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Sonu Kumar

Sonu Kumar

@sonukumai


Nitish Kumar और Narendra Modi दोनों 100% देशी-विदेशी एलीट लोगों के प्रति वफादार हैं। फिर देशी-विदेशी एलीट लोगों ने नीतीश कुमार से इस्तीफा क्यों दिलवाया?
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जल्द ही कई मुस्लिम देशों को मजबूर होकर ईरान के साथ मिलकर अपनी सेना के साथ युद्ध में शामिल होना पड़ सकता है।

उदाहरण के लिए, पाकिस्तान में एक बड़ा जन-आंदोलन शुरू हो सकता है। जो पाकिस्तानी सेना पर दबाव डाले कि वह ईरान की सेना का पूरी तरह समर्थन करे और युद्ध में उसका पूर्ण सहयोगी बन जाए।

जब तीसरा विश्व युद्ध (WW3) शुरू होगा, तब विदेशी एलीट चाहते हैं कि भारत में धर्म के आधार पर एक बड़ा गृहयुद्ध हो।

ताकि हिंदुओं को यह समझाया जा सके कि वे अमेरिका-यूके-पश्चिमी देशों (US-UK-WME) के आक्रमण का सक्रिय रूप से समर्थन करें। क्योंकि अगर भारत में कोई गृहयुद्ध नहीं होगा, तो अधिकांश हिंदू तटस्थ (न्यूट्रल) रहने का समर्थन करेंगे।
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यह ओरिजनल पोस्ट Rahul Mehta द्वारा लिखा गया है, जिसे मैने हिंदी में अनुवाद किया है। राहुल मेहता जी ने हीं भारत में पहली बार - EVM BLACK CLASS डेमो मशीन का आविष्कार किया है।।

