आईना दिखलाए मुखड़ा, अंतर न पहचाने,
मन की गहराई सदा, खुद ही मन जाने।
गंगा धोए तन भले, मन न धुल पाए,
भीतर की निर्मलता ही जीवन सफल बनाए।
भगवान को चाहिए नहीं, स्वर्ण-रतन-भंडार,
श्रद्धा की सच्ची ज्योति ही है उनका श्रृंगार।
प्रेम न देखे रूप-धन, न जग का व्यवहार,
निर्मल हृदय जहाँ मिले, वहीं सच्चा प्यार।