे सड़क पर खींच कर मारने तक का राइट भी मिल जाता है।
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( इसी तरह की राउंड ट्रिपिंग वे वामपंथी एवं सेकुलर शब्द के साथ भी करते है। तब आप किसी भी व्यक्ति को यदि मार देते हो तो आपको बस इतना कहना होता है कि, वह वामपंथी था। और उसके बाद कोई भी आपसे सवाल नहीं कर सकता। क्योंकि वामपंथी का समर्थन करने वाला भी वामपंथी होता है, और इसीलिए अब उसे भी मार देना राष्ट्रिय कर्तव्य बन जाता है !! अब ये बात बिलकुल अप्रासंगिक है, कि जिसे मारा गया है, वह वामपंथी था, या किन्ही अन्य वजहों से उसे मारना जरुरी था, अत: हमले को जस्टिफाई करने के लिए उसे वामपंथी "ठहरा" दिया गया !!)
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बहरहाल, जब राजनैतिक समूह हिन्दू होने के नाम पर मतदाताओं का आवाहन करने लगता है तो विपक्षी पार्टियों को हिंदुत्व से दिक्कत शुरू हो जाती है। उन्हें दिक्कत यह है कि जब संघ यह बात बोलता है तो हिन्दू उनकी और दौड़ लगाते है, एवं उनके वोट कम होने लगते है। तो यदि यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले समय में हम ऐसे कई समुदायों एवं व्यक्तियों को जो संघ को वोट नहीं करना चाहते, यह कहते देख सकते है कि -- "हम हिन्दू नहीं है" !!! और यह उनकी बाध्यता होगी, चुनाव नहीं !!
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इसके लिए आप लिंगायतों की नजीर ले सकते है। कर्णाटक में कोंग्रेस ने हिन्दू धर्म से अलग होने की लिंगायतो की मांग को राजनैतिक रूप से सपोर्ट करना शुरू कर दिया है। ऐसा क्यों !! लिंगायतो में एक वर्ग का मानना है कि, हम हिन्दू नहीं है, और हमें हिन्दुओ से अलग धर्म का स्टेटस दिया जाना चाहिए।
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और कोंग्रेस भी चाहती है कि लिंगायतो को हिन्दू धर्म से अलग कर दिया जाए। क्योंकि यदि लिंगायत गैर हिन्दू हो जाते है तो संघ=बीजेपी का लिंगायतो पर क्लेम कमजोर हो जायेगा !! हालांकि इस मांग को कोंग्रेस मिशनरीज के कहने से आगे बढ़ा रही है, क्योंकि अल्टीमेटली जितने भी समुदाय हिन्दू धर्म से अलग होंगे वे सभी के सभी (100%) अल्टीमेटली मिशनरीज की गोद में चले जायेंगे। दुसरे शब्दों, में नारे बाजी का यह ड्रामा कन्वर्जन की एक वजह बनने का काम करता है।
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क्योंकि अब हिन्दू होना सिर्फ धार्मिक हिन्दू होना नहीं है। आपने इसे राजनैतिक पैकेज बना दिया है। और विभिन्न दलित, सेकुलर एवं अन्य सभी ऐसे हिन्दू जो अन्य राजनैतिक पार्टियों के समर्थक है, और हिन्दू होने एवं न होने के बोर्डर पर खड़े है, फर्स्ट राउंड में इस पैकेज को लेने से इनकार करेंगे और बाद में आपका राजनैतिक विरोध करने के लिए हिन्दुनेस का भी विरोध करना शुरू कर देंगे !!