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भारत के मीडिया को नियंत्रित करने वाली शक्तियों का एजेंडा क्या है ?
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मीडिया घाटे का कारोबार है। मीडिया का घाटा पूरा करने या इन्हें भुगतान करने वाले समूहों के आधार पर भारत में मीडिया के 2 वर्ग है :
चूंकि दूरदर्शन के कर्मचारियों को वेतन नागरिको द्वारा वसूल किये गए टेक्स से चुकाया जाता है, अत: सरकार द्वारा नियंत्रित मीडिया सिटिजन पेड मीडिया है।
प्राइवेट मीडिया का घाटा निजी कम्पनियों के मालिक पूरा करते है, और वे ही सूचनाएं देने के लिए मीडियाकर्मीयों को भुगतान करते है।
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लोकतंत्र आने के बाद से मीडिया समूह दुसरे नंबर की सबसे ताकतवर कम्पनियां बन गयी है। पहला नंबर हथियार बनाने वाली कम्पनियों का है। पिछले 200 वर्षो से वैश्विक राजनीती पर हथियार निर्माताओ का कब्जा है, और दुनिया में सबसे बेहतर हथियार बनाने वाली कम्पनियां अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिको के पास है।
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जो भी देश अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिकों को टक्कर देने वाले हथियार नहीं बना पा रहा है, उन देशो के मीडिया को अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिक नियंत्रित करते है। भारत भी हथियार निर्माण में काफी पिछड़ा हुआ है, अत: भारत के मीडिया को भी अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिक नियंत्रित करते है।
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इन कम्पनियों का मुख्य एजेंडा वैश्विक भारत पर आर्थिक-सामरिक-धार्मिक नियंत्रण बनाना है। पेड मीडिया के माध्यम से वे भारत की मुख्यधारा की सभी राजनैतिक पार्टियों एवं नेताओं को नियंत्रित करते है, ताकि इनका इस्तेमाल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में किया जा सके।
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[ इस जवाब में 3 खंड है। पहले खंड में उन कम्पनियों के बारे में कुछ विवरण है जिनका वैश्विक एवं भारतीय मीडिया में सबसे प्रभावी दखल है। खंड (2) में पेड मीडिया के प्रायोजको के वैश्विक एजेंडे को भारत के सन्दर्भ में बताया है। खंड (3) में उन कदमों का विवरण है, जिन्हें उठाकर आप उनके एजेंडे को ज्यादा अच्छे से समझ सकते है। मूल जवाब दुसरे खंड में है, अत: आप सीधे खंड (2) को पढ़ सकते है। ]
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खंड 1 ; पेड मीडिया को नियंत्रित करने वाली शक्तियां कौन है ?
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राजतन्त्र में गेजेट छापने की शक्ति राजा के पास थी। राजा के पास सेना होती थी, और इसीलिए राजा ताकतवर था। 12 वीं सदी में युरोप में जूरी सिस्टम आया और ब्रिटेन-फ़्रांस ने तेजी से तकनिकी विकास करना शुरू किया। चूंकि निर्णायक हथियारो पर नियंत्रण से वास्तविक ताकत आती है, अत: जब भी किसी राज्य में तकनिकी विकास होता है तो अंततोगत्वा यह विकास हथियार निर्माण की दिशा में मुड़ जाता है।
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17 वीं सदी में ब्रिटेन में निजी कम्पनियां बड़े पैमाने पर हथियार बनाने लगी थी, और 18 वीं सदी तक आते आते उन्होंने ऐसे निर्णायक हथियार बना लिए थे कि जिस सेना के पास ये हथियार होते थे वह सेना जीतना शुरू कर देती थी।
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उदाहरण के लिए 1805 से 1815 के बीच सिर्फ बर्मिघम के कारखानों ने ही लगभग 40,00,000 बन्दूको का उत्पादन किया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी इन्ही बन्दूको की सहायता से विभिन्न राजाओ की सेनाओं को हराकर अपने उपनिवेश स्थापित कर रही थी। बन्दूको निर्माण की दूसरी कॉटेज इंडस्ट्री लन्दन में थी। लन्दन एवं बर्मिंघम में बंदूक बनाने के इन कारखानों के मालिको ने ही पूरी दुनिया में ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को सुनिश्चित किया।
Brief History
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उस समय बंदूक निर्णायक हथियार थी, और इसके उत्पादन पर नियंत्रण रखने वालो की ताकत को आप इस तरह समझ सकते है कि, यदि 1 लाख बन्दूको एवं कारतूस की पेटियों से भरा जहाज सिराजुद्दौला को सप्लाई कर दिया जाता तो क्लाइव लॉयड न तो प्लासी का युद्ध जीतता था और न ब्रिटिश भारत में घुस पाते थे।
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सिराजुद्दौला के पास यह अस्लहा आ जाता तो वह पूरे भारत को भी टेक ओवर कर लेता। लेकिन पूरे भारत का बादशाह बनने के बाद भी क्या सिराजुद्दौला बर्मिंघम के फैक्ट्री मालिक से टकराव ले सकता था ? नहीं !! क्योंकि वे सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंदियों को 4 जहाज भरकर बंदूक भेज देते है, और सिराजुद्दौला के कारतूसो की सप्लाई रोक देते !! और इस तरह नवाब फिर से पिट जाता !! क्योंकि असली ताकत तब आती है जब आप अपने हथियार खुद बनाते हो।
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मतलब, 200 साल पहले ही राजा वगेरह नाम के राजा रह गए थे, और असली ताकत हथियार निर्माताओं के पास आ चुकी थी। पेड इतिहासकार इन तथ्यों को दर्ज नहीं करते, क्योंकि उन्हें यह जानकारी छिपाने के लिए पेमेंट की जाती है।
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बहरहाल, सिराजुद्दौला और भारत के अन्य राजाओं को हथियार बनाने वाली कंपनियों ने हथियार नहीं दिए, और वे हारते चले गए !! शिवाजी के पास पुर्तगाली तोपे थी, और यह एक बड़ी वजह थी कि वे मुकाबला कर पा रहे थे। बाजीराव को फ्रेंच तोपे सप्लाई कर रहे थे, और अहमद शाह अब्दाली के पास रशियन तोपखाना था।
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1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो जवाहर लाल ने अमेरिका-रूस को हथियार भेजने के लिए चिट्ठियां लिखी थी। और जब चीन को लगा कि भारत को हथियारों की सप्लाई आ सकती है, तो चीन ने बढ़ना रोक दिया।
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1965 में भारत पाकिस्तान में अन्दर तक चला गया था, लेकिन अमेरिका यानी हथियार बनाने वाली कपनियों के हस्तक्षेप के कारण हमें रुकना पड़ा। 1971 में फिर से यही हुआ। अमेरिका ने अपना नौ सेना बेड़ा पाकिस्तान की मदद के लिए रवाना कर दिया, और हमें फिर पीछे हटना पड़ा !! रूस के बीच में आने की वजह से हम बच गए वर्ना अमेरिकी धनिक भारत को 1971 में ही टेक ओवर कर लेते थे। और रूस अमेरिका को इसीलिए रोक पाया क्योंकि उस समय अमेरिका के साथ साथ रूस के पास भी निर्णायक हथियार थे।
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आप पिछले 200 सालो में हुए दुनिया के सभी युद्धों का अध्ययन करके देख सकते हो। जिस देश को निर्णायक हथियार बनाने वाली कम्पनियों का सहयोग मिला हुआ है, वे देश युद्ध जीत जाते है, वर्ना हार जाते है !! 16 वीं सदी से पहले तक बड़ी सेना का महत्त्व होता था, लेकिन बाद में जैसे जैसे हथियारों की तकनीक उन्नत होती गयी वैसे वैसे युद्ध में निर्णायक भूमिका हथियारों की हो गयी। द्वितीय विश्व युद्ध 6 साल तक चलता रहा लेकिन अमेरिका के फाइटर प्लेन ने 2 बम गिराकर युद्ध का फैसला कर दिया था।
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तब से आज हथियारों की तकनीक इतनी आगे जा चुकी है कि निर्णायक हथियारों से लैस 5 हजार का दस्ता 50 लाख की सेना को ख़त्म कर सकता है। वो भी परमाणु बमों का इस्तेमाल किये बिना।
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मेरा बिंदु यह है कि पिछले 200 वर्षो से इस धरती पर सबसे ताकतवर समूह हथियार कम्पनियां है, और अमेरिकी कम्पनियों के मालिक सबसे बेहतर एवं सबसे मारक हथियार बना रहे है। और इस वजह से अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक वास्तविक अर्थो में वैश्विक राजनीती को प्रभावित एवं नियंत्रित करते है।
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हथियार कम्पनियों के मालिको को सस्ते में माल बनाने के लिए मुफ्त का कच्चा माल यानी खनिज चाहिए। तो वे हथियारों का इस्तेमाल करके राजा को नियंत्रित (उपनिवेश की स्थापना) करते थे, और फिर खनिज लूटते थे। डेमोक्रेसी आने के बाद राजा की जगह पीएम ने ले ली, अत: उन्होंने लूट चलाने के लिए पीएम को कंट्रोल करना शुरू किया।
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पीएम को कंट्रोल करने के 2 तरीके है
या तो आपको पीएम को युद्ध में हराने की क्षमता जुटानी होगी,
या फिर चुनाव में।
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युद्ध में खून खराबा होता है, और लागत भी काफी ज्यादा आती है। अत: हथियार कम्पनियों के मालिको ने मतदाताओं को चाबी देने के लिए पेड मीडिया पर कंट्रोल लेना शुरू किया। पेड मीडिया द्वारा वे मतदाता को नियंत्रित करते है, और मतदाता के माध्यम से पीएम एवं राज नेताओं को। यदि किसी देश का पीएम मीडिया पर अपना कंट्रोल लेने की कोशिश करेगा तो उसे युद्ध में जाना पड़ेगा।
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निर्णायक हथियारों के अलावा ये कम्पनियां और भी ऐसी ढेर सारी तकनिकी वस्तुएं बनाती है जो दुनिया के ज्यादातर देशो को बनानी नहीं आती। और इन वस्तुओ के बिना न तो देश चलाया जा सकता है, और न ही बचाया जा सकता है।
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इसमें मुख्य रूप से हथियार, इंधन, दवाइयाँ, चिकित्सीय उपकरण एवं माइनिंग मशीनरी शामिल है। किन्तु निर्णायक बढ़त फिर भी इन्हें हथियारों से ही मिलती है। क्योंकि किसी भी प्रकार के टकराव का अंतिम पड़ाव हमेशा युद्ध ही होता है।
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निचे मैंने कुछ ताकतवर कम्पनियों के बारे में सांकेतिक जानकारी दी है। अन्य विवरण के लिए कृपया गूगल करें।
Infographic: The World's Biggest Arms-Producing Companies
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Lockheed Martin, USA ($40.83 billion)
Boeing , USA ($29.51 billion)
Raytheon , USA ($22.95 billion)
BAE Systems , USA ($22.79 billion)
General Dynamics , USA ( $19.23 billion)
Airbus group, Trans-European : ($11.2 billion)
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और ऐसी 15 से 20 कम्पनियां है जो अपना समूह (लॉबी) बनाकर काम करती है। इन कंपनियों के कुल एसेट्स को आप जोड़ ले तो योगफल भारत के कुल विदेशी मुद्रा कोष से कहीं ज्यादा निकल जाएगा, और जहाँ तक ताकत की बात है इनमे से प्रत्येक कम्पनी की ताकत पूरे भारत देश से ज्यादा है। मतलब यदि ऊपर दी गयी किसी भी कम्पनी या इस कम्पनी समूह से भारत का युद्ध हो जाता है तो ये कम्पनियां भारत को उधेड़ कर रख देगी !! क्योंकि ये कम्पनियां ऐसी चीजे बनाती है, जो दुनिया के ज्यादातर देश नहीं बना पाते !!
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लॉकहिड मार्टिन पर गूगल करें कि ये कम्पनी किस तरह के सामान बनाती है ; Lockheed Martin - Wikipedia
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यदि ये कम्पनियां भारत पर हमला करने के लिए अपने उन्नत हथियार बांग्लादेश या पाकिस्तान को डिस्काउंट / मुफ्त में देना शुरू करें (जैसा कि उन्होंने कारगिल में किया था) और हमारी सप्लाई लाइन काट दे तो हमारे पास क्या विकल्प है !! सिर्फ रूस ही ऐसे हथियार बनाता है जो इनके हथियारों का मुकाबला कर सके। लेकिन 1971 की बात और थी। आज रूस इन कम्पनियों के खिलाफ जाकर भारत को मदद देने का जोखिम नहीं उठा सकता। कारगिल युद्ध में भी रूस पीछे हट गया था और उसने हमें लेसर गाइडेड बम नहीं भेजे थे।
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और फिर ये कोई देश नहीं है कि हम इनसे कोई वार्ता कर सके। ये निजी कम्पनियां है, और सिस्टम से बाहर काम करती है। ये बोल देंगे ये सामान बनाकर बेचना हमारा धंधा है। आपसे पूछकर बनायेंगे और बेचेंगे क्या !! तुम्हारी हैसियत है तो तुम भी बना लो, कौन रोक रहा है !!
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मिसाल के लिए, जब भारत का कारगिल युद्ध हुआ तो हमें लेसर गाइडेड बमों की जरूरत थी, और ये बम सिर्फ इन्ही कंपनियों को बनाने आते है। यदि हमें ये बम नहीं मिलते तो हम कारगिल नहीं जीत सकते थे !! यह एक तथ्य है !! और अभी जब हमें एयर स्ट्राइक करनी थी तो फिर से हमें लेसर गाइडेड बमों की जरूरत थी, और फिर से हमें इनसे विनती करनी पड़ी कि वे हमें लेसर गाईडेड बम उपलब्ध कराए !! यदि ये कम्पनियां हमें बम न भेजती तो स्ट्राइक न होती थी !! यह एक तथ्य है !!
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कारगिल में जब हमारी यह कमजोरी खुलकर नागरिको के सामने आ गयी थी तो वाजपेयी ने लेसर गाईडेड बम (सुदर्शन) बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था। लेकिन तमाम कोशिशो के बावजूद हम काम आने लायक लेसर गाइडेड बम नहीं बना सके !! यह भी एक तथ्य है !!
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अभी ये सिर्फ हथियार कम्पनियां है। इसके बाद तेल निकालने वाली कम्पनियां आती है। भारत के पास तेल के कुँए तो है लेकिन तेल निकालने की तकनीक नहीं है। दुनिया में तेल निकालने की तकनीक भी लगभग दर्जन भर कंपनियों के पास ही है। अब भारत अपना 80% तेल भी आयात करता है, और हम अपने 80% हथियार भी विदेशियों से लेते है !!
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हथियार कम्पनियों के मालिको ने पहले सत्ताओ को कंट्रोल किया, और फिर इकॉनोमी को कंट्रोल करने के लिए उन्होंने बैंक खोले। अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक ( जो डॉलर छापता है ) पर गूगल करिए। इसकी होल्डिंग प्राइवेट बैंको के पास है। इसके बाद इन्होने तेल निकालने की तकनीक जुटाई और इस पर एकाधिकार बनाया।
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इसके बाद चिकित्सीय उपकरण जैसे MRI, अल्ट्रा साउंड, हार्ट सिटी स्कैनर एवं आवश्यक दवाइयाँ बनाने वाली कम्पनियां। और ये जो मशीने बनाते है उनकी तकनीक भी कुछ गिनी चुनी कंपनियों के पास है। और फिर इन ताकतवर कंपनियों के पीछे अमेरिका की अन्य मल्टीनेशनल कम्पनियां जैसे बैंक, खनन, बीमा, संचार, कम्प्यूटर आदि।
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कुल मिलाकर कुछ 100 बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक समूह है, जिनके पास ऐसी तकनीक है जो दुनिया के 190 देशो के पास नहीं है। और कुछ 30-40 अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच घराने है, जो पिछले 150 वर्षो से इन कम्पनियों को चला रहे है। यही अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिक पेड मीडिया के प्रायोजक है !!
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इन कम्पनियों की बढ़त तकनीक की वजह से है। पिछली 2 सदियों से इन्होने इस तकनीक पर एकाधिकार बनाकर रखा है। अन्य देश यदि यह तकनीक जुटा लेते है तो इनकी ताकत खत्म हो जायेगी। अत: इन कम्पनियों के मालिक पिछले 200 वर्षो से बराबर इस मद में निवेश कर रहे है कि अन्य देश यह तकनीक न जुटाएं।
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यदि पीएम ऐसे क़ानून छापने लगता है जिससे अमुक देश में तकनिकी उत्पादन होने लगे तो ये कम्पनियां अपना बाजार खोने लगेगी। अत: अपने कारोबारी हितो को बचाने और अतिरिक्त मुनाफा बनाने के लिए उन्हें पीएम को कंट्रोल की जरूरत होती है। और पीएम को कंट्रोल करने के लिए इन्हें मीडिया पर कंट्रोल चाहिए !!
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पेड मीडिया के अंग : पेड मीडिया सिर्फ न्यूज चेनल एवं अखबार नहीं है। इसका फैलाव इससे कहीं विस्तृत एवं गहरा है।
मुख्य धारा के सभी न्यूज चैनल एवं सभी मनोरंजन चैनल
मुख्य धारा के सभी अख़बार
सोशल मीडिया कम्पनियां
गणित-विज्ञान-एकाउंट्स को छोड़कर सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकें एवं साहित्य
मुख्यधारा की सभी खबरिया एवं मनोरंजन मैगजीने
मुख्यधारा की सभी फ़िल्में
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जब पेड मीडिया के प्रायोजको का नियंत्रण नेताओं पर कमजोर हो जाता है, तो उनके एजेंडा भी धीमा हो जाता है, और जब उनका नियंत्रण बढ़ता है तो उनके एजेंडे की रफ़्तार भी बढ़ जाती है। इस तरह पिछले 74 सालों में नियंत्रण घटने-बढ़ने के कारण उनके एजेंडे की रफ़्तार भी घटती-बढती रहती है। किन्तु 2001 के बाद से उनका नियंत्रण लगातार बढ़ता जा रहा है, और आज यह इतना बढ़ चुका है कि पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में भारत से भी ज्यादा ताकतवर हो चुके है।
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1947 से 1990 तक भारत में पेड मीडिया के प्रायोजको का नियंत्रण कब बढ़ा / घटा, जानने के लिए यह जवाब पढ़ें : क्या इंदिरा गांधी वाक़ई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं -- https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1047932098913200/
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खंड 2 ; पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा क्या है ?
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उनका मुख्य एजेंडा अपने कारोबारी हितो की रक्षा करना है। चूंकि उनकी शक्ति का स्त्रोत हथियारों की तकनीक पर टिका हुआ है, अत: किसी देश के नेताओं को नियंत्रण में लेने के बाद वे उन्हें बाध्य करके ऐसे क़ानून छपवाते है जिससे देश तकनिकी वस्तुओं का उत्पादन न कर सके। इसके लिए वे गेजेट एवं पेड मीडिया का इस्तेमाल करते है।
गेजेट में वे ऐसी इबारते छपवाते है जिससे उनकी शक्ति बढे
और नागरिको को भ्रमित करने के लिए वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करते है
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जवाब के इस भाग में मैंने उन कानूनों एवं लाक्षणिक बिन्दुओ के बारे में जानकारी दी है जिनका अवलोकन करके आप यह जान सकते है कि भारत में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक अपना एजेंडा किस गति से लागू कर रहे है।
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अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिकों का एजेंडा :
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(1) आर्थिक नियंत्रण बनाने के लिए
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(1.1) भारत के प्राकृतिक संसाधन एवं खनिज लूटने के लिए उनका अधिग्रहण करना।
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(1.2) आवश्यक सेवाओं जैसे मीडिया, पॉवर, बैंकिंग, माइनिंग, रेलवे, एविएशन, ऑटो मोबाइल, निर्माण, कृषि, दवाइयाँ आदि के कारोबार पर एकाधिकार बनाना।
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वे पेड मीडिया पार्टियों एवं उनके नेताओं का इस्तेमाल करके गेजेट में लगातार ऐसी इबारतें छपवायेंगे जिससे देश की राष्ट्रिय संपत्तियां, प्राकृतिक संसाधन, सार्वजनिक उपक्रम आदि बिक जायेंगे और ये संपत्तियां अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिकों के स्वामित्व में चली जाएगी।
पेड मीडिया में इस बेचान को एक सधी हुयी आर्थिक नीति एवं साहसिक फैसले के रूप में बताया जाएगा। नागरिको का ध्यान बंटाने के लिए वे अस्पष्ट आर्थिक शब्दावली जैसे विनिवेश, विदेशी निवेश, आर्थिक सुधार, निजीकरण, पीपीपी मोड़, उदारीकरण, भूमंडलीकरण, पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, नव उदारवाद आदि का इस्तेमाल करते है।
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[ उदारहण के लिए, अभी टाटा झारखंड में 1 रू सालाना की दर पर कोयला खोद रहा है, जबकि बाजार भाव 2,000 रू टन का है। और यह जानकारी भी सामने इसीलिए आ पाई क्योंकि जियो के कारण डोकोमो का धंधा सिकुड़ने लगा और टाटा ने जियो के रास्ते में सरकारी अडंगे लगाने शुरू किये। और फिर रिलायंस ने टाटा की घड़ी दबाने के लिए फर्स्ट पोस्ट को यह खबर लगाने के लिए पेमेंट की !! ऐसी सैंकड़ो खदाने है जहाँ से इसी तरह से खनिज लूटे जा रहे है।
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पेड मीडिया इन्हें रिपोर्ट नहीं करता इसीलिए हमें यह मालूम नहीं होता। टाटा 1947 से ही 1 रू में यह कोयला खोद रहा है, लेकिन 74 साल में किसी ने भी इस खबर को रिपोर्ट नहीं किया। टाटा अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिकों की शेल कम्पनी है। जब ब्रिटिश गए थे इन्हें इस तरह के कई माइनिंग राइट्स मुफ्त में दे गए थे। आज भी इनके सभी धंधे अमेरिकन एवं ब्रिटिश धनिकों की मशीनों पर चल रहे है। 1990 के बाद से अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सीधे भारत में आना शुरू किया और अब वे बेहद तेजी से भारत के संसाधनों का अधिग्रहण कर रहे है। ]
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(1.3) भारत में तकनिकी उत्पादन करने वाली छोटी स्वदेशी इकाइयों को बाजार से बाहर करना।
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तकनिकी उत्पादन करने वाले स्थानीय छोटे कारखानों को बाजार से बाहर करना उनका मुख्य एजेंडा है। जिस देश में छोटे कारखानों का आधार टूट जाता है, वह देश हमेशा के लिए तकनीकी वस्तुओ के लिए परजीवी हो जाता है। अत: अमेरिकी-ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जहाँ भी जाती है वहां के तकनिकी उत्पादन करने वाले स्थानीय कारखानों को गायब करने में काफी संजीदगी से काम करती है। तकनिकी आधार टूटने के बाद अमुक देश हर क्षेत्र में तकनीक के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों का ग्राहक बन जाता है।
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बॉटम 80% का गणित-विज्ञान का आधार तोड़ना।
अनुत्पादक नस्ल का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए प्रतिभाशाली छात्रों को इतिहास, राजनीती विज्ञान, मनोरंजन, खेलकूद आदि जैसे क्षेत्रो में जाने के लिए प्रेरित करना।
रेग्रेसिव टेक्स सिस्टम में छोटे कारोबारीयों का कारोबार बड़ी फैक्ट्रियो के पास चला जाता है। अत: वे रिग्रेसिव टेक्स प्रणाली के समर्थन, एवं प्रोग्रेसिव टेक्स के सख्त खिलाफ है। सेल्स टेक्स, एक्साइज टेक्स, वैट एवं जीएसटी आदि सभी रिग्रेसिव टेक्स प्रणालियाँ है।
वे गेजेट में ऐसी इबारतें छापेंगे जिससे शहरी क्षेत्र की जमीन महंगी बनी रहे। जमीन की कीमतें ऊँची रहने से कारखाने लगाना मुश्किल हो जाता है।
तकनिकी उत्पादन तोड़ने के लिए उन्हें अदालतों एवं पुलिस का ऐसा स्ट्रक्चर चाहिए कि पैसा फेंकने वाले का काम हो सके। यदि किसी देश में अदालतें एवं पुलिस ईमानदार है तो तकनिकी विकास में विस्फोटक विकास होने लगता है। अत: वे अदालतों को किसी भी कीमत पर केंद्रीकृत बनाये रखना चाहते है।
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(2) सैन्य नियंत्रण बनाने के लिए
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आर्थिक नियंत्रण बढ़ने के साथ ही अगले चरण में वे सैन्य नियंत्रण बनाना शुरू करते है। यदि कोई देश अपने आर्थिक क्षेत्र अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को देने से इनकार करता है तो फिर कोई न कोई बहाना से सेना भेजकर पहले सैन्य नियंत्रण बनाया जाता है, और फिर वे अर्थव्यवस्था का अधिग्रहण करना शुरू करते है। ईराक इसी मॉडल का शिकार हुआ था, और अब ईरान का नंबर है। भारत ने आर्थिक नियंत्रण देना स्वीकार कर लिया अत: हम युद्ध से बच गए। और अब वे सैन्य नियंत्रण बढ़ाने की इबारतें गेजेट में छपवा रहे है।
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(2.1) भारत की सेना पर नियंत्रण बनाने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कम्पनियों के हथियार इंस्टाल करना।
अगस्तावेस्ट लेंड, रफाल आदि के बाद अभी जब ट्रंप ने भारत की विजिट की तो फिर से भारत को 3 बिलियन डॉलर के ब्लेक हॉक हेलीकोप्टर लेने के लिए बाध्य किया। इन सभी जटिल हथियारों को खरीदते समय निर्माता से End Use Monitoring Agreement करना होता है। EUMA और स्पेयर पार्ट्स की निर्भरता के कारण सेना हथियार का इस्तेमाल करने के लिए अमुक निर्माता पर हमेशा निर्भर बनी रहती है।
भारत ने इंसास राइफलो में सुधार एवं उत्पादन को बेहद धीमा कर दिया है, और अमेरिका भारतीय सेना में अपनी राइफले इंस्टाल कर रहा है। पिछले वर्ष ही सेना ने इंसास का ऑर्डर केंसिल करके 6 लाख रायफल का कोंट्रेक्ट अमेरिकी कम्पनी को दिया है।
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(2.2) भारत के सैन्य परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू न होने देना।
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पाकिस्तान के पास सामरिक बम है और वह आज भी अपनी परमाणु क्षमता निरंतर बढ़ा रहा है। भारत के पास सामरिक परमाणु बम नहीं है, और अमेरिका 123 एग्रीमेंट करके 2008 में ही हमारा परमाणु कार्यक्रम बंद करवा चुका है। 2010 में पोकरण-2 के मुख्य वैज्ञानिक ने ( रिटायर होने के बाद ) सार्वजनिक रूप से यह बात कही थी कि भारत का हाइड्रोजन बम का टेस्ट असफल रहा था। फिशन ब्लास्ट का परिक्षण सफल था, किन्तु हम फिशन और लोइल्ड डिवाइस का परिक्षण तो 1974 में ही सफलतापूर्वक कर चुके थे। बाद में इसकी पुष्टि परिक्षण में शामिल अन्य वैज्ञानिक ने भी की। इसके अलावा भारत ने आज तक कभी भी वातावरणीय परिक्षण भी नहीं किया है। और फिर भी हम अपना सैन्य परमाणु कार्यक्रम बंद कर चुके है।
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(2.3) भारत एवं विशेष रूप से कश्मीर में अपने सैन्य अड्डे बनाना।
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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक ईरान+चीन के खिलाफ भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते है, और इसके लिए उन्हें भारत की जमीन-सेना पर पूर्ण नियंत्रण चाहिए। अभी आप भारत में जो हिन्दू-मुस्लिम तनाव देख रहे है, यह इसी नीति का हिस्सा है। भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ने के बाद जब अमेरिका भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ करेगा तो एंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट की लहर की चपेट में आकर भारतीय हिन्दू ईरान में सेना भेजने का विरोध नहीं करेंगे।
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(2.4) नागरिको को हथियार विहीन बनाये रखना।
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यह सब तभी तक चलता है, जब तक नागरिको को इस बारे में पता नहीं रहे कि उनका पीएम अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के नियंत्रण में जा चुका है। यदि राजनैतिक कार्यकर्ता एवं नागरिक पेड मीडिया की चपेट से बाहर आ जाते है, या कोई नेता अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको के खिलाफ हो जाता है तो अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों को निष्कासित करने और सेना को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी हथियारों के निर्माण के लिए आवश्यक कानूनों की मांग को लेकर जन आन्दोलन खड़ा हो सकता है।
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और तब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के पास भारत को काबू करने का एक मात्र विकल्प यह होगा कि वह सीधे सेना का इस्तेमाल करे। किन्तु जिस देश के नागरिको के पास हथियार होते है उस देश की सेना को तो हराया जा सकता है, किन्तु टेरेटरी को टेकओवर नहीं किया जा सकता। अत: अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों नागरिको को हथियार रखने की अनुमति देने के सख्त खिलाफ है।
उन्होंने पेड मीडिया का इस्तेमाल करके भारतीयों के दिमाग में हथियारों के प्रति इतनी नफरत भर दी है कि यदि आप घर घर जाकर फ्री में बंदूके बाँटोगे तब भी अधिकांश नागरिक इन्हें लेने से इनकार कर देंगे। उन्होंने प्रत्येक भारतीय के दिमाग में यह वाक्य नट बोल्ट से अच्छी तरह से कस दिया है कि – यदि भारतियों को को बंदूक रखने की अनुमति दे दी गयी तो वे एक दुसरे मार देंगे !!
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(3) धार्मिक नियंत्रण बनाने के लिए :
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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का गठजोड़ मिशनरीज के साथ है। अत: जब किसी देश पर उनका आर्थिक-सैन्य नियंत्रण बढ़ता है, तो अगले चरण में वे स्थानीय धर्मो को आपस में लड़वाकर कन्वर्जन के प्रयास शुरू करते है। पिछले 400 सालो से अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिकों का यही ट्रेक रहा है।
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(3.1) भारत में सांप्रदायिक आधार पर अलगाववादी हिंसक गृह युद्ध की जमीन तैयार करना।
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(3.2) भारतीय मुस्लिमों को अलग देश की मांग करने के लिए तैयार करना
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(3.3) भारत को 3 हिस्सों में विभाजित करना ( कश्मीर एवं पूर्वोत्तर )।
वे शुरू से ही भारत में जनसँख्या नियंत्रण क़ानून डालने के खिलाफ रहे है। इससे धार्मिक जनसँख्या का संतुलन बिगड़ता है, और अलगाव की जमीन तैयार होती है।
इसके अलावा वे भारत में रह रहे 2 करोड़ अवैध विदेशी निवासियों को खदेडने के भी खिलाफ है, ताकि जरूरत पड़ने पर इन्हें किसी भी समय हथियार भेजकर गृह युद्ध ट्रिगर किया जा सके।
हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ाने के लिए वे गाय का भी कई तरीको से इस्तेमाल करते है। आजादी से पहले भी उन्होंने गाय का इस्तेमाल हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने में किया था।
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(3.4) सरकारी नियंत्रण में लेकर मंदिरों की संपत्तियां लूटना एवं उत्सवों में होने वाले धार्मिक जमाव को तोडना।
वे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के भी खिलाफ है, ताकि मंत्रियो एवं जजों का इस्तेमाल करके मंदिर की जमीनो को बेचा जा सके।
उत्सवो में धार्मिक जमाव तोड़ने के लिए वे भ्रष्ट जजों एवं पेड मीडिया का इस्तेमाल करते है।
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(3.5) देशी गाय की प्रजाति को लुप्त प्राय करके इसके उत्पादों पर एकाधिकार बनाना।
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(3.6) भारत में बड़े पैमाने पर कन्वर्जन करना।
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(4) सामाजिक एवं सांस्कृतिक एजेंडा
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सामाजिक-पारिवारिक कलेश, जातीय-क्षेत्रीय अलगाव से उत्पादक व्यक्तियों को मानसिक एवं आर्थिक हानि होती है, और समग्र देश की उत्पादकता गिर जाती है। साथ ही इसमें कारोबार एवं धर्मांतरण भी है। संस्कृति का रूपांतरण करने के बाद कन्वर्जन करना आसान हो जाता है।
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(4.1) जाति एवं नस्ल के आधार पर हिंसक अलगाव खड़ा करना।
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(4.2) लैंगिक आधार पर आपसी घर्षण बढ़ाकर परिवार एवं विवाह नामक संस्थाए ध्वस्त करना।
पहले 498A का इस्तेमाल करके उन्होंने परिवारों को तोड़ा, और फिर लिव इन को कानूनी करके लिव इन संतानों को कानूनी मान्यता दी।
उन्होंने 2012 में यह क़ानून छापा कि, पुरुष पर यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए लड़की का सिर्फ बयान ही पर्याप्त होगा। इन सभी क़ानूनो के समग्र प्रभाव से स्त्री-पुरुष के बीच सामाजिक संघर्ष बढ़ गया, और यह आगे भी बढ़ता जाएगा।
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(4.3) फूहड़ता, अश्लीलता एवं नग्नता को सार्वजनिक स्वीकार्यता दिलाना।
उन्होंने सेल्फ सेंसरशिप का क़ानून छापा ताकि वेब सीरिज, इंटरनेट आदि में गाली गलौज और यौन विकृतियों की सामग्री को बढ़ावा दिया जा सके।
पारिवारिक स्तर पर अश्लीलता एवं फूहड़ता को स्वीकार्यता दिलाने के लिए वे मनोरंजन चेनल्स का इस्तेमाल करते है।
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(4.4) दवाईयों पर निर्भरता बढ़ाने के लिए खाद्य पदार्थो में मिलावट को बढ़ावा देना।
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(4.5) अफीम एवं भांग पर प्रतिबंधो को कठोर करना।
इन प्रतिबंधो से एक तरफ दवाईयों की बिक्री बढ़ती है, और दूसरी तरफ युवाओं को शराब, ड्रग आदि नशो की और धकेलना आसान हो जाता है। मिशनरीज कन्वर्जन में नशे का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करती है। अभी पंजाब में इस मॉडल पर काम चल रहा है। आगे अन्य राज्यों का भी नम्बर आएगा।
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(5) राजनैतिक एजेंडा
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वे राजनीति में केंद्रीकृत व्यवस्था चाहते है ताकि बड़ी पार्टियों में पेड मीडिया का इस्तेमाल करके नेताओं को प्लांट किया जा सके। यदि पार्टियाँ एवं नेता उनके कंट्रोल से निकल गए तो वे गेजेट में इबारतें छपवाने की क्षमता खो देंगे।
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(5.1) EVM जारी रखना।
evm उन व्यक्तियों के निर्देश पर परिणाम दिखाती है जो व्यक्ति इसका प्रोग्राम लिखते है। नेताओ को कंट्रोल करने के लिए evm उनका सबसे प्रभावी टूल है। पेड मीडिया का इस्तेमाल करके वे इस तरह की गलतफहमी फैलाते है तो अमुक राजनीतिक दल या पीएम evm द्वारा वोटो की हेरा फेरी कर रहा है। जबकि केंचुआ और evm पर पीएम का कोई कंट्रोल नहीं होता है।
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(5.2) छोटी पार्टियों को कमजोर करना।
वे निरंतर ऐसे क़ानून छापते है जिससे छोटी पार्टियों के लिए चुनाव लड़ना मुश्किल होता जाए और सिर्फ बड़ी पार्टियाँ मैदान में रहे।
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(5.3) बड़ी पार्टियों का केन्द्रीयकरण करना।
वे राजनैतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र यानी कि पार्टी मेम्बर्स को वोटिंग राइट्स देने के खिलाफ है। इससे वे भारत की बड़ी पार्टियों में ऐसे नेताओं को आगे बढ़ा पाते है जो उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे है।
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(5.4) युवाओं को राजनीती से दूर रहने के लिए प्रेरित करना
ऐसा करने के लिए पेड मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है।
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(5.5) नागरिको के मतदान एवं चुनावी अधिकारों में कटौती करना
उन्हें इस तरह का सिस्टम चाहिए कि एक बार वोट देने के बाद अगले 5 वर्ष तक मतदाताओ की प्रशासनिक-राजनैतिक प्रक्रियाओ में कोई भूमिका न रहे, ताकि वे पीएम एवं मंत्रियो को घूस देकर या उनका हाथ मरोड़ कर मनमर्जी की इबारतें गेजेट में निकलवा सके। वोट वापसी, जनमत संग्रह प्रक्रियाएं इस मेकेनिज्म को पूरी तरह से तोड़ देती है। अत: वे इन दोनों प्रक्रियाओ को गेजेट में छापने के सख्त खिलाफ है।
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(6) प्रशासनिक एजेंडा :
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पुलिस एवं अदालतों की सरंचना इस तरह रखना कि पैसा फेंककर अपना काम करवाया जा सके
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पुलिस एवं अदालतें सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। जो आदमी पुलिस एवं जजों को नियंत्रित करता है, उस पर कोई भी क़ानून लागू नहीं होता। क्योंकि जब भी कोई क़ानून तोड़ा जाता है अपराधी को पकड़ने का काम पुलिस, और दंड देने का काम जज करता है।
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वे इतने बड़े भारत में अपने एजेंडे को इसीलिए आगे बढ़ा पा रहे है, क्योंकि भारत में जज सिस्टम है। जज सिस्टम का डिजाइन इस तरह का होता है कि इसमें चयनात्मक न्याय दिया जा सकता है। मतलब, जब पैसे वाला आदमी फंसता है तो वह जज को पैसा देकर अपने पक्ष में फैसला निकलवा लेगा। इसी तरह जिसके पास पैसा है वह अपने प्रतिद्वंदियों को भी उल्टे सीधे मुकदमों में फंसा कर अंदर करवा सकता है।
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अदालतों एवं पुलिस को अपनी पकड़ में रखने के लिए वे भारत में जज सिस्टम जारी रखना चाहते है, एवं जूरी सिस्टम से अत्यंत घृणा करते है। वे जूरी सिस्टम से इतनी घृणा करते है कि उन्होंने भारत की सभी पाठ्यपुस्तको में से इस लफ़्ज को निकाल दिया है। आपको भारत की किसी भी अखबार, साहित्य, पाठ्यपुस्तक और यहाँ तक की क़ानून की किताबों तक में जूरी सिस्टम के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी !!
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उल्लेखनीय है कि अमेरिका एवं ब्रिटेन की अदालतों में जूरी सिस्टम है, जज सिस्टम नहीं। और जूरी सिस्टम होना सबसे बड़ी वजह रही कि अमेरिका-ब्रिटेन-फ़्रांस जैसे देश भारत जैसे देशो से तकनीक के क्षेत्र में आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी कर पाए !!
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खंड 3 ; पेड मीडिया का एजेंडा आगे बढ़ाने वाले लोगो को चिन्हित करना :
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अपने ताकतवर हथियारों का इस्तेमाल करके वे पेड मीडिया पर कंट्रोल लेते है और फिर पेड मीडिया की सहायता से नेता खड़े करते है। नागरिक एवं कार्यकर्ता इसे देख न सके इसके लिए वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करते है। जो नेता उनके एजेंडे के खिलाफ जाता है उसका प्लग निकाल दिया जाता है, और नया नेता प्लांट कर दिया जाता है।
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आप पिछले 20 वर्षो का अवलोकन करें तो देखेंगे कि तमाम सत्ता परिवर्तनों के बावजूद गाड़ी इसी दिशा में आगे बढ़ रही है, और आगे भी गाड़ी इसी दिशा में जायेगी। पेड मीडिया में जितने भी चेहरे आप देखते है, वे पेड मीडिया के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम करते है। जो व्यक्ति या नेता या संस्था या पार्टी या बुद्धिजीवी ऊपर दिए गए एजेंडे के किसी भी बिंदु के खिलाफ जायेगा उसे मुख्य धारा के पेड मीडिया में आप फिर नहीं देखेंगे।
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बहरहाल, पेड मीडिया की भारत पर पकड़

