Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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ऋगुवेद सूक्ति-- (३९) की व्याख्या
"निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु"
ऋगुवेद--५/२/६
भावार्थ--निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
“निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु”
पद–व्याख्या
निन्दितारः — निन्दा करने वाले, दोष खोजने वाले लोग
निन्द्यासः — स्वयं निन्दा के योग्य, तिरस्कार के पात्र
भवन्तु — हो जाते हैं / बन जाते हैं।
भावार्थ--
जो लोग दूसरों की निन्दा करते रहते हैं, वे अंततः स्वयं ही निन्दा के पात्र बन जाते हैं। अर्थात् निन्दा करने वाला व्यक्ति समाज में सम्मान नहीं पाता; उसका स्वभाव ही उसे अपमानित कर देता है।
विस्तृत व्याख्या--
इस वैदिक वाक्य का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को दूसरों के दोष ढूँढ़ने और उनकी निन्दा करने की आदत से बचना चाहिए।
निन्दा करने से व्यक्ति का स्वभाव, चरित्र और विवेक कमजोर हो जाता है।
जो व्यक्ति सदैव दूसरों की बुराई करता है, लोग धीरे-धीरे उसी से दूर होने लगते हैं।
परिणामतः वही व्यक्ति समाज में निन्दित और तिरस्कृत हो जाता है।
इसलिए वेद का संदेश है कि मनुष्य को सद्गुण, प्रशंसा और हितकारी वचन बोलने चाहिए, न कि निन्दा।
निष्कर्ष--
निन्दा करने वाला व्यक्ति अंत में स्वयं निन्दा का पात्र बनता है; इसलिए श्रेष्ठ जीवन के लिए निन्दा से बचकर सद्वचन और सद्भाव अपनाना चाहिए।
वेदों में प्रमाण--
१-(क) ऋग्वेद १०.७१.२
“सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत।”
भावार्थ: विद्वान लोग वाणी को छानकर शुद्ध करते हैं, अर्थात् सोच-समझकर उत्तम वचन बोलते हैं।
१(ख) ऋग्वेद १.८९.८
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।”
भावार्थ: हम अपने कानों से शुभ और कल्याणकारी वचन ही सुनें।
२-(क) यजुर्वेद २१.६१
“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे।”
भावार्थ: हम सभी प्राणियों को मित्रभाव से देखें (अर्थात् निन्दा-द्वेष से दूर रहें)।
(ख) यजुर्वेद ३६.१८
“मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।”
भावार्थ: मैं सभी प्राणियों को मित्रभाव से देखता हूँ।

३-(क)-अथर्ववेद १९.९.१४
“शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।”
भावार्थ: हमारे लिए कल्याण और मंगल की भावना बनी रहे।
(ख)-अथर्ववेद ३.३०.५
“समानी व आकूति: समाना हृदयानि वः।”
भावार्थ: आप सबकी भावना और हृदय एक समान हों (अर्थात् परस्पर विरोध और निन्दा न हो)।
सार:
वेदों का मूल संदेश है कि मनुष्य को दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए, बल्कि मित्रभाव, सद्वचन और शुभ विचार अपनाने चाहिए। निन्दक अंततः स्वयं निन्दित हो जाता है।।
उपनिषदों में प्रमाण--
१. तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.१
“सत्यं वद। धर्मं चर।”
भावार्थ: सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो।
अर्थात् मनुष्य को असत्य, निन्दा और दोषारोपण से बचना चाहिए।
२.ईशोपनिषद् --६
“यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
भावार्थ: जो सभी प्राणियों में अपने ही आत्मभाव को देखता है, वह किसी से घृणा या निन्दा नहीं करता।
३-छान्दोग्योपनिषद् ३.१४.१
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है; इसलिए किसी प्राणी का तिरस्कार या निन्दा करना उचित नहीं है।
(४)बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.१४
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।”
भावार्थ: आत्मा को जानना, सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए; जब आत्मज्ञान होता है तब मनुष्य दूसरों की निन्दा और द्वेष से दूर रहता है।
(५). कठोपनिषद् १.२.२४
“नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥”