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बहरहाल, यदि यही बात बात कोई गैर राजनैतिक व्यक्ति या संगठन कहेगा तो टकराव टल जाएगा। बीजेपी=संघ के शीर्ष नेता यह बात जानते है। लेकिन वे वोट लेने के लिए एकता के नाम पर हिन्दुओ में विभाजन का जोखिम उठाने के लिए तैयार है। जहाँ तक बीजेपी=संघ के कार्यकर्ताओ की बात है वे इस विभाजनकारी निति के दीर्घकालिक असर से भिज्ञ नहीं है। किन्तु इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता। क्योंकि संघ=बीजेपी के कार्यकर्ताओ ऐसे मामलो में संघ=बीजेपी के शीर्ष नेताओ द्वारा ली गयी लाइन का ही पालन करना होता है।
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दरअसल एकता का आव्हान दुनिया में सबसे अधिक विभाजन कारी सिद्धांत है। सभी एकतावादी नेता बुनियादी तौर पर विभाजनकारी होते है। इसीलिए संघ=बीजेपी की गोष्ठियों में बार बार इस बात को दोहराया जाता है कि हिन्दुओ में एकता नहीं है, और यदि हिन्दुओ को बचना है तो उन्हें "एक" हो जाना चाहिए। यहाँ "एक" होने से आशय होता है कि, सभी हिन्दुओ को संघ=बीजेपी के झंडे के निचे एक हो जाना चाहिए। और इसी वजह से संघ=बीजेपी के कार्यकर्ता उन हिन्दुओ को हिन्दु धर्म के लिए दुश्मन के रूप में देखते है जो बीजेपी=संघ को वोट नहीं कर रहे है।
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मेरा बिंदु यह है कि, यदि किसी राष्ट्रिय-धार्मिक विषय को इस तरह से उठाया जाए कि उससे समुदाय में टूटन हो, खेमे बन जाए तो यह अलगाववाद है। राजनीति में अपना वोट बैंक बनाने के लिए इस निति का अनिवार्य रूप से पालन किया जाता है, और सभी पार्टिया वोट बटोरने के लिए ऐसा करती है।
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समाधान ?
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सबसे पहले तो हमें यह समझना चाहिए कि इससे समस्या क्या है ?
(1) मेरे हिसाब से इस पूरी कवायद से बीजेपी=संघ के वोट बढ़ते है, और इससे कम से कम मुझे कोई समस्या नहीं है। यदि इससे कोंग्रेस या आम आदमी को समस्या है तो यह उनकी समस्या है। मैं राजनैतिक पार्टियों पर नैतिकता, ईमानदारी आदि का पालन करने का भार डालने में नहीं मानता हूँ। एक राजनैतिक पार्टी हर वो काम करती है, जिससे उसे वोट मिलते है। राजनैतिक पार्टी इसी के लिए बनायी जाती है। अत: इस मामले में मुझे बीजेपी=संघ के शीर्ष नेताओं से कुछ नहीं कहना है।
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(2) हिन्दू इसीलिए सिकुड़ रहा है, क्योंकि हिन्दू धर्म की संस्थाओ एवं मंदिरों का प्रशासन कमजोर है। अत: मेरा मानना है कि, जिन कार्यकर्ताओ को हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने में रुचि है उन्हें उन कानूनों को गेजेट में छापने की मांग करनी चाहिए जिससे हिन्दू धर्म की संस्थाओ के प्रशासन में सुधार आये।
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अब समस्या यह है कि, इस तरह के ड्रामे के चक्कर में हिन्दू कार्यकर्ताओ का बड़े पैमाने पर समय इस पर बहस करने में बर्बाद हो जाता है, और वे समझते है कि इस तरह की नारेबाजी करके वे हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे है !! और कार्यकर्ताओ के इस तरह की फालतू बहस में उलझ जाने के कारण वे उन कानूनों की मांग आगे बढ़ाने के लिए काम नहीं कर पाते जिससे वास्तव में हिन्दू धर्म मबजूत होगा।
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मेरा प्रस्ताव है कि, हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए हमें "हिन्दू बोर्ड" के प्रस्तावित क़ानून को गेजेट में छपवाने के लिए प्रयास करने चाहिए। यदि हिन्दू बोर्ड गेजेट में छाप दिया जाता है तो हिन्दू धर्म का क्षरण रुक जाएगा, और जल्दी हिन्दू इतनी ताकत जुटा लेंगे कि वे विस्तार करना शुरू कर देंगे।
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यह एक तथ्य है कि, हिन्दू धर्म लगातार सिकुड़ रहा है, और पिछले 600 साल से इसके सिकुड़ने में और भी तेजी आयी है। हिन्दू धर्म इतने लम्बे अरसे से इसीलिए सिकुड़ रहा है क्योंकि इसका प्रशासन प्रतिद्वंदी धर्मो ( इस्लाम एवं ईसाई ) की तुलना में बेहद कमजोर है। प्रशासन को सुधारने के लिए हमें क़ानून प्रक्रियाएं चाहिए, लेकिन धार्मिक व्यवस्था सुधारने के क़ानून लाने की जगह पर हिन्दूवादी कार्यकर्ताओ ने राजनैतिक दलों की और दौड़ लगानी शुरू कर दी। यदि आप धर्म को बचाने के लिए राजनेताओ की शरण में जाओगे तो वे आपका इस्तेमाल सिर्फ वोट बटोरने के लिए ही करेंगे।
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हिन्दू बोर्ड क्या है और कैसे यह हिन्दू धर्म को विस्तार करने की शक्ति प्रदान करेगा, इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है -- Pawan Jury का जवाब - हिन्दूओं को अपने धर्म के विस्तार के लिए इस समय क्या कदम उठाना चाहिए?