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क्या सरकार के द्वारा रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49% से 74% करना राष्ट्रहित में है?
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डिफेन्स में 74% FDI का मतलब है कि हम अपना देश अधिकृत रूप से गंवाने के कगार पर आ चुके है। ज्यादातर सम्भावना है कि, अगले 3-4 वर्ष में यह सीमा 100% बढ़ा दी जायेगी और तब हम घोषित रूप से एक परजीवी / गुलाम देश होंगे।
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(1) 1990 तक भारत में परमिट राज था। हथियारों के निर्माण में न तो निजी कम्पनियों को मुक्त रूप से उत्पादन करने की छूट थी, और न ही विदेशी कम्पनियों को। किन्तु WTO समझौते के बाद जब लाइसेंस राज ख़त्म किया गया तो राष्ट्रिय सुरक्षा का विषय होने के कारण हथियारों के उत्पादन में विदेशी निवेश पर प्रतिबन्ध जारी रखा गया। कारगिल युद्ध में भारत को अमेरिका से हथियारों की मदद चाहिए थी, और तब भारत को हथियार निर्माताओ की काफी शर्तें माननी पड़ी। हथियारो के निर्माण में विदेशी निवेश को खोलना इसमें से एक था।
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2001 में हमें डिफेन्स में 26% एफडीआई की अनुमति देने के लिए बाध्य होना पड़ा।
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2015 में वे फिर से यह सीमा 49% तक बढ़वाने में कामयाब हुए।
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2020 में कोरोना की हड़बोंग में उन्होंने अब इसे 74% तक बढ़वा लिया है।
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FDI in defence limit raised to 74%; FM Sitharaman announces major ‘Make in India’ push for defence
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(2) पेड मीडिया द्वारा ऍफ़डीआई के समर्थन में दिए गए गलत तर्क :
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2.1. डिफेन्स में एफडीआई से भारत में टेक्नोलोजी ट्रांसफर होगा !!
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जटिल तकनीक के मामले में टेक्नोलोजी ट्रांसफर सिर्फ एक थ्योरी है, और व्यवहारिक रूप से जटिल निर्माण की तकनीक ट्रांसफर की ही नहीं जा सकती। और हथियारों के निर्माण में टेक्नोलोजी ट्रांसफर की बात करना एक निर्मम मजाक है। दुनिया के किसी देश ने आज किसी भी देश को हथियारों की तकनीक का हस्तांतरण नहीं किया है, और न ही किया जा सकता है। इस बारे में विस्तृत विवरण के लिए यह जवाब पढ़ें - Pawan Kumar Sharma का जवाब - विश्व स्तरीय अंतरिक्ष और मिसाइल प्रोग्राम होने के बावजूद भी भारत तेजस के लिए जेट इंजन क्यों नहीं बना पाया?
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2.2. भारत पहले से ही विदेशियों से हथियार आयात कर रहा है, अत: विदेशी भारत में आकर हथियार बनाते है तो हमें कोई नुकसान नहीं !!
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पहली बात तो यह है कि, यह तर्क देने वाले इस बिंदु को जानबुझकर गायब कर देते है कि, किन कानूनों को गेजेट में छापने से भारत स्वदेशी तकनीक आधारित जटिल हथियारो का निर्माण कर सकता है। तो पहले वे भारत में हथियार निर्माण संभव बनाने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करते है, जिससे हमें हथियार आयात करने पड़ते है, और फिर वे कहते है कि भारत को हथियार आयात करने पड़ रहे है, अत: हमें विदेशियों को बुलाकर भारत में हथियार बनाने के कारखाने लगाने के लिए कहना चाहिए !!
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इससे हमें निम्न तरह के नुकसान होंगे
जब तक विदेशी निवेश की सीमा 49% थी तब तक विदेशी किसी हथियार कम्पनी पर अपना स्वामित्व नहीं ले सकते थे। 74% स्टेक के बाद अब हथियार निर्माण कम्पनियों पर विदेशियों का स्वामित्व निर्णायक जाएगा। अत: अब अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कम्पनियां भारत में बड़े पैमाने पर हथियार निर्माण के कारखाने लगाएगी।
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जब विदेशी भारत में आकर हथियार बनायेंगे तो नेताओं को धमका कर / उन्हें ब्राइब / म्राइब देकर सरकारी हथियार कम्पनियों का बचा खुचा बेस भी तोड़ देंगे। इससे हम हथियारों के निर्माण में विदेशियों पर और भी निर्भर हो जायेंगे । हथियार निर्माण की सरकारी कम्पनियों को अब धीरे धीरे या तो बंद कर दिया जाएगा या विदेशी इनका अधिग्रहण कर लेंगे।
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पेड मीडिया पूरी तरह से हथियार कम्पनियों के नियंत्रण में काम करता है। अत: हथियार कंपनियों के भारत में सीधे घुस आने के बाद मीडिया की शक्ति विस्फोटक रूप से बढ़ेगी, जिससे भारत के नेताओ की निर्भरता अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों पर और भी बुरी तरह से बढ़ जायेगी।
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हथियार कम्पनियों का मुख्य धंधा खनिज लूटना है। अत: अब वे भारत के नेताओं से ऐसे क़ानून छपवाएंगे जिससे वे लगभग मुफ्त में भारत के मिनरल्स लूट सके। तो अभी भारत के प्राकृतिक संसाधन की बहुत बड़े पैमाने पर लूट होने वाली है। और यह लूट पूरी तरह से कानूनी होगी।
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ये कम्पनियां जितना मुनाफा बनाएगी उसके बदले हमें डॉलर चुकाने होंगे। पहले हम हथियार लेने के लिए सीधे डॉलर चुका रहे थे, और अब रिपेट्रीएशन के रूप में डॉलर चुकायेंगे। मतलब ऍफ़डीआई डॉलर संकट में कोई कमी नहीं लाता, बल्कि इसमें इजाफा ही करता है।
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ऍफ़डीआई सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण विषय है, और डिफेन्स में यह काफी खतरनाक है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए निचे दिए गए तीनो जवाब पढ़ें।
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(i) Pawan Kumar Sharma का जवाब - प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति क्यों दी जाती है? इससे हमें क्या फायदे और नुकसान होंगे?
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(ii) Pawan Kumar Sharma का जवाब - भारत के मीडिया को नियंत्रित करने वाली शक्तियों का एजेंडा क्या है ?
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(iii) Pawan Kumar Sharma का जवाब - क्या इंदिरा गांधी वाक़ई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं?
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(3) यह अमेरिका की चीन के साथ युद्ध की तैयारी है। युद्ध कब होगा मुझे नहीं पता। लेकिन जैसे जैसे अमेरिका भारत का अधिग्रहण करता जाएगा वैसे वैसे युद्ध करीब आता जाएगा। और इस मामले में डिफेंस में एफडीआई निर्णायक है। दरअसल, अमेरिका भारत पर इतना कंट्रोल ले चुका है कि वह चीन का किला तोड़ने के लिए अब भारत का इस्तेमाल एक ऊंट की तरह कर सकता है। भारत और चीन के बीच इस युद्ध में चीन ख़त्म हो जाएगा और भारत आधे से अधिक बर्बाद होगा, और चीन के ख़त्म होने के बाद अमेरिका भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में बदल देगा।
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तो अगले कुछ वर्षो में निम्नलिखित में से कोई एक या एक से अधिक परिस्थितियों के घटने की सम्भावनाए प्रबल है :
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यदि पहले चरण में भारत एवं चीन का युद्ध शुरू होता है तो भारत के ज्यादातर नागरिक चीन के खिलाफ युद्ध का समर्थन नहीं करेंगे, अत: ज्यादातर सम्भावना है कि अमेरिका भारत के नेताओं का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर हमला करने के हालात खड़े करेगा। भारत की जनता पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जाने के लिए आसानी से तैयार हो जाएगी। उदाहरण के लिए अमेरिका से चाबी मिलने के बाद भारत POK, गिलगित-बाल्टिस्तान पर हमला कर सकता है।
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पहले भारत पाकिस्तान का युद्ध शुरू होगा, और फिर अपना निवेश बचाने के लिए चीन को बीच में आना पड़ेगा। फर्स्ट राउंड में अमेरिका भारत को सिर्फ सीमित मात्रा में हथियारो की मदद भेजेगा, और जब भारत पिटने लगेगा तो अमेरिका भारत की तरफ से युद्ध की कमान संभाल लेगा, एवं बड़े पैमाने पर हथियार भेजना शुरू कर देगा। और भारत के नागरिक सोचेंगे कि अमेरिका हमें "बचाने" आया है !!
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यदि पाकिस्तान के राजनेता युद्ध को टालने की कोशिश करते है (जो कि वे कर सकते है) तो अमेरिका पाकिस्तान के जनरलों को डॉलर एवं हथियार भेजेगा और कश्मीर पर हमला करने को कहेगा। इस तरह भारत एवं पाकिस्तान का युद्ध शुरू होगा। बाद में अमेरिका भारत को डबल हथियार भेजेगा और भारत की सेना पाकिस्तान में अंदर तक घुस जाएगी। जैसे ही भारत की सेना POK में घुसेगी, CPEC को बचाने के लिए चीन को बीच में आना पड़ेगा।
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यदि चीन पाकिस्तान की सेना को भारत पर हमला करने से रोकने में सफल हो जाता है तो अमेरिका आतंकी समूहों एवं इंटर्नल इंसरजेंसी का सहारा लेगा। अमेरिका कश्मीर में हथियार भेजकर गुह युद्ध शुरु करेगा। साथ ही अमेरिका असम में भी हथियार भेजेगा। इन दोनों हिस्सों में यदि हथियार आने शुरू हो जाते है तो हिन्दुओ का बड़े पैमाने पर कत्ले आम होगा और लाखो नागरिको को पलायन करना पड़ सकता है।
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और तब भारत में State Vs इस्लामिस्ट का एक गृह युद्ध शुरू हो सकता है, जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिमों का कत्ले आम हो सकता है। इससे भारतीय मुस्लिमो बचाने के लिए ईरान, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान साथ में आ सकते है, और भारत में कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों को बड़े पैमाने पर हथियार भेजना शुरू कर देंगे। तब यह जंग भारतीय हिन्दू Vs एशियाई महाद्वीप के मुस्लिम के बीच बन जायेगी। तब अमेरिका भारत को हथियारों की मदद करना शुरु करेगा और जंग शुरू हो जाएगी।
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और इस तरह के दर्जनों पहलू हो सकते है जिनका इस्तेमाल करके अमेरिका भारत, पाकिस्तान, चीन, ईरान, अफगानिस्तान के बीच जंग शुरू कर सकता है। हमारी समस्या यह है कि भारत के पास इससे बचने का कोई उपाय नहीं है। सब कुछ तय करने वाला अमेरिका है। या तय करने वाला है चीन। यदि ये देश भारत को जंग का मैदान बनाना तय करते है तो भारत क्या चाहता है, यह महत्वहीन है। भारत की इच्छा महत्त्वहीन इसलिए है क्योंकि भारत जंग लड़ने और खुद को जंग से बचाने के लिए अमेरिकी हथियारों पर बुरी तरह से निर्भर है।
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(4) तो युद्ध कब होगा ?
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इसका जवाब मेरे पास नहीं है। किसी के पास नहीं है। इतिहास हमें यही बताता है कि इसी तरह की बातें चलती रहती है, और अचानक किसी भी समय किसी न किसी वजह से युद्ध शुरू हो जाता है। हम बस इतना देख सकते है कि युद्ध की तैयारी कहाँ हो रही है । और यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, कि अमेरिका चीन के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा है। और जब तक अमेरिका भारत की सेना, जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल न करें, तब तक अमेरिका किसी भी स्थिति में चीन से लड़ नहीं सकता। चीन को तोड़ने के लिए उसे भारत चाहिए ही चाहिए।
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यदि भारत के नागरिक सरकार पर दबाव बनाकर ऍफ़डीआई को रूकवाने में कामयाब हो जाते है, तो अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार कंपनियों द्वारा भारत का अधिग्रहण करने की प्रक्रिया रूक जाएगी, और युद्ध कुछ समय के लिए टल जाएगा। सिर्फ कुछ समय के लिए !!
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युद्ध पूरी तरह से इसीलिए नहीं टलेगा, क्योंकि भारत के सेना विदेशी हथियारों पर निर्भर है। अत: तब अमेरिका पाकिस्तान का इस्तेमाल करके जंग शुरू करेगा। यदि पाकिस्तान को पूरे पूरे अमेरिकी हथियार (मिलिट्री ड्रोन, फाइटर प्लेन, लेसर गाइडेड मिसाइले, लेसर गाईडेड बम, आदि) मिल जाते है, तो पाकिस्तान भारत के काफी अंदर तक घुस आएगा।
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यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है, या नहीं कर पाता है, तो वक्त के साथ चीन की सेना मजबूत होती जायेगी, और फिर चीन भारत के साथ ठीक वही करेगा जो की आज अमेरिका भारत के साथ कर रहा है। मतलब चीन भारत का आर्थिक एवं सैन्य रूप से अधिग्रहण कर लेगा।
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असल में, इन सभी स्थितियों में या इस तरह की किसी भी स्थिति में भारत की स्थिति खुद को बचाने के लिए इधर उधर भागने वाले की रहेगी। और हथियारों की लिस्ट लेकर जाने के लिए हमारे पास सिर्फ 2 ठिकाने है – रूस एवं अमेरिका !!
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रूस अब हमसे काफी दूर हो चुका है, और कोई वजह नहीं कि वह भारत को बचाने के लिए या तो अमेरिका या तो चीन से दुश्मनी मोल ले। क्योंकि भारत की स्थिति एक तरबूज की है, जिसे काटने और काटकर बांटने के लिए चीन एवं अमेरिका चाकू लेकर खड़े है। अभी ऍफ़डीआई के माध्यम से दोनों देश थोड़ी थोड़ी फांके ले रहे है।
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यदि ऐसे ही चलता रहा तो धीरे धीरे अमेरिका एवं चीन भारत को आधा आधा बिना किसी जंग के ही बाँट लेंगे। और यदि जंग हो जाती है, भारत किसके हिस्से में जायेगा इसका फैसला जंग करेगी। मतलब यह उसी तरह की लड़ाई है, जो ब्रिटिश एवं फ्रांसिस आज से 220 साल पहले भारत में लड़ रहे है। ब्रिटिश के पास फ़्रांस से बेहतर हथियार थे अत: तब भारत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हिस्से में चला गया था।
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(5) भारत में आपको ऐसे कई बुद्धिजीवी मिलेंगे जो इसे समस्या के रूप में देखते ही नहीं है कि, भारत की सेना विदेशियों के हथियारों पर निर्भर है !! घूम फिर कर वे अपनी बहस को इस बिंदु के इर्द गिर्द रखते है कि, भारत की सेना “पर्याप्त” रूप से मजबूत है। अमेरिका हमारा मित्र देश है, अत: वह चीन को ख़त्म करने के बाद भारत को ख़त्म नहीं करेगा। अब भारत का कभी युद्ध नहीं होगा, अत: आपको भय फैलाने की जरूरत नहीं है। और यदि भारत को युद्ध का सामना करना पड़ता भी है तो भारत की सेना पर्याप्त रूप से मजबूत है !! आदि आदि
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दुसरे शब्दों में, वे भारत की सेना को विदेशियों के हथियारों पर निर्भर बनाए रखना चाहते है, ताकि अमेरिका भारत की जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल चीन को तोड़ने में कर सके। दरअसल, ये बुद्धिजीवी युद्ध की चर्चा को टाल कर भारत को युद्ध की तरफ धकेल रहे है। और वे ऐसा इसीलिए कर रहे है, क्योंकि पेड मीडिया ने उन्हें ऐसा करने के लिए चाबी दी है।
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मेरे विचार में, भारत के प्रत्येक नागरिक को अब इस बारे में स्टेंड लेना चाहिए कि क्या वह अमेरिका को चीन के खिलाफ अपनी सेना एवं जमीन का इस्तेमाल करने देना चाहता है या नहीं। और यदि आप भारत की जमीन का इस्तेमाल चीन के खिलाफ करने देना चाहते है, तो आपको यह बात समझ लेनी चाहिए कि, यह फैसला पेड मीडिया का है, आपका नही। क्योंकि पेड मीडिया के प्रायोजक इस युद्ध की तैयारी पिछले 10 वर्षो से कर रहे है। भारत में ऍफ़डीआई उनकी इसी तैयारी का हिस्सा है।
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(6) समाधान : मेरा प्रस्ताव जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर का है। यदि ये दोनों क़ानून गेजेट में छाप दिए जाते है तो भारत अगले 5-6 वर्ष में स्वदेशी तकनीक आधारित इतने ताकतवर हथियार बना सकता है, कि हम चीन एवं अमेरिका की सेना का मुकाबला कर सके। यदि एक बार हम खुद के हथियार बनाने की क्षमता जुटा लेते है, तो युद्ध को टाला जा सकता है।
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यदि हम स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने में असफल रहते है तो चीन से युद्ध टल जाने पर भी अमेरिका भारत का पूरी तरह से अधिग्रहण कर लेगा।
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नियम और कानून में क्या अंतर है ?
क्या करने की अनुमति है, एवं क्या करने की अनुमति नहीं है की सूचना देने वाले पाठ्य को नियम या क़ानून कहते है। विशिष्ट एवं संक्षिप्त होने के कारण इन्हें हमेशा बिन्दुओ के रूप में लिखा जाता है।
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नियम एवं कानून में अंतर :
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नियम निजी संस्थाओ द्वारा बनाए जाते है, जबकि क़ानून बनाने की शक्ति सिर्फ सरकार के पास होती है
नियमों को तोड़ने पर आर्थिक या करावासीय दंड का सामना नहीं करना पड़ता, जबकि क़ानून तोड़ने पर हमेशा दंड का सामना करना पड़ता है।
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मूल अंतर इतना ही है। इससे सम्बंधित कुछ अन्य मूल्यपरक विवरण निचे दिए गए है
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(1) सरकार किसे कहते है ?
अमुक क्षेत्र में जिस संस्था के पास सेना रखने की शक्ति होती है, उस संस्था को सरकार कहते है।
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(2) सरकार में कौन लोग होते है ?
मुख्यत: सांसदो और विधायको के समूह से सरकार बनती है। सांसद संसद में बैठते है, और विधायक विधानसभाओ में।
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(3) सरकार का मुख्य काम क्या है ?
सरकार का एक मात्र काम क़ानून बनाना है। क़ानून बनाने के अलावा उन्हें कुछ नहीं करना होता। संसद और विधानसभा उनके दफ्तर है, जहाँ बैठकर वे क़ानून बनाते है।
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(4) जो लोग क़ानून तोड़ते है क्या उन्हें पकड़ना सरकार का काम नहीं है ?
नहीं। सरकार का काम उन्हें पकड़ना नहीं है। सरकार उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस के क़ानून बना देगी और पुलिस वाले कानून तोड़ने वालो को पकड़ते रहेंगे। इसी तरह जो भी काम करना हो सरकार उस काम को करने के लिए क़ानून बनाती है बस। क़ानून बनाने के अलावा सरकार और कुछ नहीं करती, और न ही कुछ कर सकती है।
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क़ानून बनाने के अलावा आप सरकार के अंगो (सांसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री) को जो भी करते देखते है, वह एक तमाशा होता है। तमाशे से ज्यादा उसमें कोई कीमत नहीं होती।
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(5) व्यवस्था (System) किसे कहते है ?
नियमों एवं कानूनों के समुच्चय (Set) को व्यवस्था कहते है।
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(6) क्या सरकार व्यवस्था नहीं बनाती ?
नहीं। सरकार व्यवस्था नहीं बनाती। दरअसल व्यवस्था अपने आप में स्वतन्त्र रूप से कुछ नहीं होता। व्यवस्था का मूल तत्व क़ानून है। सरकार सिर्फ क़ानून बनाती है, और कानूनों के सेट को आप व्यवस्था कहने लगते है। तो दरअसल जब आप कहते है कि, भारत की व्यवस्था (System) खराब है, तो आप कह रहे होते है कि भारत के क़ानून ख़राब है।
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यह बात दीगर है कि जब आप कहते है कि अमुक क़ानून खराब है, तो इसमें एक विशिष्टता होती है। जबकि व्यवस्था खराब है, वक्तव्य एक नारा बन कर रह जाता है !!
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(7) किसी व्यवस्था में परिवर्तन कैसे किया जा सकता है ?
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जैसा ऊपर बताया है कि व्यवस्था अपने आप में कानूनों का एक सेट है, अत: जैसे ही कानून में बदलाव किया जायेगा वैसे ही व्यवस्था बदल जायेगी। क़ानून को बदले बिना आप व्यवस्था बदल ही नहीं सकते। क्योंकि व्यवस्था जैसा कुछ होता ही नहीं है, जिसे कानून को बदले बिना बदला जा सके।
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भारत की ट्रेफिक व्यवस्था के उदाहरण से इसे समझते है :
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भारत में सड़कें बनाने और टोल वसूलने के कुछ कानून है, गाड़ी खरीदने और इसे चलाने के फिर से कुछ क़ानून है। इसी तरह चालको के सड़क पर व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए RTO एवं ट्रेफिक पुलिस विभाग है, और इन विभागों में काम करने वाले अधिकारीयों के लिए सेवा शर्तो के फिर से कुछ क़ानून है।