भावार्थ: जो व्यक्ति दुश्चरित्र (दोषपूर्ण आचरण) से नहीं रुकता, जिसका मन शान्त नहीं है, वह आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता।
अर्थात् दोष-दर्शन, निन्दा और अशुभ आचरण से दूर रहना आवश्यक है।
६-मुण्डकोपनिषद् ३.१.५
“सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा।”
भावार्थ: यह आत्मा सत्य और तप से प्राप्त होती है।
अर्थात् सत्य वचन और शुद्ध आचरण आवश्यक हैं, न कि निन्दा और असत्य।
७. प्रश्नोपनिषद् --१.१५
“तेषामेवैष ब्रह्मलोकः।”
भावार्थ: जो लोग सत्य, संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वही उच्च अवस्था को प्राप्त होते हैं; दोष-दर्शन और निन्दा करने वाले नहीं।
८. श्वेताश्वतरोपनिषद्- ६.२३
“यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।”
भावार्थ: जिस व्यक्ति को ईश्वर और गुरु में परम श्रद्धा होती है, उसी को ज्ञान प्राप्त होता है।
अर्थात् श्रद्धा और सम्मान आवश्यक हैं, न कि निन्दा।
सार--
उपनिषदों का भी यही सिद्धान्त है कि—मनुष्य को दोष-दर्शन और निन्दा से बचना चाहिए, सत्य, संयम और शुभ वाणी का पालन करना चाहिए, तभी आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
पुराणों में भी निन्दा करने वाले व्यक्ति की निन्दनीयता तथा परनिन्दा से बचने का उपदेश अनेक स्थानों पर मिलता है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
पुराणों में प्रमाण--
१. भागवतपुराण १०.७४.४०
“परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च॥”
भावार्थ: जो व्यक्ति समस्त जगत में एक ही आत्मा को देखता है, वह किसी के स्वभाव और कर्म की न तो निन्दा करता है और न ही व्यर्थ प्रशंसा करता है।
२-पद्मपुराण, उत्तरखण्ड ७१.३७
“परनिन्दां न कुर्वीत परदोषान्न दर्शयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को न तो दूसरों की निन्दा करनी चाहिए और न ही उनके दोषों को फैलाना चाहिए।
३-गरुड़पुराण १.११४.९
“परनिन्दारतः पापी सर्वधर्मबहिष्कृतः।”
भावार्थ: जो व्यक्ति परनिन्दा में लगा रहता है, वह पापी और धर्म से दूर माना जाता है।
४. स्कन्दपुराण २.४.५.२३
“परनिन्दा परद्रोहः परपीडाच वर्जयेत्।”
भावार्थ: परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को पीड़ा देने वाले आचरणों को त्याग देना चाहिए।
५. विष्णुपुराण- ३.१२.४५
“परनिन्दां परद्रोहं परपीडां च वर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाले आचरणों का त्याग करना चाहिए।
६.अग्निपुराण -३७१.१२
“परनिन्दा न कर्तव्या न च दोषान् प्रकाशयेत्।”
भावार्थ: किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए और दूसरों के दोषों को फैलाना भी उचित नहीं है।
७-ब्रह्मपुराण २३५.२१
“परनिन्दारतः नित्यं नरः पापफलं लभेत्।”
भावार्थ: जो व्यक्ति सदैव दूसरों की निन्दा करता रहता है, वह पाप का फल प्राप्त करता है।
८. नारदपुराण १.१५.६०
“परनिन्दां न कुर्वीत सर्वभूतेषु मानदः।”
भावार्थ: मनुष्य को सब प्राणियों का सम्मान करते हुए किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए।
सार--
अन्य पुराणों का भी यही सिद्धान्त है कि—
परनिन्दा अधर्म और पाप का कारण है।
मनुष्य को दूसरों के दोषों का प्रचार नहीं करना चाहिए।
श्रेष्ठ आचरण है कि सबके प्रति सम्मान।
गीता में भी निन्दा, द्वेष और दोष-दर्शन से बचने तथा समभाव रखने की शिक्षा दी गई है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
गीता में प्रमाण--
१. गीता १२.१३
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।”
भावार्थ: जो मनुष्य सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु होता है, वही श्रेष्ठ भक्त है।
अर्थात् वह किसी की निन्दा नहीं करता।
२. गीता १६.२
“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।”
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, शान्ति और अपैशुनम् (परनिन्दा न करना) दैवी गुण हैं।
३. गीता १३.७–८
“अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।”