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क्या मैच फिक्सिंग को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता ?
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यदि मैच फिक्सिंग को कानूनी कर दिया जाए तो धीरे धीरे मैच फिक्सिंग कम होती चली जायेगी, और एक बिंदु के बाद यह पूरी तरह से बंद भी हो सकती है।
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कुछ चीजे ऐसी होती है, जिनका धंधा प्रतिबन्ध पर ही टिका होता है। शराब, तम्बाकू, अफीम, गांजा, जुआ, वैश्यावृति और मैच फिक्सिंग इसी तरह की चीजे है। इन्हें प्रतिबंधो से कभी भी रोका नहीं जा सकता। तो सरकारें इन धंधो से हफ्ता वसूलने के लिए प्रतिबन्ध लगाने का नाटक करती है। प्रतिबन्ध लगाने के बाद अधिकारी-नेता-जज आदि इस धंधे के कारोबारियों एवं उपभोक्ताओं से हफ्ता लेना शुरू कर देते है।
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सरकारें डाकू गब्बर सिंह की तरह लोगो को लूटने के लिए बंदूक का इस्तेमाल नहीं करती है। वे इसके लिए कानूनों का इस्तेमाल करते है। और क्रिकेट में काफी पैसा है।
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समाधान : मेरे विचार में सरकार को मैच फिक्सिंग को कानूनी करने के लिए गेजेट में निचे दी गयी इबारत छापनी चाहिए :
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यदि कोई व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि अमुक मैच फ़िक्स था, तो इस आरोप पर कोई FIR या शिकायत दर्ज नहीं की जाएगी। यदि कोई खिलाड़ी मैच फिक्सिंग करता है तो यह पूरी तरह से कानूनी होगा, और उसे भारत के किसी भी न्यायालय या सरकारी संस्था द्वारा दण्डित नहीं किया जा सकेगा।
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इससे क्या बदलाव आएगा ?
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जब यह तय हो जाएगा कि अब मैच फिक्सिंग को आरोप नहीं बनाया जा सकता तो क्रिकेट पर पैसा लगाने वालो को यह सही शुबहा होने लगेगा कि ज्यादातर मैच फिक्स है, और मैंने यदि पैसा लगाया तो यह डूब जाएगा। इससे सट्टा लगाने वालो की संख्या में कमी आएगी।
सट्टा लगाने वालो की संख्या गिरने से सटोरियों ( आयोजको ) की कमाई गिरने लगेगी, और वे क्रिकेट को प्रोत्साहित करने के लिए कम पैसा खर्च कर सकेंगे।
पैसे का बहाव कम होने से कम लोग क्रिकेट देखेंगे, और इससे दर्शक संख्या और भी घट जायेगी। दर्शक घटने से खिलाड़ी सस्ते में बिकने लगेंगे, और फिक्सिंग के लिए टके टके पर मिलने लग जायेंगे। और इससे फिक्सिंग में मुनाफा नहीं रह जाएगा।
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दुसरे शब्दों में जल्दी ही युवा वर्ग इस तथ्य से सूचित हो जाएगा कि सभी खिलाड़ी फिक्सर है। क्रिकेट के आयोजक पहले दौर में यह साबित करने की कोशिशे करेंगे कि हम सभी लोग पूरी तरह ईमानदार है और किसी भी मैच में कोई धोखा धड़ी नहीं कर रहे है। किन्तु युवा उनकी बात सुनना बंद कर देंगे। दुसरे शब्दों में जल्दी ही यह बात कॉमन नोलेज में आ जायेगी कि सभी मैच फिक्स होते है।
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यह 1999 के आस पास की बात है जब क्रोनिये ने कैमरों के सामने स्वीकार किया था, कि उसने मैच फिक्सिंग की थी। उसने लगभग दर्जन भर खिलाडियों के भी नाम बताए थे जिन्होंने पैसे लिए थे।
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तब क्रोनिये की विश्वसनीयता बहुत ज्यादा थी। वाकयी में काफी ज्यादा। इस स्केंडल में लगभग आधा दर्जन भारतीय खिलाड़ी भी चपेट में आए थे। लेकिन भारत में क्रिकेट को बचाने के लिए पेप्सी रत्न सचिन को बचाना जरुरी था, और वे उसे निकाल भी ले गए। बहरहाल, मेरा मानना है कि, यदि हमें फिक्सिंग रोकनी है तो इसे कानूनी कर देना चाहिए।
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क्रिकेट पर और विवरण आप यहाँ भी पढ़ सकते है - https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/posts/1512807665758972/
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पाकिस्तान में किसका शासन है? मौलवियों का , इमरान खान का या सेना का?