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इस तरह भारत भर में कुछ 100 से ज्यादा तरह के क़ानून मिलकर भारत में ट्रेफिक व्यवस्था का निर्माण करते है। और इसी तरह से पुलिस व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, बिजली व्यवस्था, जलदाय व्यवस्था आदि सैंकड़ो व्यवस्थाएं है, और प्रत्येक व्यवस्था के पीछे फिर से सैंकड़ो क़ानून है।
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इन सैंकड़ो कानूनों में से आप जैसे ही किसी एक कानून को छेड़ेंगे वैसे ही व्यवस्था बदल जायेगी। उदारहण के लिए ट्रेफिक व्यवस्था का एक क़ानून यह कहता है कि – जब भी आप कोई वाहन सड़क पर लायेंगे तो इसके आगे पीछे वाहन का नंबर लिखा होना चाहिए।
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अब यदि आप इस बिंदु को निकाल देते है, तो सड़क पर अनियंत्रित गति से दौड़ने वाले वाहनों की संख्या बढ़ जायेगी और लोग बेतहाशा ट्रेफिक रूल तोड़ने लगेंगे। क्योंकि अब ट्रेफिक रूल तोड़ने वालो को चिन्हित करके पकड़ा नहीं जा सकता। इस तरह क़ानून के सिर्फ एक बिंदु में बदलाव करने से पूरी व्यवस्था में दोष आना शुरू हो जाता है।
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यदि कानूनों में दोष नहीं है तो व्यवस्था में भी दोष नहीं रहेगा, और यदि कानून दोषपूर्ण है तो व्यवस्था भी दोषपूर्ण हो जाएगी। और एक दोषपूर्ण व्यवस्था हमेशा दोषपूर्ण ढंग से ही काम करगी। क्योंकि प्रक्रिया एवं नतीजो का दोहराव ही व्यवस्था की मुख्य विशेषता है।
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सार : यदि आपको देश का सिस्टम सुधारना है तो आपको क़ानून सुधारने होंगे। जैसे जैसे क़ानून सुधरेंगे वैसे वैसे सिस्टम में सुधार आएगा।
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और क़ानून सुधारने की दिशा में काम करने का पहला कदम यह है कि राजनैतिक विमर्श करने वाले ऐसे बुद्धिजीवियों से दूरी बनाकर रखें जिन्हें व्यवस्था बदलनी चाहिए, भारत का सिस्टम ही खराब है, पूरा सिस्टम भ्रष्ट हो चूका है टाइप की बौद्धिक जुगाली करने का व्यसन है।
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जब भी आपका सामना किसी ऐसे व्यक्ति से हो जो देश की व्यवस्था में बदलाव लाने की बात कर रहा हो तो उससे पूछे भारत की अमुक व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए वे किन क़ानूनो को बदलने का प्रस्ताव कर रहे है ?
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और आप देखेंगे कि उसके पास कानूनों में बदलाव की न तो कोई रूप रेखा है और न ही प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट है। वह सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन शब्द बेचकर तमाशा खड़ा कर रहा है।
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भारत को अगर किसी एक से सहयोग लेना पड़े रूस और अमेरिका के बीच, तब उसे किसे चुनना चाहिए और क्यों?
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[A] इस समय भारत 2 देशो के निशाने पर है :
चीन (+/रूस)
अमेरिका (+ब्रिटेन-फ़्रांस)
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(1) यदि हम अमेरिका से बचने के लिए रूस की शरण में जाते है तो रूस एवं चीन अमेरिका को रोक देंगे, किन्तु इसके एवज में रूस एवं चीन हमारा आर्थिक-सामरिक अधिग्रहण कर लेंगे !! (किन्तु धार्मिक नहीं)
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(2) यदि हम अमेरिका की शरण में जाते है (जो कि 30 साल पहले ही जा चुके है) तो आर्थिक-सामरिक के साथ साथ अमेरिका हमारा धार्मिक अधिग्रहण भी करेगा। यानी अमेरिका पूरे भारत को ईसाई देश में भी कन्वर्ट कर देगा।
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(3) यदि अमेरिका, चीन एवं रूस में भारत को लेकर समझौता हो जाता है तो भारत को एक दुसरे से बचाने के एवज में ये तीनो देश भारत का बाजार एवं प्राकृतिक संसाधन आपस में बाँट लेंगे।
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आर्थिक-सामरिक अधिग्रहण से मायने है कि अमुक देश (अमेरिका-ब्रिटेन-फ़्रांस+रूस+चीन) :
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हमारी स्थानीय इकाइयों को तबाह कर देंगे ताकि अमुक देश की कम्पनियां हमारे बाजार पर कब्ज़ा कर सके।
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वे हमारी गणित-विज्ञान के स्तर को तोड़ देंगे, ताकि तकनिकी वस्तुओं के उत्पादन में आवश्यक मानव संसाधन में कमी आये।
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वे जमीन की कीमतों को बढ़ाते जायेंगे ताकि स्थानीय इकाइयों की स्थापना करना मुश्किल हो जाए।
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और सबसे महत्त्वपूर्ण - वे सरकारी विभागों, अदालतों एवं पुलिस का डिजाइन इस तरह का बनाकर रखेंगे कि यदि रसूखदार / अमीर आदमी क़ानून तोड़ता है तो वह पैसा फेंककर क़ानून को बुत्ता दे सके, और जजों-नेताओं का इस्तेमाल करके छोटी इकाइयों को बंद करवा सके।
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वे भारत की स्वदेशी हथियार निर्माण इकाइयों का बचा खुचा बेस तोड़ देंगे और यहाँ पर हथियार निर्माण इकाईयां लगायेंगे, ताकि भारत सैन्य रूप से अमुक देश पर पूरी तरह से निर्भर हो जाए।
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तो हम चाहे चीन से बचने के लिए अमेरिका की शरण में जाए या अमेरिका से बचने के लिए रूस+चीन की शरण में जाए, दोनों ही स्थितियों में अमुक देश हमें बचाने के एवज में हमारा आर्थिक-सामरिक अधिग्रहण करेगा। मतलब कोई देश हमें मुफ्त में नहीं बचाएगा, हमें बचने के एवज में यह कीमत चुकानी ही होगी।
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इन देशो का जो इतिहास रहा है उस आधार पर हम कह सकते है कि यदि हम रूस+चीन की शरण में जाते है तो वे हमारा धार्मिक अधिग्रहण नहीं करेंगे। अमेरिका या रूस+चीन जब किसी देश का अधिग्रहण करते है तो इससे निम्नलिखित अंतर आता है :
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धर्म : रूस एवं चीन जिस देश का अधिग्रहण करते है उनके धर्म के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करते, किन्तु अमेरिकी जिस देश पर आर्थिक-सामरिक नियंत्रण बना लेते है, वहां पर धार्मिक नियंत्रण भी अवश्य बनाते है। मतलब वे स्थानीय धर्म को ख़त्म करके ईसाई धर्म थोप देते है।
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जातीय, वर्गीय, धार्मिक, लैंगिक अलगाव : अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार कम्पनियां समाज को बांटने में माहिर है, और वे इस तरीके का इस्तेमाल पिछले 200 सालों से कर रहे है। अत: अमेरिकी कम्पनियों का प्रभुत्व बढ़ने से भारत में जातीय, वर्गीय, साम्प्रदायिक अलगाव में वृद्धि होगी। इसके अलावा नारीवाद आदि के नाम पर लैंगिक संघर्ष भी बढ़ेगा। रूस एवं चीन समाज / परिवार को काटने की दिशा में काम नहीं करते।
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संस्कृति : अमरीकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार निर्माता जिस भी देश में जाते है वहां की संस्कृति का रूपांतरण करने में काफी निवेश करते है, ताकि कन्वर्जन की जमीन तैयार की जा सके। तो पेड मीडिया द्वारा अपसंस्कृति को सार्वजनिक बढ़ावा मिलेगा, और इसे “सामाजिक स्वीकार्यता” भी मिलेगी। AIB , बिग बॉस, सेकेर्ड गेम्स आदि इसी कड़ी के हिस्से है। पारिवारिक धारावारिको में भी अश्लीलता, नग्नता, फूहड़ता, समलैंगिकता, गाली गलौज का स्तर बढ़ेगा और इन्हें “सामाजिक स्वीकार्यता” मिलेगी। किन्तु रूस एवं चीन संस्कृति को नष्ट करने के लिए व्यवस्थित रूप से काम नहीं करते।
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अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार निर्माताओ के एजेंडे के बारे में अन्य विवरण के लिए ये जवाब पढ़ें – https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1074199619619781/
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[B] वैसे यह प्रश्न 67 वर्ष पुराना है, और यह प्रश्न लगातार सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं सबसे ज्यादा प्रासंगिक बना रहा है।
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(1) जब भारत आजाद हुआ तो जवाहर लाल के पास 2 विकल्प थे :
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भारत पूर्णतया स्वदेशी तकनिक पर आधारित (Made by India & Made by Indians) हथियारों का उत्पादन करे ताकि हम अमेरिका एवं चीन को रोक सके।
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हम खुद को बचाने के लिए ऐसे किसी देश की शरण में जाए जो निर्णायक हथियारों ले उत्पादन में आत्मनिर्भर हो। (यानी या तो रूस या अमेरिका)
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यदि जवाहर लाल ने बिंदु (1) की नीति पर काम करते तो रूस एवं अमेरिका से उनका संघर्ष बढ़ जाता और वे उन्हें अपदस्थ कर देते। अत: उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से “गुट निरपेक्षता, पंचशील, समाजवाद” आदि के रैपर लगाकर चिंगमें लांच की और अगले 15 वर्षो तक भारत के कार्यकर्ताओ / नागरिको / बुद्धिजीवियों को ये चिंगमें चबाने के काम में उलझाए रखा।
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1962 तक चीन भारत की तुलना में काफी ज्यादा हथियार बनाना सीख चुका था अत: उन्होंने भारत पर हमला कर दिया। तब अगले 24 घंटे में ही भारत को अमेरिका के सामने अपने घुटने तोड़ कर बैठना पड़ा। अमेरिका की शरण में जाने के कारण चीन ने बढ़ना रोक दिया और हम बच गए -- Pawan Kumar Sharma का जवाब - सन 1962 के भारत चीन युद्ध में चीन ने युद्ध विराम क्यों मान लिया था?
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(2) बाद में इंदिरा जी ने सैन्य दृष्टी से भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बड़े पैमाने पर स्वदेशी तकनीक आधारित हथियारों का उत्पादन करने के प्रयास किये, और इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली। इंदिरा जी और पेड मीडिया के प्रायोजको से टकराव के बारे में विवरण आप इस जवाब में पढ़ सकते है -https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1047932098913200/
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परमाणु बम एवं मिसाइले बनाने में हम सफल हुए किन्तु टैंक एवं फाइटर प्लेन का इंजन बनाने में हम फ़ैल हो गए। प्लेन एवं टैंक के इंजन बनाने में हम क्यों असफल रहे, इस बारे में मैंने अन्य जवाब में बताया है।
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(3) 1990 में सोवियत रूस के टूटने के बाद भारत की सभी मुख्यधारा पार्टियों एवं शीर्ष नेताओ ने अपनी खाल बचाने एवं राजनैतिक कैरियर बनाए रखने के लिए अमेरिका की शरण में जाने का फैसला कर लिया था। 1991 से अमेरिका ने भारत का अधिग्रहण करना शुरू किया और कारगिल के बाद 2001 के बाद से इसमें बेहद तेजी से इजाफा हुआ।
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आज हमारा पूरा देश अमेरिकी ही चला रहे है। यदि हमें रूस की तरफ जाना है तो हमें पहले संवेदनशील क्षेत्रो में काम कर रही अमेरिकी कम्पनियों को भारत से निकालना पड़ेगा। भारत की मुख्यधारा की सभी पार्टियाँ अमेरिकियों द्वारा पोषित है, और भारत की किसी भी राजनैतिक पार्टी के किसी नेता में इतना साहस नहीं है कि वह इस बारे में सोच भी सके। यदि हम अमेरिकी धनिकों से प्रतिरोध लेने जायेंगे तो अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच भारत में इतने ज्यादा ताकतवर हो चुके है कि वे बिना युद्ध लड़े ही हमें हरा देंगे।
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यहाँ तक कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता भी पिछले 20 वर्षो से उन सभी कानूनों का समर्थन कर रहे है जिससे अमेरिकी कम्पनियों का नियंत्रण भारत में बढ़े। कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओ ने 2004 में अमेरिकियों के पाले में जाना शुरू कर दिया था, और 2014 आते आते वे पूरी तरह अमेरिकियों के हाथो बिक चुके थे।
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जहाँ कार्यकर्ताओ की बात है, चूंकि भारत का पेड मीडिया पूरी तरह अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कम्पनियों के नियंत्रण में है अत: पेड मीडिया द्वारा दी गयी फीडिंग पर निर्भर भारत के ज्यादातर में से ज्यादातर कार्यकर्ता / नागरिक अब पूरी तरह इस बात पर सहमत है कि हमें अपना देश अमेरिकियों के हवाले कर देना चाहिए।
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[C] समाधान ?
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(1) यदि भारत को अमेरिका / चीन से बचना है तो हमारे पास सिर्फ 1 रास्ता है --
भारत पूर्णतया स्वदेशी तकनिक पर आधारित (Made by India & Made by Indians) हथियारों का उत्पादन करने की क्षमता जुटाने के लिए आवश्यक कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करें।
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मेरा सुझाव इन 4 कानूनों को गेजेट में छपवाने का है :
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धनवापसी पासबुक
रिक्त भूमि कर
जूरी कोर्ट
वोइक
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यदि उपरोक्त क़ानून गेजेट में आ जाते है तो मेरा आकलन है कि हम अगले 5-6 वर्षो में इतने ताकतवर हथियार बना सकते है कि अमेरिका एवं चीन की सेनाओं को अपने बूते पर रोक सकेंगे और हमें किसी की शरण में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इन कानूनों के गेजेट में आने से कैसे हम अमेरिका की सेना से लड़ने की सैन्य क्षमता जुटा लेंगे इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने अन्य जवाबो में लिखा है, उन्हें पढ़ें।
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यदि हम ऊपर दिए गए क़ानून देश में लागू करते है तो एक संभावना यह है कि अमेरिका/चीन/रूस आदि देश मिलकर हम पर सीधा हमला कर दें या पाकिस्तान / बांग्लादेश का इस्तेमाल करके हमें युद्ध में घसीटे।
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उस स्थिति से निपटने के लिए हमें एक क़ानून की और जरूरत होगी – सज्जन नागरिको को बंदूक रखने का अधिकार देने के लिए जनमत संग्रह। तब सिर्फ यह क़ानून ही हमें बचा सकेगा। और यदि हम यह क़ानून भी लागू कर देते है तो ज्यादातर से भी ज्यादातर सम्भावना है कि अमेरिका-चीन-पाकिस्तान आदि हम पर हमला करने का जोखिम नहीं उठाएंगे।
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(2) भारत की सभी पेड मीडिया पार्टियाँ (बीजेपी-कोंग्रेस-आपा-सपा-बसपा-कम्युनिस्ट) एवं इनके सभी शीर्ष नेताओ (सोनिया जी, केजरीवाल जी एवं मोदी साहेब) का स्टेंड :
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पेड मीडिया पर निर्भर ये सभी नेता उपरोक्त कानूनों के खिलाफ है
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साथ ही वे अपनी तरफ से भी इस बिंदु पर हमेशा खामोश रहते है कि, भारत को स्वदेशी पूर्णतया स्वदेशी तकनिक पर आधारित (Made by India & Made by Indians) हथियारों का उत्पादन करने में सक्षम बनाने के लिए वे किन कानूनों का सुझाव देते है।
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और अमुक बिंदु पर खामोश रहते हुए वे लगातार ऐसे क़ानून छाप रहे है जिससे भारत की निर्भरता लगातार अमेरिकी कंपनियों पर बढती जाए।
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उदाहरण के लिए अभी महीने भर पहले मोदी साहेब ने रक्षा में विदेशी निवेश की सीमा को 49% से बढ़ाकर 74% किया था, और अब रास्ता साफ़ होने के बाद बड़े पैमाने पर अमेरिकी-ब्रिटिश-कम्पनियां भारत में हथियार निर्माण के कारखाने लगाएगी। और सोनिया जी एवं केजरीवाल ने मोदी साहेब के इस फैसले का समर्थन किया !! और यहाँ तक कि कोंग्रेस-आपा के कार्यकर्ताओ ने भी मोदी साहेब के इस फैसले का समर्थन किया। इससे हमें निम्नलिखित नुकसान होंगे :
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74% स्टेक के बाद अब हथियार निर्माण कम्पनियों पर विदेशियों का स्वामित्व निर्णायक हो जाएगा। अत: भारत में स्थापित होने वाले हथियार कारखानों पर उनका उनका नियंत्रण होगा।
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वे नेताओं को धमका कर / उन्हें ब्राइब / म्राइब देकर सरकारी हथियार कम्पनियों का बचा खुचा बेस भी तोड़ देंगे। हथियार निर्माण की सरकारी कम्पनियों को अब धीरे धीरे या तो बंद कर दिया जाएगा या विदेशी इनका अधिग्रहण कर लेंगे।
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हथियार कंपनियों के भारत में सीधे घुस आने के बाद पेड मीडिया की शक्ति विस्फोटक रूप से बढ़ेगी, जिससे भारत के नेताओ की निर्भरता अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों पर और भी बुरी तरह से बढ़ जायेगी।
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हथियार कम्पनियों का मुख्य धंधा खनिज लूटना है। अत: अब वे भारत के नेताओं से ऐसे क़ानून छपवाएंगे जिससे वे लगभग मुफ्त में भारत के मिनरल्स लूट सके। तो अभी भारत के प्राकृतिक संसाधन की बहुत बड़े पैमाने पर लूट होने वाली है। और यह लूट पूरी तरह से कानूनी होगी।
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ये कम्पनियां जितना मुनाफा बनाएगी उसके बदले हमें डॉलर चुकाने होंगे। पहले हम हथियार लेने के लिए सीधे डॉलर चुका रहे थे, और अब रिपेट्रीएशन के रूप में डॉलर चुकायेंगे। मतलब हमारा डॉलर संकट में इजाफा होगा।
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अब पेड मीडिया के प्रायोजक भारत के खनिज, संसाधन, जमीन का इस्तेमाल करके भारत में हथियार बनायेंगे। दरअसल, वे बनायेंगे नहीं, बल्कि असेम्बल करेंगे। उसके बाद 5 गुना दाम में वे ये हथियार भारत की सेना को बेचेंगे। इसके बाद वे भारत के पीएम (उस समय जो भी पीएम होगा) को धमकाएंगे कि वे चीन / पाकिस्तान पर हमला करें, और पेड मीडिया का इस्तेमाल करके नागरिको को चीन / पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जाने के लिए तैयार किया जाएगा।
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भारत की सेना एवं जमीन का इस्तेमाल करके वे चीन / ईरान को ख़त्म करेंगे और फिर उनकी सेनाएं भारत में तब तक रहेगी जब तक वे भारत के मिनरल्स नहीं लूट लेते। जब भारत के मिनरल्स ख़त्म हो जायेंगे तो वे भारत के 5-7 टुकड़े करके हमें एक अफ़्रीकी देश से बदतर देश बनाकर निकल जायेंगे।
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यदि युद्ध टल जाता है तो पेड मीडिया के प्रायोजक हमारे मिनरल्स लूटते हुए भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में बदल देंगे। पिछले 200 साल में पेड मीडिया के प्रायोजक ऐसा पचासों देशो के साथ कर चुके है। यही उनका बिजनेस मॉडल है।
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जो-जो सरकारें अपने देश के नागरिकों को— PM, CM, SP, जजों पर Recall Power एवं जनमत संग्रह अधिकार, Jury right, Gun right की पावर एवं खनिजों का पूरा हिस्सा केवल नागरिकों एवं सेना को नहीं देते हैं—
वहां के नागरिक हमेशा अपनी- सरकारों से एवं विदेशी तानाशाहों से अपने देश के— खनिज संसाधनों की लूटने से बचाने में एवं अपनी खुद की समस्याओं को समाधान कराने में हमेशा हार जातें हैं या उनके लिए यह अधिकार हासिल करना अत्यंत कठिन हो जाता है!!
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इसीलिए भारत के नागरिकों को अपने देश की समस्याओं को बढ़ाने से और अपने देश के खनिज संसाधनों को लूटने से रोकने के लिए-
(01) जल्द से जल्द- वोट वापसी प्रधानमंत्री, वोट वापसी मुख्यमंत्री, वोट वापसी जज, वोट वापसी जिला पुलिस अधिकारी SP, पर— वोट वापसी पासबुक कानून लागू करवाना चाहिए।
(02) जूरी कोर्ट न्याय व्यवस्था कानून लागू करवाना चाहिए।
(03) जनमत संग्रह कानून लागू करवाना चाहिए।
(04) खनिज मुनाफा बंटवारा कानून लागू करवाना चाहिए।
(05) सभी सज्जन नागरिकों को केवल रजिस्ट्रेशन करवाकर बंदूक रखने का कानून का अधिकार दिलाने का कानून लागू करवाना चाहिए।
याद रक्खो!!
ईरान की बर्बादी की बारी आ जाने के बाद— अगला नंबर भारत का हो सकता है!!
और इसका जिम्मेवार आप सभी होंगे!!
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जैसे आज ईरान अकेला लड़ रहा है ठीक वैसे हीं हमे बचाने वाला भी कोई नहीं मिलेगा!!