भावार्थ: नम्रता, अहंकार का अभाव, अहिंसा, क्षमा और सरलता — ये ज्ञान के लक्षण हैं; इन गुणों वाले व्यक्ति में निन्दा का स्वभाव नहीं होता।
४. गीता १७.१५
“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।”
भावार्थ: ऐसा वचन बोलना चाहिए जो किसी को उद्वेग न दे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो।
अर्थात् कटु वचन और निन्दा से बचना चाहिए।
सार-:
गीता का सिद्धान्त है कि श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो —
किसी से द्वेष या निन्दा नहीं करता, मधुर और हितकारी वचन बोलता है,
और सबके प्रति मित्रभाव रखता है।
महाभारत में प्रमाण--
१. शान्ति पर्व- १६७.९
“परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों के स्वभाव और कर्मों की न तो निन्दा करनी चाहिए और न ही व्यर्थ प्रशंसा करनी चाहिए।
२. अनुशासन पर्व- १०४.१२
“परनिन्दां परद्रोहं परपीडां विवर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाले आचरणों का त्याग करना चाहिए।
३. उद्योग पर्व- ३४.७५
“न परदोषान् वदेत् प्राज्ञो न च निन्दां समाचरेत्।”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति न तो दूसरों के दोषों की चर्चा करता है और न ही उनकी निन्दा करता है।
४. शान्ति पर्व २६२.५
“वाचा सत्यं प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”
भावार्थ: मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए; ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से किसी को दुख दे।
सार:
महाभारत का स्पष्ट उपदेश है कि
परनिन्दा और दोष-दर्शन से बचना चाहिए।
सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना ही धर्म है।
जो व्यक्ति दूसरों की निन्दा करता है, वह स्वयं भी सम्मान खो देता है।
स्मृति ग्रन्थों में भी परनिन्दा (दूसरों की निन्दा) को दोष बताया गया है और उससे बचने की शिक्षा दी गई है। कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक-संख्या सहित इस प्रकार हैं
१-मनुस्मृति ४.१३८
“न परदोषान् वदेद् विद्वान् न परेषां च कर्मसु।”
भावार्थ: विद्वान व्यक्ति को दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करनी चाहिए।
२- मनुस्मृति ४.१६८
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥”
भावार्थ: मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए; ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से अप्रिय हो।
३-याज्ञवल्क्यस्मृति- १.१३२
“परनिन्दां न कुर्वीत सर्वभूतेषु मानदः।”
भावार्थ: सब प्राणियों का सम्मान करते हुए किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए।
४-पराशर स्मृति १.३९
“परनिन्दा परद्रोहः परपीडा च वर्जयेत्।”
भावार्थ: परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को पीड़ा देने वाले आचरणों को त्याग देना चाहिए।
५-अत्रि स्मृति २६३
“परनिन्दां परद्रोहं परपीडां च वर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाले आचरणों का त्याग करना चाहिए।
६-दक्ष स्मृति ७.३२
“निन्दां परस्य न कुर्यात् सर्वभूतेषु मानदः।”
भावार्थ: सब प्राणियों का सम्मान करते हुए किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए।
७-व्यास स्मृति २.५२
“परदोषान् न पश्येत् न परेषां च निन्दनम्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों के दोषों को खोजने और उनकी निन्दा करने से बचना चाहिए।
८--गौतम स्मृति ९.६०
“परनिन्दां न कुर्वीत धर्ममार्गे स्थितो नरः।”
भावार्थ: धर्ममार्ग पर चलने वाला मनुष्य परनिन्दा नहीं करता।
सार:
स्मृतियों का भी यही मत है कि—
परनिन्दा अधर्म और दोष है।
धर्माचरण करने वाले व्यक्ति को दूसरों के दोष नहीं खोजने चाहिए।
मनुष्य को सम्मान, मधुर वाणी और सद्भाव का आचरण करना चाहिए।
नीति (नौति) ग्रन्थों में भी परनिन्दा को दोष बताया गया है और मधुर तथा हितकारी वचन बोलने का उपदेश दिया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