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आजादी के समय सेना के जनरलों को ब्रिटिश-अमेरिकन एलिट का समर्थन प्राप्त था, अत: पाकिस्तानी जनरलों एवं जमींदारो ने आपस में गठजोड़ बनाकर सत्ता सूत्र अपने हाथ में ले लिए थे. अमेरिकी हथियार निर्माताओं से गठजोड़ होने के कारण वहां सेना ताकतवर होती चली गयी और राजनेता कभी पनप नहीं पाए. 1947 के बाद से पाकिस्तान का सारा इतिहास राजनैतिक इतिहास राजनेताओ एवं सेना के बीच घर्षण का इतिहास है.
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अभी हाल ही में पाकिस्तान के किसी रिटायर्ड जनरल ने कहा था कि, 1947 से आज तक सेना में जनरल की नियुक्ति हमेशा अमेरिका की अनुमति से ही होती रही है.
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2010 से पाकिस्तान की सेना में चीन का दखल बढ़ने लगा, और अब पाकिस्तान की सेना के जनरल हथियारों के लिए दोनों देशो (चीन+अमेरिका) पर निर्भर है. समय गुजरने के साथ पाकिस्तान की सेना का झुकाव चीन की तरफ बढ़ता जा रहा है. जैसे जैसे भारत-चीन के बीच विवाद बढेगा वैसे वैसे पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को फैसला करना पड़ेगा कि उन्हें किस तरफ जाना है – चीन की तरफ या अमेरिका की तरफ. और ज्यादातर सम्भावना है कि वे चीन की तरफ चले जायेंगे.
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(1) पाकिस्तान की सेना का प्रभाव क्षेत्र
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पाकिस्तान के सामरिक मामलो में निर्णायक फैसला सेना ही करती है. यदि राजनेता सेना को नियंत्रित करने की कोशिश करता है तो सेना और नेता में घर्षण बढ़ जाता है, और हमेशा सेना की ही चलती है. 1947 में जब पाकिस्तान की सेना ने (कबिलाइयो के नाम पर) कश्मीर पर हमला किया था तो खुद जिन्ना को इसके बारे में जानकारी नहीं थी !!
Jinnah: A Life
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1965 में भी हमले की योजना जनरल अयूब ने बनायी थी और कारगिल घुसपैठ का फैसला भी मुशर्रफ ने किया था. नवाज शरीफ को मालूम तक नहीं था कि पाकिस्तान की फौजे कारगिल पर चढ़ाई कर रही है.
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पाकिस्तान का पेड मीडिया सेना के नियंत्रण में है, और अमेरिकी धनिकों का सेना के माध्यम से इस पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण है. अब इस पर चीन का नियंत्रण भी बढ़ रहा है.
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पाकिस्तान के आम नागरिको में सेना की कद्र है. और कद्र इसीलिए है क्योंकि पेड मीडिया के माध्यम से उनके दिमाग में यह बात डाली गयी है कि भारत का एक मात्र उद्देश्य पाकिस्तान को तबाह करना है, और सिर्फ सेना के कारण ही पाकिस्तान अब तक बचा हुआ है !! लेकिन पाकिस्तान के राजनैतिक रूप से सूचित कार्यकर्ताओ का वर्ग इस बात से परिचित है कि पाकिस्तान की सेना ने शासन के सूत्र अपने हाथ में रखने के लिए भारत के डर का हव्वा खड़ा किया हुआ है, और सेना की इस नीति ने पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया है.