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हिन्दूओं को अपने धर्म के विस्तार के लिए इस समय क्या कदम उठाना चाहिए?
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मेरा प्रस्ताव राष्ट्रीय स्तर पर एक हिन्दू बोर्ड के गठन करने का है। हिन्दू बोर्ड के गठन से हिन्दू धर्म तेजी से विस्तार करने लगेगा। इस समय भारत में हिन्दू धर्म जिस दशा से गुजर रहा है, उसमे विस्तार करना बहुत आगे की बात है। पहली चिंता यह है कि हिन्दू धर्म जिस तेजी से सिकुड़ रहा है, उसे रोका कैसे जाए। मैंने जो प्रस्ताव दिया है वह दोनों काम करेगा। पहले चरण में यह हिन्दू धर्म को सिकुड़ने से रोकेगा और दुसरे चरण में हिन्दू धर्म को विस्तार करने की शक्ति प्रदान करेगा।
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(1) हिन्दू बोर्ड क्या है इसका गठन कैसे होगा, और यह कैसे काम करेगा ?
(2) राष्ट्रिय सम्प्रदाय रजिस्ट्रार के आने से कैसे हिन्दू धर्म तेजी से विस्तार करना शुरू करेगा ?
(3) और कैसे हिन्दू बोर्ड के आने से विभिन्न राजनैतिक दल छद्म धार्मिक प्रोपेगेंडा खड़ा करके धार्मिक अनुयायियों को ठगने की शक्ति खो देंगे।
(4) हिन्दू बोर्ड के गठन के लिए आप क्या कदम उठा सकते है ?
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[ टिपण्णी : प्रस्तावित हिन्दू बोर्ड का प्रभाव बहु आयामी है, और इसके सभी पहलुओ एवं प्रभावों का सम्पूर्ण आकलन करना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। किन्तु जहाँ तक मैं देखता हूँ, हिन्दू बोर्ड का गठन वह निर्णायक बिंदु होगा जहाँ से सदियों बाद सनातन हिन्दू धर्म फिर से विस्तार करना शुरु करेगा।
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सामान्यतया धार्मिक प्रवचनों और उपदेशो से धर्म के विस्तार करने एवं सिकुड़ने का कोई लेना देना नहीं होता है। हिन्दू धर्म में जो संत, मनीषी आदि हुए उनमें से ज्यादातर ने धार्मिक संगठन के प्रशासन को मजबूत बनाने पर ज्यादा भार नहीं दिया। और जिन धार्मिक गुरुओ ने प्रशासनिक प्रक्रियाओ पर भार दिया उन्हें कार्यकर्ताओ ने गंभीरता से नहीं लिया।
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आज भी हिन्दू धर्म के कार्यकर्ताओ का ज्यादातर जोर धार्मिक उपदेशो एवं प्रवचन वगेरह पर रहता है, प्रशासनिक प्रक्रियाओ पर नहीं। इस वजह से हिन्दू धर्म का प्रशासन निरंतर कमजोर होता गया और जब उसका सामना किसी ऐसे धर्म से हुआ जिसके पास ज्यादा बेहतर प्रशासनिक प्रक्रियाएं थी तो हिन्दू धर्म सिकुड़ने लगा।
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उदाहरण के लिए एक निश्चित दिन, निश्चित समय और निश्चित स्थान पर अनिवार्य रूप से इकट्ठे होना ( एकत्रीकरण ) किसी भी संगठन को खड़ा करने के लिए एक शक्तिशाली प्रक्रिया है। गेदरिंग की वजह से इस्लाम में शक्ति आयी और उसने विस्तार करना शुरू किया। इसी विस्तार के दौरान इस्लाम हिन्दू धर्म के सम्पर्क में आया और हिन्दू धर्म ने अपनी जमीन एवं अनुयायी गंवाने शुरु किये।
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दूसरा मोड़ 1200 ईस्वी के आस पास तब आया जब इसाईयों को जूरी सिस्टम मिला और उसके बाद से अगले 400 वर्षो में ईसाई जहाँ जहाँ गए उन्होंने इस्लाम का अधिग्रहण किया। किन्तु ग्रंथियों को चुनने का अधिकार होने के कारण सिक्खो ने काफी कम संख्या में होने के बावजूद मुगलों एवं गोरो का अच्छे से प्रतिरोध किया।
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प्रस्तावित हिन्दू बोर्ड में इसी तरह की कई प्रक्रियाएं है, जो कई पहलुओ से हिन्दू धर्म को विस्तार करने की शक्ति प्रदान करेगी। यहाँ पाठक कृपया इस बात पर ध्यान दें कि इस क़ानून को हिन्दू धर्म के प्रशासन को सुधारने के नजरिये से लिखा गया है, और हिन्दू धर्म की विभिन्न धार्मिक परम्पराओं, रीतियों, संस्कृतियों, मीमांसाओ, उपदेशो आदि में इसका कोई दखल नहीं है। यह क़ानून उन्हें छूता भी नहीं । ]
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( खंड - क )
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(1) हिन्दू बोर्ड का गठन एवं इसकी रूपरेखा :
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हिन्दू बोर्ड एक प्रस्तावित क़ानून है। यदि भारत के प्रधानमंत्री इसे गेजेट में प्रकाशित कर देते है तो 30 दिनों के भीतर इसका गठन हो जायेगा। इसके संगठनात्मक ढाँचे की रूप रेखा एवं प्रक्रिया निम्नलिखित है :
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1.1. इस क़ानून के गेजेट में छपने से राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड नामक संस्था का गठन होगा, और इसके प्रत्येक सदस्य को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। इस संस्था के सदस्यों को हिन्दू बोर्ड मेम्बर या हिन्दू संघ सदस्य कहा जाएगा।