नैतिक ग्रन्थों में प्रमाण--
१-चाणक्य नीति ३.१३
“परदोषेषु ये नित्यं पश्यन्ति पुरुषाधमाः।
आत्मनो न पश्यन्ति दोषान् एव महाजनाः॥”
भावार्थ: नीच व्यक्ति सदा दूसरों के दोष देखते हैं, जबकि सज्जन लोग अपने दोषों को देखते हैं।
२. विदुरनीति ३४.६४(महाभारत)
“न परदोषान् वदेत् प्राज्ञो न च निन्दां समाचरेत्।”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता और न ही निन्दा करता है।
३-भृतहरि नीतिशतक- ७१
“परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः।”
भावार्थ: सज्जन लोग दूसरों के छोटे-छोटे गुणों को भी पर्वत के समान बड़ा मानते हैं, दोषों की चर्चा नहीं करते।
४-शुक्रनीति २.३४
“परनिन्दां न कुर्वीत न च दोषान् प्रकाशयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए और उनके दोषों को भी प्रकट नहीं करना चाहिए।
५-सुभाषितरत्नभाण्डागार ७२८
“परदोषान् न पश्यन्ति साधवः परदूषणम्।”
भावार्थ: सज्जन लोग दूसरों के दोषों को देखने या उनकी निन्दा करने में रुचि नहीं रखते।
६. नीतिकल्पतरु -३.१८
“परनिन्दां न कुर्वीत न च दोषान् प्रकाशयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए और उनके दोषों का प्रचार भी नहीं करना चाहिए।
७. सदुक्तिकर्णामृत- २.९४
“साधवो निन्दितुं नैव परदोषान् प्रयत्नतः।”
भावार्थ: सज्जन पुरुष प्रयत्नपूर्वक भी दूसरों के दोषों की निन्दा नहीं करते।
८. हितोपदेश, मित्रलाभ- ७५
“न परदोषान् वदेत् प्राज्ञः।”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता।
नीति ग्रन्थों का भी यही सिद्धान्त है कि—
परनिन्दा सज्जनों का आचरण नहीं है।
बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के दोषों के बजाय गुणों को देखते हैं।
इसलिए मनुष्य को मधुर, हितकारी और सत्य वचन बोलने चाहिएं।
वाल्मीकि रामायण और गर्ग संहिता में प्रमाण--
१(क) वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड १०९.३४
“न परदोषान् वदति न चानृतकथां वदेत्।”
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता और न ही असत्य या निन्दात्मक वचन बोलता है।
१(ख) वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड ३८.१२
“परदोषेषु यो नित्यं दोषदर्शी नराधमः।”
भावार्थ: जो मनुष्य सदा दूसरों के दोष ही देखता है, वह अधम पुरुष माना जाता है।
२.(क) गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड ६.२७
“परनिन्दां न कुर्वीत वैष्णवानां विशेषतः।”
भावार्थ: मनुष्य को किसी की भी निन्दा नहीं करनी चाहिए, विशेष रूप से सज्जनों और भक्तों की।
२-(ख) गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड ९.१४
“परदोषान् न पश्येत् साधुः सर्वत्र समदर्शनः।”
भावार्थ: सज्जन व्यक्ति दूसरों के दोष नहीं देखता और सबमें समान भाव रखता है।
सार:--
रामायण और गर्ग संहिता का उपदेश है कि—
दूसरों के दोषों की चर्चा और निन्दा नहीं करनी चाहिए।
सज्जन व्यक्ति सबमें समान भाव रखता है और मधुर वचन बोलता है।
जो व्यक्ति दूसरों की निन्दा करता है, वह स्वयं ही निन्दित होता है।.
योग वशिष्ठ में प्रमाण-
१(क) योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण १५.१२
“परदोषान् न पश्यन्ति साधवः समदर्शिनः।”
भावार्थ: समदर्शी सज्जन पुरुष दूसरों के दोष नहीं देखते।
(ख). योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण ५.१८
“न परदोषकथां कुर्यात् साधुः शान्तमनाः सदा।”
भावार्थ: शान्त चित्त वाला सज्जन व्यक्ति दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता।
(ग). योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण २.४५
“परनिन्दा परद्रोहः परपीडा विवर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाला आचरण त्याग देना चाहिए।
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Hindi Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) : 112019157
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