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(2) पाकिस्तान में मौलवियों का प्रभाव :
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इस्लाम में गेदरिंग की प्रक्रिया होने के कारण वहां पर समुदाय के आपसी संवाद का एक व्यवस्थित ढांचा (Network) बना हुआ है, और गेदरिंग की प्रक्रिया के कारण वहां पर मौलवी धार्मिक-सामाजिक-राजनैतिक स्तर पर काफी शक्तिशाली है. इस तरह वहां पर आंतरिक मामलो में नागरिको की राय को मोटे तौर पर 2 फेक्टर प्रभावित करते है :
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पेड मीडिया
गेदरिंग
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गेदरिंग का विकेन्द्रित नेटवर्क होने के कारण वहां पर जिन मुद्दों पर पेड मीडिया एवं मौलवियों में मतभेद होता है, वहां पर पेड मीडिया नागरिको को प्रभावित नहीं कर पाता.
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इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि, नागरिको के पास सम्प्रेषण का एक अतरिक्त नेटवर्क होने के कारण पाकिस्तान में पेड मीडिया कम ताकतवर है. और यह एक बड़ी वजह है कि पाकिस्तान का लगभग प्रत्येक नागरिक एंटी-अमेरिका है, और इस सच्चाई से वाकिफ है कि उन्हें अमेरिका की सेना से खतरा है.
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नकारात्मक पक्ष यह है कि, वहां के मौलवी इतने अतार्किक एवं धर्मांध है कि पाकिस्तान के नागरिको को अतिरिक्त दुश्मनों की जरूरत नहीं है. मौलवियों की अतार्किकता एवं कट्टरता ने नागरिको को खड्डे में डाला हुआ है.
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तो इस तरह पाकिस्तान में सामरिक एवं अंतराष्ट्रीय मामलों में सेना का शासन है, और आंतरिक-सामाजिक-धार्मिक-सामुदायिक फैसलो को मौलवी एवं धार्मिक गुरु प्रभावित करते है.
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[ इस्लामिक देशो में गेदरिंग की प्रक्रिया होने के कारण पेड मीडिया नागरिको को गिरफ्त में नहीं ले पाता और इस वजह से अमेरिका को जब भी इस्लामिक देशो के प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण करना हो तो उन्हें सेना की जरूरत होती है !! ईराक, ईरान, अफगानिस्तान से लेकर लीबिया और सीरिया तक इसके उदाहरण है.]
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(3) पाकिस्तान में राजनेताओ एवं सरकार का प्रभाव :
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पाकिस्तान में राजनेता हमेशा कमजोर स्थिति में रहे है. इसकी निम्न वजहें है :
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निरंतर चुनाव न होने की वजह से नेता के उभरने एवं जनाधार (Network) बनाने के अवसर सिकुड़ जाते है.
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राजनेताओ को लगातार मौलवियों के नेटवर्क से निपटना होता है. और मौलवियों के पास नागरिको से संवाद स्थापित करने के लिए गेदरिंग के रूप में ज्यादा प्रभावी और व्यवस्थागत नेटवर्क है.
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पेड मीडिया पर राजनेताओं का नियंत्रण नहीं है.
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पाकिस्तान की सेना के जनरल सीधे अमेरिकी धनिकों को रिपोर्ट करते है, अत: राजनेता सैन्य अधिकारियों को टेक ओवर नहीं कर पाते
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इस स्थिति में वहां पर सत्ता में वही नेता टिक पाता है जिसे या तो सेना का समर्थन प्राप्त हो या फिर वह सीधे अमेरिकी धनिकों की गुड बुक में हो. और यदि नेता अपनी सीमा से बाहर जाता है तो सेना टेक ओवर कर लेती है. इमरान खान भी सेना के नियंत्रण में है, और महत्त्वपूर्ण फैसले लेने के लिए स्वतंत्र नहीं है. इस समय की सरकार एवं सेना के बीच कोई टकराव नहीं है.
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यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि, वहां की सरकार / राजनेता एवं सेना मिलकर भी अवाम को पूर्ण रूप से नियंत्रित नहीं करते. क्योंकि वहां पर मौलवियों की सत्ता काफी मजबूत है. पाकिस्तान में लॉकडाउन इसीलिए असफल रहा.