1.2. भारत के निम्नलिखित नागरिक हिन्दू बोर्ड के सदस्य हो सकेंगे :

उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है।
सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो के अनुयायी भी यदि इस बोर्ड में जुड़ना चाहते है तो इसकी सदस्यता ले सकेंगे।
यह क़ानून इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, पर कोई दायित्व या प्रतिबन्ध नहीं लगाता। इन धर्मो के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे।
स्पष्टीकरण : भारत में निवास करने वाला जो भी व्यक्ति खुद को हिन्दू कहता है, वह इस बोर्ड का स्वत: सदस्य होगा। किन्तु यदि कोई व्यक्ति स्वयं को गैर हिन्दू घोषित करता है या अन्य धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है तो उसका नाम बोर्ड की मेंबर लिस्ट से हटा दिया जाएगा। सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो का कोई अनुयायी भी यदि खुद को गैर हिन्दू घोषित नहीं करता है तो वह बोर्ड मेम्बर होगा।

एक अनुमान के अनुसार इस बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में 70 से 80 करोड़ वयस्क हिन्दू होंगे। इस तरह धर्म के प्रबंधन के लिहाज से यह दुनिया का सबसे बड़ा पंजीकृत सदस्यों का संघ होगा। तथा इस बोर्ड के सभी सदस्यों के पास बोर्ड बनाने के वोटिंग राइट्स होंगे। अत: मतदाताओ की संख्या के आधार पर भी यह सबसे बड़ी संस्था होगी।
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क्या भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में धार्मिक आधार पर ऐसी संस्था का गठन करना संवैधानिक है ?
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हाँ। यह पूरी तरह से संवैधानिक है। यह धार्मिक संस्था नहीं है, बल्कि धार्मिक संस्थाओ का प्रबंधन करने वाली संस्था है। चूंकि भारत एक सेकुलर देश है, अत: सरकार स्वयं किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन पर खर्चा एवं अतिरिक्त भार नहीं दे सकती। किन्तु विभिन्न धर्मो के प्रबंधन के लिए क़ानून बना सकती है, ताकि अमुक धर्म के अनुयायी अपनी संस्थाओ का प्रबंधन विधिवत रूप से कर सके।
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भारत में पहले से ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ( SGPC ) के नाम से ऐसा संगठन है। यह संस्था गोल्डन टेम्पल एवं उसके अधीन अन्य गुरूद्वारो का प्रबंधन करती है। ग्रंथियों को चुनने के लिए इलेक्शन होते है, और सिक्खों के पास इसके वोटिंग राइट्स है। सिर्फ सिक्ख पंथ का अनुयायी ही SGPC में मतदाता हो सकता है। SGPC का गठन सरकारी आदेश से हुआ था। जब गोरो ने गोल्डन टेम्पल पर उदासी महंतो के माध्यम से कंट्रोल लेने की कोशिश शुरू की तो सिक्खों ने आन्दोलन किया और 1925 में गोरो को यह क़ानून गेजेट में छापने के लिए बाध्य कर दिया था।
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आज SGPC संसद द्वारा अनुमोदित एक क़ानून है, और इसमें सरकार कोई भी संशोधन ला सकती है। अभी हाल ही में मोदी साहेब ने इसमें कुछ संशोधन किये है। उन संशोधनों पर फिर किसी जवाब में कहेंगे। वक्फ बोर्ड भी इसी तरह की कानूनी संस्था है, जो मदरसों एवं वक्फ के क्षेत्राधिकार की संस्थाओ का प्रबंधन करती है। हिन्दू बोर्ड का यह क़ानून भी प्रधानमंत्री द्वारा ही लाया जाएगा, और गेजेट में छापने से भारत में लागू होगा। अत: हिन्दू बोर्ड का गठन पूरी तरह कानूनी एवं संवैधानिक है। इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री इस पर हस्ताक्षर करके इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है।
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1.3. यह क़ानून किसी भी प्रकार से उन नागरिको पर हिन्दू होने का लेबल नही लगाता जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नहीं कहलाना चाहते। उदाहरण के लिए यदि कोई जैन या सिक्ख पंथ का अनुयायी इसमें नामांकित होता है तो भी उसकी कानूनी-धार्मिक-सामाजिक पहचान प्रवृत कानूनों के अनुसार जैन / सिक्ख धर्म के अनुयायी के रूप में बनी रहेगी
स्पष्टीकरण : संविधान में अल्पसंख्यक को अतिरिक्त लाभ दिए जाने का प्रावधान होने के कारण सनातन संस्कृति के कई पंथ स्वयं को हिन्दू धर्म से अलग करने के लिए प्रेरित होते जा रहे है। 2013 में जैन धर्म ने अल्पसंख्यक होने का लाभ लेने के लिए स्वयं को हिन्दू धर्म से अलग किया और अभी लिंगायत भी हिन्दू धर्म से अलग हो गये है।

अत: बिंदु 3 सनातन संस्कृति से प्रतीकात्मक रूप से अलग हुए भारतीय संस्कृति के सभी पन्थो के अनुयायियों को यह सुविधा देता है कि वे अपनी पहचान बनाए रखते हुए इस बोर्ड की सदस्यता ले सके। इस तरह यह बोर्ड बिना किसी विवाद के स्वैच्छिक रूप से सनातन संस्कृति के सभी पन्थो के अनुयायियों को एक जगह लेकर आता है।
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1.4. राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड ( Rashtriy Hindu Board = RHB ) की मुख्य कार्यकारिणी में 1 प्रमुख एवं 4 न्यासियो सहित कुल 5 व्यक्ति होंगे। हिन्दू बोर्ड का प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान एवं कार्यकारिणी के शेष 4 सदस्यों को न्यासी कहा जाएगा। हिन्दू संघ प्रधान वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा। यदि आप इस बोर्ड के मेंबर है और संघ प्रधान के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, तो वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर उसे निकालने और किसी अन्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकते है। आप अपनी अपनी स्वीकृति SMS, ATM या मोबाईल एप से भी दे सकेंगे।
स्पष्टीकरण : यह प्रावधान लोकतंत्र की स्थापना करता है। बोर्ड प्रमुख यानी संघ प्रधान चुन कर आएगा और यदि वह ठीक से काम नहीं कर रहा है तो हिन्दू नागरिक उसे किसी भी समय निकालने के लिए वोट भी कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि SGPC में सिक्खों के पास सिर्फ चुनने का अधिकार है, किन्तु निकालने का अधिकार नहीं है।
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जिस भी व्यवस्था में सिर्फ चुनने का अधिकार होता है किन्तु निकालने का अधिकार नहीं होता वहां पर जनता जिसे चुनती है वह जीतने के साथ ही चोरी-चकारी शुरू कर देता है। फिर 5 साल तक पीड़ित होने के बाद जनता जिस नए आदमी को चुनती है वह पद पर आकर लूटपाट शुरू करता है। और जब 5 साल बाद जनता नए आदमी को मौका देती है तो नया व्यक्ति पद सँभालते ही डाके डालने लग जाता है। तब जनता परेशान होकर सोचती है तो इससे तो चोर ही ठीक था। बस इसी तरह का रोटेशन चलता है।
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निकालने का सिस्टम नहीं होने वाली व्यवस्था में ड्रामे करने वाले, झूठ बोलने वाले और स्टंट दिखाने वाले व्यक्ति लोगो को एक बार चकमा देकर आसानी से चुन लिए जाते है। और फिर एक बार चुन लिए जाने के बाद जनता को इन्हें 5 साल भुगतना ही पड़ता है। मतलब जनता को सबसे कम बदतर को चुनना पड़ता है। इसका साक्षात उदाहरण आप भारत की राजनीती में देख सकते है।
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किन्तु हिन्दू बोर्ड में हिन्दू नागरिको के पास दोनों प्रक्रियाएं होगी। वे चुन भी सकेंगे और निकाल भी सकेंगे। अत: बदतर व्यक्ति पद पर रह नहीं पायेगा। यदि बेहतर होगा तो टिकेगा वर्ना साल छह महीने में निष्काषित कर दिया जाएगा।
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(2) हिन्दू बोर्ड का क्षेत्राधिकार :
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2.1. यदि एवं जब भारत के "सभी" मतदाताओ में से 45 करोड़ मतदाता धारा 30 में दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निचे दिए 4 देवालयों के भूखंड RHB को सौंप देते है तो हिन्दू बोर्ड इन मंदिरों की देख रेख करेगा :
राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या
कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा
काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी
अमरनाथ देवालय, कश्मीर
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2.2. इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर इस क़ानून की धारा 30 में दिए गए प्रावधानों का प्रयोग करते हुए प्रधानमन्त्री देश के सभी मतदाताओ के 4 देवालयों के लिए 4 अलग अलग देश व्यापी जनमत संग्रह करवाएंगे, जिसमें यह प्रश्न रखा जाएगा कि क्या उपरोक्त भूखंड हिन्दू बोर्ड को सौंप दिए जाने चाहिए या नहीं। यदि देश के 45 करोड़ मतदाता इसके लिए अपनी स्वीकृति हाँ के रूप में दे देते है, तो ही प्रधानमंत्री ये 4 भूखंड हिन्दू बोर्ड को सौंपेगे, अन्यथा नही।
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2.3. यह क़ानून उपरोक्त 4 देवालयों के भूखंडो के अतिरिक्त देश के अन्य किसी भी भूखंड पर - जिस पर मन्दिर, मस्जिद, चर्च होने का दावा हो या स्वामित्व को लेकर विवाद हो के स्वामित्व के निर्धारण हेतु धारा 30 का इस्तेमाल करने पर स्पष्ट रूप से प्रतिबन्ध लगाता है। इन 4 भूखंडो के अलावा अन्य किसी भी भूखंड पर इस तरह की देशव्यापी रायशुमारी नही की जाएगी।
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2.4. हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है। किन्तु बोर्ड उन देवालयों का अधिग्रहण / प्रबंधन नहीं करेगा जिनकी देख-रेख देवालय के मालिक RHB से नहीं कराना चाहते। सभी प्रकार की मस्जिदे, चर्च, गुरूद्वारे, बौद्ध तीर्थ स्थल एवं जैन तीर्थ स्थल आदि हिन्दू बोर्ड के दायरे से बाहर रहेंगे।
स्पष्टीकरण : इस क़ानून की धारा 30 में जनमत संग्रह की प्रक्रिया दी गयी है। यह जनमत संग्रह देश के सभी नागरिको के बीच कराया जाएगा, न कि सिर्फ हिन्दू नागरिको के लिए। जिस भूखंड पर बहुमत प्राप्त हो जाता है वह भूखंड हिन्दू बोर्ड को हस्तांतरित कर दिया जाएगा। यदि जनमत संग्रह में 45 करोड़ नागरिक किसी भूखंड को हस्तांतरित करने के लिए सहमती नहीं देते है तो भूखंड हस्तांतरित नहीं होंगे।

