राख ओढ़कर जो सच को जीता है,
वो हर झूठे रिश्ते से रीता है।
यहाँ ना सुंदर, ना कुरूप का भेद है,
हर चेहरा अंत में बस भस्म का खेद है।
जिसे दुनिया अपवित्र कहकर ठुकराती है,
अघोरी उसी में शिव को पाता है।
मांस, मरण, और मौन का संग है,
यहीं असली जीवन का प्रसंग है।
जहाँ डर खत्म, वहीं दरवाज़ा खुलता है,
जो भागे श्मशान से, वो जीवन भर जलता है।
अघोरी कहता—ना कुछ तेरा, ना मेरा अधिकार है,
जो है, बस इस क्षण का उधार है।
ना पाप यहाँ, ना पुण्य का हिसाब है,
हर कर्म बस एक अधूरा जवाब है।
जब टूटे हर धारणा, हर विचार है,
तभी दिखे—तू ही शिव, तू ही अंधकार है। 🔱
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