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अमेरिकी धनिक भारत की तरह पाकिस्तान में भी लॉकडाउन चाहते थे, और उन्होंने सेना, सरकार और मीडिया की सहायता से लॉकडाउन डालने के प्रयास किये. किन्तु मौलवियों के नेटवर्क ने लॉकडाउन की बेंड बजा दी. इसके उलट भारत में पेड मीडिया नागरिको को लॉकडाउन के पक्ष में कन्विंस करने में सफल रहा, और यह भी समझाने में कामयाब रहा कि, लॉकडाउन डालकर कई जानें बचा ली गयी है !!! ( यह पेड मीडिया की ताकत है.)
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भारत :
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भारत में पेड मीडिया शुरू से काफी ताकतवर रहा है. अत: अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक पेड मीडिया की सहायता से नागरिको की राय को नियंत्रित करते है और यह सुनिश्चित करते है कि कौन नेता सत्ता में आएगा. 73 साल में से इंदिरा जी एवं शास्त्री जी के कार्यकाल को निकाल दें तो शेष 55 वर्षो तक सभी नेता पेड मीडिया की सहायता से ही सत्ता में आये है, और पेड मीडिया की सहायता से ही टिके रहे है.
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1990 से पहले तक भारत में पेड मीडिया का नियंत्रण अप्रत्यक्ष था, और 2001 में ऍफ़डीआई आने के बाद यह प्रत्यक्ष हो गया है. आज भारत में पेड मीडिया सबसे ताकतवर है, और वे ही भारत के राजनेताओं एवं नागरिको की राय को पूर्ण रूप से नियंत्रित करते है. इस तरह भारत में सत्ता पूरी तरह केंद्रीकृत है, और इसके सूत्र पेड मीडिया के प्रायोजको के पास है.
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भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के शासन काल में राजस्थान के राजघरानों से निकाले गए खजानों का क्या हुआ? क्या उसे देशहित में प्रयोग किया गया है?
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यदि कोई देश ऐसी वस्तुएं नहीं बना पा रहा है जिन्हें निर्यात करके डॉलर कमाए जा सके तो व्यापार घाटा होने लगता है। और डॉलर ख़त्म होने के बाद यदि कोई भी देश डॉलर देने को तैयार न हो तो सिर्फ सोना ही देश को बचा सकता है।
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1969 में भारत पर पहली बार बड़ा डॉलर संकट आया था, तब सोने के कारोबार / आयात पर कई तरह के प्रतिबन्ध रोक लगा कर डॉलर की निकासी कम करने के प्रयास किये गए (जो कि एक गलत फैसला था) । 1974 के परमाणु परिक्षण के कारण अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने भारत पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए, अत: 1976 में डॉलर फिर से ख़त्म हो गए।
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इंदिरा जी के पास तब 4 रास्ते थे :
परमाणु कार्यक्रम रोककर CTBT साइन करना, ताकि अमेरिका हमारे लिए डॉलर के रास्ते खोले। ( इस संधि को पोकरण के कारण ही ड्राफ्ट किया गया था )
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेकर मंदिरों से सोना उठाना ( उनके आर्थिक सलाहकारों ने उन्हें यही राय दी थी )
सोना इकट्ठा करने के अन्य विकल्पों पर विचार करना
निर्यात बढाने के लिए जूरी सिस्टम लागू करना
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जूरी सिस्टम तो उनको लाना नहीं था, अत: उन्होंने तीसरे रास्ते के तहत राजाओं का सोना उठाने की कोशिश की। आजादी के समय सभी रजवाड़ो ने अपनी संपत्तियो की घोषणा की थी, और इंदिरा जी संदेह था कि जयपुर राजघराने ने बहुत बड़ी मात्रा में खजाना छिपाया हुआ है। अत: उन्होंने आपातकाल के दौरान जयगढ़ पर छापा मारकर खजाने की तलाश शुरू की। छापे के समय राजपरिवार जेल में था। सेना द्वारा कई दिनो तक किले में सर्च ऑपरेशन चलाया गया। इस गोल्ड हंटिंग के 2 वर्जन मौजूद है :
ऑफिशियल वर्जन है, कि सरकार को वहां से कुछ नहीं मिला। सोने का एक सिक्का तक नहीं।