यह प्रावधान इन चारो भूखंडो के विवाद के स्वामित्व को लोकतान्त्रिक तरीके से हल करता है। इसके बाद कोर्ट में चल रहे मामलों का इसमे कोई दखल नहीं रह जाएगा। हस्तांतरण के बाद हिन्दू बोर्ड इन भूखंडो पर देवालयों का निर्माण करेगा और इनका प्रबंधन भी करेगा।
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2.5. हिन्दू बोर्ड का कोई भी सदस्य जिसकी आयु 30 वर्ष से अधिक हो, वह हिन्दू संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड के न्यासी पद के लिए आवेदन कर सकेगा। कोई व्यक्ति बोर्ड के न्यासी के साथ साथ संघ प्रधान के रूप में भी उम्मीदवार हो सकता है।
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2.6. कोई भी बोर्ड मेम्बर किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर संघ प्रधान या बोर्ड के किसी भी न्यासी के उम्मीदवारों के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता (बोर्ड मेम्बर) की हाँ दर्ज करेगा। पटवारी मतदाता की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम व मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है। कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी हाँ SMS, ATM, मोबाईल एप से दर्ज कर सके।
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2.7. यदि हिन्दू संघ प्रधान पद के किसी उम्मीदवार को 25 करोड़ से अधिक बोर्ड मेम्बर्स की स्वीकृति मिल जाती है और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन संघ प्रधान की स्वीकृतियों से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमन्त्री उसे नए संघ प्रधान के रूप में नियुक्त कर सकते है।
स्पष्टीकरण : यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि देश का कोई भी हिन्दू नागरिक संघ प्रधान के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर सके। ऐसा व्यक्ति कोई भी हो सकता है। भारत का कोई संत हो सकता है जो धर्म क्षेत्र में काम कर रहा हो। कैबिनेट स्तर का कोई सचिव हो सकता है। किसी संगठन या राजनैतिक दल का नेता हो सकता है, या कोई अन्य ख्यात प्रशासक या सामाजिक कार्यकर्ता हो सकता है। कृपया इस बात पर ध्यान दें कि संघ प्रधान हिन्दुओ का कोई धार्मिक गुरु नहीं है बल्कि प्रशासकीय मुखिया है। इसका क्षेत्राधिकार सिर्फ दान से प्राप्त धन एवं हिन्दू संस्थाओ का प्रबंधन होगा। धर्म की व्याख्या करना एवं धार्मिक आदेश निकालना इसके क्षेत्राधिकार में नही होगा।
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वह अपना आवेदन करने के बाद हिन्दू नागरिको के सामने अपना एजेंडा रखेगा कि वह किस तरह से प्रशासन चलाएगा कि हिन्दू संस्कृति का सरंक्षण एवं प्रसार हो। अनुमोदनो की प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी, और नागरिक किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार को अनुमोदन दे सकेंगे। जिसे 25 करोड़ से अधिक मत मिल जायेंगे वह हिन्दू संघ प्रधान बनेगा।
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(3) हिन्दू बोर्ड एवं संघ प्रधान की गतिविधियाँ :
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3.1. संघ प्रधान और न्यासी हिन्दू बोर्ड के संचालन और कर्मचारियों के प्रबंधन लिए जरुरी नियम बनाएंगे। संघ प्रधान के सभी निर्णयों को कम से कम दो न्यासियों के अनुमोदन की ज़रूरत होगी।
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3.2. बोर्ड किसी भी भारतीय व्यक्ति या गैर व्यक्ति भारतीय इकाई या विदेशी हिन्दू से दान प्राप्त कर सकता है, किन्तु विदेशी इकाई से नहीं । बोर्ड किसी व्यवसाय आदि में भी शामिल हो सकता है। जैसे कोई उद्योग, निगम, संस्था आदि।
स्पष्टीकरण : ऊपर दिए गए चार देवालयों और वे देवालय जो विभिन्न देवालय मालिको ने बोर्ड को सौंप दिए है में आने वाले दान का प्रबंधन संघ प्रधान करेगा। संघ प्रधान विभिन्न धार्मिक योजनाओ का खाका और उसका बजट बनाकर सार्वजनिक कर सकता है, और इसके लिए दान जुटा सकता है।
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संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड निम्नलिखित संभावित कार्य करेगा :
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(A) संघ प्रधान मुख्य धारा से कटे हुए उन सुदूर इलाको में अस्पताल एवं स्कूल खोल सकता है जहाँ पर शिक्षा-चिकित्सा नहीं है। फिलहाल इन रिमोट एरिया में मिशनरीज इस तरह के परोपकारी कार्य करके बड़े पैमाने पर धर्मान्तर कर रही है। हिन्दू बोर्ड के आने से वह प्राप्त दान से बड़े पैमाने पर आदिवासी-वंचित इलाको में स्कूल-अस्पताल सकेगा जिससे मिशनरीज के विस्तार का सबसे बड़ा रास्ता बंद हो जाएगा।
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मिशनरीज को टक्कर देने वाली इस तरह की गतिविधि सिर्फ हिन्दू बोर्ड जैसी संस्था ही कर सकती है। संत आसाराम जी बापू, संत राम रहीम जी, संत रामपाल जी जैसे निजी सम्प्रदाय यदि मिशनरीज के काम में दखल देंगे तो मिशनरीज उन्हें यौन शोषण के आरोपों में फंसा कर अंदर कर देने में सक्षम है। आज भारत में सिर्फ वही सम्प्रदाय / संत पनप सकता है, जो धर्म के नाम पर अपने अनुयायियों को सिर्फ डायलॉग सुनाता हो। यदि वह स्कूल-अस्पताल-दवाइयाँ जैसे काम करेगा तो मिशनरीज उसे गिरा देंगे।
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किन्तु हिन्दू बोर्ड कानूनी रूप से इतनी शक्तिशाली संस्था होगी कि इसे गिराया नहीं जा सकेगा। तो जैसे जैसे हिन्दू बोर्ड अपनी गतिविधियों के विस्तार करेगा वैसे वैसे मिशनरिज के परोपकार कार्यो की जड़े उखड़ने लगेगी, और नतीजे में धर्मान्तरण में भी कमी आएगी। और एक पॉइंट के बाद जब मिशनरीज के पाँव उखड़ जाते है तो हिन्दू धर्म छोड़कर जा चुके नव ईसाई फिर से हिन्दू धर्म में कन्वर्ट होना शुरू करेंगे।
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क्योंकि उन्हें हिन्दू बनने से हिन्दू बोर्ड में वोटिंग राइट्स मिलेंगे, स्कूल मिलेंगे, अस्पताल मिलेंगे, दवाइयाँ मिलेगी आदि। इस समय उन लोगो को हिन्दू बने रहने में कोई फायदा नहीं है, किन्तु कन्वर्ट होने से वास्तविक लाभ मिल रहे है। सिर्फ व्हाट्स एप पर भारत माता की जय एवं वन्दे मातरम का नारा लगवाकर उन्हें हिन्दू धर्म में बनाए नहीं रखा जा सकता। क्योंकि उनमे से ज्यादातर ने अभी तक व्हाट्स एप, फेसबुक आदि के बारे में सुना नहीं है।
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(B) भारत में पिछले 100 साल में धार्मिक आख्यानो का जितना प्रचार संतो, गुरुओ, कथा वाचको ने किया अकेले गीता प्रेस का योगदान इन सबके जोड़ से कई गुना ज्यादा है। गीता प्रेस ने भारत के हर घर तक धार्मिक ग्रंथो को बेहद सस्ते मूल्य में पहुँचाया। हाल ही में गीता प्रेस गोरखपुर वित्तीय संकट के कारण मुश्किलों में आ गयी थी। इस तरह की संस्था अपने बूते पर जब तक चल रही है तब तक चल रही है। यदि कोई संकट आता है तो हिन्दू धर्म में ऐसा कोई मिकेनिज्म नहीं है जो इनकी मदद कर सके। जहाँ सब की जिम्मेदारी होती है, वहां किसी की जिम्मेदारी नहीं होती। हिन्दू बोर्ड इस तरह के संकट में ऐसी धार्मिक संस्थाओ की मदद करने के लिए कदम उठा सकेगा।
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(C) हिन्दू बोर्ड गुरुद्वारों की तर्ज पर आवश्यकता नुसार जरुरतमंदो के लिए लंगर आदि चलाने की व्यवस्था शुरू कर सकता है। हिन्दू नागरिको को क़ानून के दायरे में रहकर हथियारों का शिक्षण देना, संस्कृत भाषा एवं दुर्लभ ग्रंथो को सरंक्षित करने के लिए कदम उठाना आदि को शामिल करते हुए और भी इसी तरह के सैंकड़ो धार्मिक-परोपकारी कार्य है जिन्हें हिन्दू बोर्ड व्यवस्थागत रूप से कर सकता है। वह जितना अच्छा कार्य करेगा, उसी अनुपात में दान में वृद्धि होगी। जैसे जैसे हिन्दू बोर्ड अपना प्रबंधन सुधरेगा वैसे वैसे अन्य बड़े मंदिर भी स्वैच्छिक रूप से अपना प्रबंधन हिन्दू बोर्ड को सौंपना शुरू कर देंगे।
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3.3. संघ प्रधान लिखित परीक्षा द्वारा 1000 दिनों की अवधि के लिए पुरोहितों एवं अन्य कर्मचारियों की भर्ती करेगा। संघ प्रधान विशेष कार्यों के लिए बाहरी ठेकेदारों को ठेके दे सकता है।
स्पष्टीकरण : एक महत्त्वपूर्ण बदलाव यह आएगा कि जिन देवालयों एवं संस्थाओ का प्रबंधन हिन्दू बोर्ड करेगा उनमे पुरोहितो एवं पुजारियों के रूप में दलितों एवं पिछड़ो की नियुक्ति का रास्ता खुल जाएगा। सावरकर ने दलितों को पुजारी बनाने के लिए गंभीर प्रयास किये थे, किन्तु देवालयों के मालिकों एवं ट्रस्टियों के प्रतिरोध के कारण मामला आगे नही बढ़ा। चूंकि हिन्दू बोर्ड में दलितों आदि को भी बराबर वोटिंग राइट्स होंगे, अत: सभी देवालयों के प्रबंधन में सभी हिन्दू एक स्तर पर बरते जायेंगे।
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3.4. संघ प्रधान इस सम्बन्ध में विधिवत पाठ्यक्रम अनुमोदित करेगा कि पुजारी बनने के लिए व्यक्ति को किन पुस्तको, शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है, एवं उसका आचार-व्यवहार ( मद्य निषेध-मांस निषेध आदि ) क्या होगा।
स्पष्टीकरण : किन्तु हिन्दू बोर्ड उन देवालयों में दखल नहीं करेगा, जो विभिन्न धार्मिक ट्रस्टो द्वारा चलाये जा रहे है, या उनके ट्रस्टी अपने देवालय का प्रबंधन हिन्दू बोर्ड से नही कराना चाहते। अमुक मंदिरों में ट्रस्टियों के नियम क़ानून ही लागू होंगे हिन्दू बोर्ड के नही। इस तरह यह क़ानून स्थापित धार्मिक संस्थाओ एवं देवालयों में कोई दखल नही करता।
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(4) हिन्दू बोर्ड के सदस्यों के मतदान अधिकार :
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4.1. प्रत्येक व्यक्ति जो हिन्दू है और RHB का ड्राफ्ट राजपत्र में छपने की दिनांक पर 18 वर्ष से ऊपर की आयु का है, राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड का मतदाता सदस्य होगा। इस हिन्दू बोर्ड में गैर-हिन्दू मतदाता सदस्य नहीं होंगे। शब्द हिन्दू में हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि सम्प्रदायों के अनुयायी भी शामिल है, जिन सम्प्रदायों का उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप रहा है ।
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4.2. यदि कोई व्यक्ति स्वयं को गैर-हिन्दू कहता है और बोर्ड का सदस्य नहीं बनता तो उसका अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा इस क़ानून द्वारा प्रभावित नहीं होगा।
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4.3. यदि कोई ईसाई या मुस्लिम हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी उसकी पहचान की पुष्टि करके अनुमोदन करेगी। जूरी के अनुमोदन के बाद यदि सभी न्यासी भी इसका अनुमोदन करते है तो संघ प्रधान उसका नाम बोर्ड की सदस्य सूची में जोड़ेगा। नाम तब तक नहीं जोड़ा जायेगा जब तक कम से कम 100 बोर्ड मेम्बर्स की जूरी बहुमत द्वारा स्वीकृति नहीं देती।
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4.4. यदि कोई व्यक्ति हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य किसी धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है तो उसका मताधिकार निलम्बित कर दिया जाएगा। यदि धर्मान्तरित हुआ अमुक व्यक्ति एक वर्ष के भीतर फिर से हिन्दू धर्म में पुन: धर्मान्तरित नहीं होता है तो उसका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से हटा दिया जाएगा। और यदि वह दो बार किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है तो दूसरी बार उसका नाम बिना 1 साल इंतज़ार किये हटा दिया जायेगा। विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय अंतिम होगा।
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4.5. यदि किसी व्यक्ति की माता या पिता में से कोई एक हिन्दू है और वह स्वयं को हिन्दू घोषित करता है तो वह 18 वर्ष की आयु से हिन्दू बोर्ड का मतदाता बन जाएगा।
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(5) विवादों एवं मामलो का जूरी द्वारा निपटान :
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5.1. जूरी प्रशासक जिले की हिन्दू बोर्ड मेम्बर लिस्ट में से 30 सदस्यीय महाजूरी मंडल की नियुक्ति करेगा। इनमे से हर 10 दिन में 10 सदस्य रिटायर होंगे और नए 10 सदस्यो का चयन मेम्बर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा कर लिया जाएगा। यह महाजूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा। महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 500 रू एवं यात्रा व्यय मिलेगा।
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5.2. यदि संघ प्रधान, न्यासी या बोर्ड के स्टाफ से सम्बंधित कोई भी मामला है तो वादी अपने मामले की शिकायत महाजूरी मंडल के सदस्यों को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल के सदस्य मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है, अथवा इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए जूरी मंडल के गठन का आदेश दे सकते है।
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5.3. मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच कितने सदस्यों की जूरी बुलानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा 30 से 55 वर्ष के बीच की आयुवर्ग के सदस्यों का चयन करके एक जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा।
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5.4. अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नारको टेस्ट या नौकरी से निकालने का निर्णय लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी के फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी होगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील उच्च जूरी मंडल में कर सकते है।
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5.5. जिला जूरी मंडल के निर्णय की अपील राज्य जूरी मंडल में एवं राज्य जूरी मंडल के फैसले की अपील राष्ट्रीय जूरी के सामने की जा सकेगी। प्रवृत कानूनों के अनुसार फैसले की अपील जिला / उच्च / उच्चत्तम न्यायालय में भी की जा सकेगी।
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5.6. यदि 75% या उससे अधिक जूरी सदस्य आरोपी कर्मचारी को नौकरी से निकालने या जुर्माना लगाने का निर्णय देते है तो संघ प्रधान अमुक कर्मचारी को निकाल सकता है या उससे जुर्माना वसूल सकता है। यदि शिकायतकर्ता को लगता है कि संघ प्रधान ने जूरी सदस्यों के निर्णय का ठीक से पालन नहीं किया है, तो वह हिन्दू बोर्ड के मतदाताओं से मांग कर सकता है कि वे धारा 15 में दी गयी वोट वापसी प्रक्रिया का प्रयोग करके हिन्दू संघ प्रधान को नौकरी से निकालने की सहमती दें।
स्पष्टीकरण : यह प्रावधान हिन्दू देवालयों एवं संस्थाओ में भ्रष्ट जजों के दखल को रोकता है। हिन्दू बोर्ड से सम्बंधित जो भी मामले आयेंगे उसकी सुनवाई हिन्दू नागरिको की जूरी करेगी। इस प्रावधान के कारण भ्रष्ट जज हिन्दू देवालयों के प्रशासन को तोड़ने में कामयाब नहीं हो पायेंगे।
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( खण्ड - ख )
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हिन्दू बोर्ड के प्रस्तावित क़ानून में दो खंड है। पहले खंड का विवरण मैंने ऊपर दिया है। दुसरे खंड का ब्यौरा निचे दिया जा रहा है। सम्प्रदायों को प्रबंधित करने वाला यह खंड ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसके मैंने कुछ हिस्से और प्रभाव यहाँ दिए है। विस्तृत विवरण देखने के लिए पूरा ड्राफ्ट पढ़ें। ड्राफ्ट का लिंक इस जवाब के अंत में दिया गया है।
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सनातन संस्कृति के विभिन्न सम्प्रदायों का प्रबंधन :
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यह इस क़ानून का सबसे महत्त्वपूर्ण खंड है। इस खंड के तहत प्रधानमंत्री एक सनातन संस्कृति के सम्प्रदायों के लिए एक रजिस्ट्रार की नियुक्ति करेंगे।

यह रजिस्ट्रार हिन्दू संघ प्रधान के अधीन नहीं होगा, और सीधे हिन्दू बोर्ड मेम्बर्स के रूप में करोड़ो नागरिको के कंट्रोल में रहेगा। यह खंड उन सभी देवालयों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करके श्रद्धालुओ के अधीन करेगा, जिन्हें भ्रष्ट जजों के माध्यम से सरकार ने हथिया लिया है। साथ ही भारत के सभी सम्प्रदायों के अनुयायियों को उन सम्प्रदायों के ट्रस्टियों को चुनने एवं निकालने के वोटिंग राइट्स मिलेंगे जिस सम्प्रदाय से आप जुड़े हुए है।
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उदाहरण के लिए यदि आप आर्य समाजी या स्वामी नारायण सम्प्रदाय के अनुयायी है तो आप अमुक सम्प्रदाय के मतदाता सदस्य बनेंगे। राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड की वोट वापसी पासबुक में एक सेक्शन ट्रस्टो का भी होगा। यदि आप किसी ट्रस्ट के मतदाता सदस्य है तो अपने ट्रस्ट के ट्रस्टियों एवं अध्यक्ष को बदलने के लिए किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दर्ज कर सकते है।
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(1) संप्रदाय रजिस्ट्रार की नियुक्ति एवं कार्यक्षेत्र :
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1.1. प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय सनातन संप्रदाय रजिस्ट्रार ( National Sanatan Sect Registrar ) नामक अधिकारी की नियुक्ति करेंगे, जो उन सम्प्रदायों एवं उनके अनुयायियों की सदस्य सूची बनाने एवं उन्हें लोकतांत्रिक रूप से प्रबंधित करने में व्यवस्थागत सहयोग करेगा जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन संस्कृति है, तथा वे एक पंथ या सम्प्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त धार्मिक ट्रस्ट है। ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों में जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी भारतीय संप्रदाय शामिल है।
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रजिस्ट्रार का ट्रस्ट की धार्मिक मान्यताओ में कोई दखल नहीं होगा। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से SGPC द्वारा शासित है, अत: सिक्ख पंथ रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेगा। इसके अलावा इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, भी रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर होंगे।
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1.2. वे सभी धार्मिक ट्रस्ट जिनका किसी देव स्थान या देवालय पर स्वामित्व है, उन्हें जिला सम्प्रदाय रजिस्ट्रार में अपने ट्रस्ट का पंजीयन कराना होगा। ऐसे देवालय जो किन्ही व्यक्तियों के निजी स्वामित्व में है, रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार में नहीं आयेंगे।
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1.3. जिला रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्ट से शुल्क के रूप में 1000 रूपये प्रति वर्ष लेगा। रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्टी से भी 1000 रूपये प्रति ट्रस्ट के हिसाब से जितने ट्रस्टों का वह ट्रस्टी है वार्षिक शुल्क लेगा।
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1.4.अध्यक्ष तथा ट्रस्टी ट्रस्ट के स्वामित्व में जितनी संपत्ति है उसके ब्यौरे की सूची जिला रजिस्ट्रार को देंगे। इस सूची में ट्रस्ट के स्वामित्व वाली भूमि, इमारतें, नकदी, शेयर, बांड, सोना, चांदी, फर्नीचर, किसी को दिया या किसी से लिया गया कर्ज, संपत्ति, कोई अन्य मूल्यवान प्रतिभूति आदि एवं इनका बाजार मूल्य शामिल है। कोई भी ट्रस्टी यह सूची रजिस्ट्रार को दे सकता है, एवं सभी ट्रस्टी अलग अलग भी यह सूची दे सकते है। सूची मे विचलन होने पर जूरी इसका निपटान करेगी।
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1.5. जिला रजिस्ट्रार अपने जिले के प्रत्येक ट्रस्ट का नाम, क्रम संख्या, ट्रस्ट विलेख, सभी ट्रस्टियों के नाम, ट्रस्ट की संपत्तियां (मय बाजार मूल्य) आदि की पूरी अद्यतन जानकारी ट्रस्ट के लिए बनायी गयी जिला वेबसाइट पर रखेगा। यह सूचना राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बनायी गयी ट्रस्ट की राष्ट्रीय वेबसाइट पर भी रखी जायेगी।
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(2) नए मतदाता सदस्यों का प्रवेश तथा निष्कासन :
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2.1. यदि कोई मतदाता सदस्य किसी अन्य धर्म में परिवर्तन कर लेता है या किसी ऐसे संप्रदाय में शामिल हो जाता है जो कि परंपरागत रूप से अथवा ट्रस्ट के दस्त

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रफाल जेट से भारत की कौन सी सैन्य कमी पूरी होगी?
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भारत फाइटर प्लेन्स के इंजन नहीं बनाता, अत: हम अपनी सेना चलाने के लिए विदेशियों के लड़ाकू विमानो पर बुरी तरह से निर्भर है। इस स्थिति में हमारे पास 2 विकल्प बचते है :
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हम गेजेट में वे आवश्यक क़ानून प्रकाशित करें जिससे हम फाइटर प्लेन बनाने की क्षमता जुटा सके
हम विदेशियों से लड़ाकू विमान ख़रीदे।
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मैं बिंदु 1 में दिए गए विकल्प पर काम करने के मानता हूँ, और विदेशी हथियारों को खतरे के रूप में देखता हूँ। वजह यह है कि विदेशी हथियारों के कारण भारत की सेना युद्ध लड़ने के लिए विदेशियों पर निर्भर हो जाती है।
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(1) 1967 की बात है, तब अमेरिका ने भारत को आने वाली गेंहू की सप्लाई को बाधित कर दिया था। भारत को यह गेंहू Public Law-480 के तहत आता था, और अमेरिका इसे बिना किसी वाजिब कारण के रोक नहीं सकता था। अत: उन्होंने परिवहन प्रक्रिया के झमेले डालकर इसकी सप्लाई तोड़ दी जिससे भारत में गेंहू की कमी हो गयी।
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दरअसल, इस समय अमेरिका विएतनाम पर बम गिरा रहा था, और इंदिरा जी हनोई पर बमबारी करने की आलोचना की थी। और इंदिरा जी के इस बयान से अमेरिकी हथियार निर्माता नाराज हो गये थे !!.
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जब इंदिरा जी ने कहा कि, भारत वही कह रहा है जो पोप एवं यूएन महासचिव कह रहे है, तो अमेरिका ने जवाब दिया कि –
लेकिन पोप एवं यूएन को अपने नागरिको को खिलाने के लिए हमारे गेंहू की जरूरत नहीं है !!
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Public Law-480 के तहत भारत को ये गेंहू लेने के लिए रूपये में भुगतान करना होता था, डॉलर में नहीं। आज की तरह तब भी भारत के पास डॉलर नहीं थे। अत: भारत को अपमान का घूँट पीना पड़ा - Swallowing the humiliation
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ध्यान देने वाली बात यह है कि, यदि तब यह खबर मीडिया में नहीं आती तो भारत को पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा नहीं होना पड़ता। इस तरह पेड मीडिया किसी देश के प्रधानमंत्री को अपने देशवासियों और पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा होने से बचा लेता है !!
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पाकिस्तान को भी गेंहू अमेरिका ही देता था, और जब शिपयार्ड से गेंहू ऊँट गाड़ियों पर लादकर ले जाया जाता था, तो ऊँटो के गले में तख्तियां लटकायी जाती थी। इस तख्तियों पर बड़े अक्षरों में लिखा होता था – Thank you America !!
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(2) भारत का चीन से युद्ध होता है तो हमें फाइटर प्लेन्स की जरूरत होगी। यदि डॉलर हो तो गेंहू ख़रीदे जा सकते है किन्तु फाइटर प्लेन्स नहीं। क्योंकि फाइटर प्लेन्स गेंहू नहीं है। रूस के अलावा सिर्फ अमेरिकी+ब्रिटिश+फ्रेंच को ही ये बनाने आते है। और ये तीनो देश (अमेरिका+ब्रिटिश+फ्रेंच) एक ही ब्लॉक है।
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पेड मीडिया के प्रायोजको ने रफाल पर Thank you America & Thank you France की तख्ती न लटकाकर हमें सार्वजनिक शर्मिंदगी से बचा लिया है। और बदले में पेड मीडिया के प्रायोजक (अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिक) हमसे इसकी बड़ी कीमत वसूल रहे है।
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रफाल के साथ 3 समस्याएं है :
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रफाल End Use Monitoring Agreement (EUMA) के साथ आया है : मतलब अमेरिकी-फ्रेंच हथियार निर्माता हमें किसी समय किसी देश पर इसके इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देते है तो हम इसका इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। उदाहरण के लिए जब एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने F-16 का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया था तो अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि वे F-16 का इस्तेमाल भारत पर न करें।
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बस इसी तरह अमेरिकी-फ्रेंच किसी भी समय हमें रफाल का इस्तेमाल न करने के लिए कह सकते है। और फिर हम इनका इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे। जब आपको हथियार चलाना हो तो निर्यातक से इसकी अनुमति लेनी होती है। संक्षेप में इसी को EUMA कहते है।
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रफाल में kill Switch (KS) है : यदि कोई आयातक देश EUMA का उलंघन करता है तो निर्माता देश KS का इस्तेमाल करके हथियार को बंद कर देते है। और फिर रफाल काम नहीं करेगा !!
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स्पेयर पार्ट्स पर निर्भरता : अगले चरण में वे रफाल के स्पेयर पार्ट्स भेजना बंद कर देंगे, और रफाल पार्किंग स्टेंड में खड़ा रहेगा और कभी उड़ान नहीं भर सकेगा !!
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तो क्या होगा यदि भारत अमेरिकियों की बात नहीं मानता है, जैसे यदि पीएम सरकारी बैंको, रेल, सार्वजानिक उपक्रम आदि अमेरिकियों-फ्रेंच को बेचने से मना कर देता है, या अमेरिकियों को भारत में यूनिवर्सिटीज खोलने से रोक देता है, और अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार निर्माता पाकिस्तान को 200 रफाल और 500 F-16 दे देते है, और साथ ही अमेरिकी-फ्रेंच हमें स्पेयर पार्ट्स भेजना बंद कर देते है ?
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जवाब आपको पता है। क्योंकि यदि अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार निर्माता हमें फाइटर प्लेन्स / स्पेयर देने से इनकार कर देते है, या विलम्ब से देते है तो हम बुरी तरह फंस जायेंगे।
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किसी देश की सेना को नियंत्रित करने का यह सबसे अच्छा तरीका है – उनकी सेना में अपने फाइटर प्लेन्स, रडार, हैलिकोप्टर आदि इंस्टाल करो। और फिर आप अमुक देश को अपनी उँगलियों पर नचा सकते हो !! दुसरे शब्दों में, रफाल आने के बाद हमारी निर्भरता अमेरिकी-फ्रेंच हथियार निर्माताओं पर और भी बढ़ गयी है !! और इसीलिए हम अपनी राष्ट्रिय संपत्तियां और भी तेजी से खोने वाले है।
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तो रफाल एक उन्नत विमान है, लेकिन यह भारत के लिए कितना उपयोगी बना रहेगा, इसका फैसला अमेरिकी-फ्रेंच तय करेंगे, हम नहीं !!
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(3) समाधान :
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जैसा कि आप पिछले कुछ दिनों से अपने आस पास देख ही रहे है कि बीजेपी-कोंग्रेस-आपा के शीर्ष नेता एवं उनके समर्थक ऊपर दी गयी समस्या को समस्या की तरह नहीं देखते है। इसीलिए वे EUMA , Kill Switch और Spare Parts की समस्या पर जानबूझकर खामोश है।
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और वे इसे समस्या के रूप में इसीलिए नहीं देखते है, क्योंकि अभी तक पेड मीडिया ने उन्हें इसे समस्या के रूप में देखने के लिए नहीं कहा है !!
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और ठीक है, अभी हमारे पास प्लेन्स नहीं है, और चीन हम पर चढ़ा हुआ है, अत: हम चाहे या न चाहे हमें अमेरिका या रूस में से किसी देश से तो तत्काल में फाइटर प्लेन्स लेने ही पड़ेंगे। तो इस स्थिति में रफाल खरीदने को लेकर मेरा विरोध नहीं।
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लेकिन मेरा ऐतराज यह है कि, तब भी कोंग्रेस-बीजेपी-आम आदमी पार्टी के नेता एवं उनके समर्थक जानबुझकर उन आवश्यक कानूनों की चर्चा को क्यों टाल रहे है, जिन्हें लागू करके हम स्वदेशी हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर सके !! उलटे वे नागरिको में यह भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे है, कि रफाल के आने से भारत की सेना मजबूत हो गयी है।
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और यह भ्रम फैलाने के लिए वे – सिर्फ इस बिंदु को बार बार रेखांकित करते है कि रफाल आने के कारण चीन का मुकाबला करने की हमारी क्षमता बढ़ गयी है, किन्तु वे इस बात को जानबूझकर छिपा रहे है कि, इसी के साथ हम अमेरिकी-फ्रेंच हथियार निर्माताओ पर और भी निर्भर हो गए है।
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बहरहाल, यदि आप इसे समस्या के रूप में देखते है तो मेरे विचार में इसका समाधान प्रस्तावित वोइक (WOIC) क़ानून द्वारा किया जा सकता है। यदि वोइक एवं जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छाप दिया जाता है तो मेरा मानना है कि, भारत Made in India & Made by Indians की नीति पर चलते हुए अगले कुछ ही वर्षो में स्वदेशी तकनीक आधारित लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता जुटा लेगा।
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EUMA , Kill Switch और Spare Parts की समस्या के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है, कृपया इसे पढ़ें -
https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/860309497675462/
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#WOIC , #JuryCourt
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राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड के प्रस्तावित क़ानून की कुंजी
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(1) यह क़ानून सरकार द्वारा हथियाये जा चुके सभी देवालयों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है।
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(2) यह कानून सभी हिन्दूओ के लिए एक राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (R.H.B.) नामक ट्रस्ट का गठन करेगा, जिसका प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान कहलायेगा। हिन्दू संघ प्रधान वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा, और यदि आप उसके काम-काज से संतुष्ट नहीं है, तो वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर उसे निकालने और किसी अन्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकते है। आप अपनी स्वीकृति SMS, ATM या मोबाईल एप से भी दे सकेंगे।
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(3) भारत के निम्नलिखित नागरिक हिन्दू बोर्ड के सदस्य हो सकेंगे :
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उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है।
सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो के अनुयायी भी यदि इस बोर्ड में जुड़ना चाहते है तो इसकी सदस्यता ले सकेंगे।
यह क़ानून इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, पर कोई दायित्व या प्रतिबन्ध नहीं लगाता। इन धर्मो के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे
[ टिप्पणी : यह क़ानून किसी भी प्रकार से उन नागरिको पर हिन्दू होने का लेबल नही लगाता जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नहीं कहलाना चाहते। उदाहरण के लिए यदि कोई जैन या सिक्ख पंथ का अनुयायी इसमें नामांकित होता है तो भी उसकी कानूनी-धार्मिक-सामाजिक पहचान प्रवृत कानूनों के अनुसार जैन / सिक्ख धर्म के अनुयायी के रूप में बनी रहेगी ]
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(4) प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का भी प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है।
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(5) यदि एवं जब भारत के सभी मतदाताओ में से 45 करोड़ मतदाता इसी कानून में दी गयी जनमत संग्रह प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निचे दिए 3 मंदिरो के भूखंड बोर्ड को सौंप देते है तो हिन्दू बोर्ड इन मंदिरों की देख रेख करेगा :
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कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा
काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी
अमरनाथ देवालय, कश्मीर
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(6) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय सनातन संप्रदाय रजिस्ट्रार नामक अधिकारी की नियुक्ति करेंगे, जो उन सम्प्रदायों को लोकतांत्रिक रूप से प्रबंधित करने में व्यवस्थागत सहयोग करेगा जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन संस्कृति है, तथा वे एक पंथ या सम्प्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त धार्मिक ट्रस्ट है। ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों में जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी भारतीय संप्रदाय शामिल है। रजिस्ट्रार का ट्रस्ट की धार्मिक मान्यताओ में कोई दखल नहीं होगा। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से SGPC द्वारा शासित है, अत: सिक्ख पंथ रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेगा।
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(7) यदि संघ प्रधान, राष्ट्रिय सनातन रजिस्ट्रार, उनके स्टाफ एवं नागरिको के मध्य कोई आपसी विवाद होता है, या किसी मंदिर धारण करने वाले ट्रस्ट आदि के बीच स्वामित्व का कोई मामला आता है तो मामले का निपटान हिन्दू बोर्ड की सदस्य सूची में दर्ज नागरिको की जूरी करेगी। यदि आपका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में है तो आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी में आकर आपको मामला सुनकर फैसला देना होगा। जूरी का गठन बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। मामले की प्रकृति अनुसार जूरी में 12 से 1500 तक नागरिक हो सकेंगे।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो Pm को एक पोस्टकार्ड / ट्विट भेजे – प्रधानमंत्री जी, कृपया हिन्दू बोर्ड गेजेट में छापे , #HinduBoard
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हिन्दु बोर्ड का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक में देखें -- https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2241776019273955
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