अटकलें लगाई जाती है कि खजाना मिल गया था, लेकिन इंदिरा जी ने इसे हड़प लिया।
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कुछ मानते है कि खजाना नहीं मिला और कुछ मानते है कि खजाना मिल गया था। अब यह अपना अपना अनुमान लगाने वाली बात है। जिसे जो वर्जन सूट करता है, वह वैसा दावा करता है। सबूत किसी भी पक्ष के पास कोई नहीं है।
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Indira Gandhi ordered a gold hunt in 1976; Pak sought share | India News - Times of India
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मेरा अनुमान है कि, सेना को खजाना नहीं मिला था। इस तरह के ऑपरेशन को इतने गुप्त रूप से नहीं चलाया जा सकता कि पीछे कोई भी सुराग नहीं रहे। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों एवं सर्वेयरो को शामिल करते हुए लगभग 250 लोगो का स्टाफ था, जो यह खुदाई कर रहा था। यदि खजाना मिलता तो बात छुपती नहीं थी, और कोई न कोई संकेत सामने आ जाते। राजपरिवार ने भी तब से आज तक कभी भी सरकार पर यह आरोप नहीं बनाया कि उनका खजाना ले लिया गया। तब भी जब इंदिरा जी सत्ता गँवा चुकी थी, और जनता सरकार आने के बाद हत्या, अपहरण आदि जैसे मुकदमो का सामना कर रही थी।
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1990 में हम फिर से अटक गए और देश चलाने के लिए सिर्फ 2 हफ्ते का डॉलर बचा था। अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पूरी फील्डिंग लगाकर रखी थी कि हमें कहीं से भी लोन न मिल पाए। यहाँ तक कि आईएम्ऍफ़ एवं विश्व बैंक ने हमें शोर्ट टर्म लोन देने से भी इंकार कर दिया। तब भारत में 46 टन सोना जहाज में भरकर बैंक ऑफ़ इंग्लेंड भेजा और बदले में डॉलर लिए। लेकिन यह देश चलाने के लिए काफी नहीं था।
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आईएम्ऍफ़ ने भारत के सामने शर्त रखी कि, यदि हम भारत का बाजार अमेरिकी-ब्रिटिश कंपनियों के लिए खोल देते है (WTO agreement) तो ही हमें डॉलर मिलेंगे वर्ना नहीं। इस समय स्थिति यह थी कि पैसा न होने के कारण चंद्रशेखर सरकार अपना बजट भी पेश नहीं कर पाई थी। अंत में भारत ने अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों की शर्तें मानी और हमने समझौते पर दस्तखत किये।
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बाजार खोलने के बाद भी भारत का व्यापार घाटा निरंतर बढ़ रहा है, किन्तु अब यह आपको इसीलिए नजर नहीं आता कि विदेशी निवेश की अनुमति देने के बाद सरकारें भारत की राष्ट्रिय संपत्तियां बेचकर देश चलाती रहती है। पिछले 30 वर्षो से वे लगातार इसी तरीके से देश चला रहे है। और इस तरह हम आज पहले से भी बदतर स्थिति में है।
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जब ये संपत्तियां ख़त्म हो जायेगी तो हमारे नेता अपना झोला (भरा हुआ) उठाकर निकल लेंगे। क्योंकि जब भी भारत की संपत्ति औने पौने दामो में बेचीं जाती है तो एक बड़ा हिस्सा हमारे नेताओं की जेब में जाता है !! कभी यह पेड मीडिया में सकारत्मक कवरेज के रूप में होता है कभी नकदी के रूप में।
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अभी अगले साल तक इन लोगो ने 2 लाख करोड़ का माल बेचने का टार्गेट बनाया है - 28 कंपनियों को बेच रही है मोदी सरकार, संसद में बेशर्मी से बोले मंत्री- घाटा हो या मुनाफ़ा हम तो बेचेंगे
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समाधान – रिक्त भूमि कर एवं जूरी कोर्ट का प्रस्तावित क़ानून गेजेट में आने से भारत में बड़े पैमाने पर निर्माण इकाइयां शुरू होने का रास्ता साफ़ हो जाएगा, और भारत ऐसी वस्तुएं बनाने लगेगा जिन्हें निर्यात करके डॉलर कमाए जा सके। जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लाये बिना निर्यात बढ़ाना संभव नहीं है।
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