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Desai Pragati

Desai Pragati

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dp writes🤍📚🌻

betiya❤️

में नहीं बनना चाहती क़भी संतूर वाली मोम ,
मेरे लिए माँ की वही परिभाषा हे जिसमें उम्र ka लिहास और अहसास रखा जाये .!

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तुम्हारा मेसेज आना और,
.
नोटिफिकेशन का बजना ॐ नमः शिवाय,
क्या वो फीलिंग क्या वो वाइब आय हाय..!

~ शिवाला भक्त 🔱

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फिफ्र है उस दुल्हन बनी लड़की को की लोग लगा न दे उसकी उदासी का ताल्लुक ,
प्रेमी से दूर होने का विरह है या माँ - पापा से दुर होने की वजह से भावुक

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कि अब तेरी बाहो को उसके नाम कर दूँ ,
तु सिर्फ उसकी ही है ये सरेआम कर दूँ
.
कह कर सही तुम्हे खुदको बदनाम कर दू,
आज़ाद कर दू दिलसे जज्बात तमाम कर दू,
.
जो सजाए थे ख्वाब तुम संग मैने कि अब
वहा से मै खुद को गुमनाम कर दू
.
कि अब खुदको इश्क़ के पिंजरे मे
रखके वफा का गुलाम कर दू ,
.
हम तो थे रुह से चाहने वाले आशिक कि ,
अब किसी और के नाम तेरा जाम़ कर दूँ
.
और तो जयादा कुछ नही मै तुम्हे दिल - ए - खास
से इंसान - ए - आम कर दूँ
.
तेराआशिया बदल गया मे अपना इंतजाम कर दूँ
कि मंदिर से मदीरा तक का तुझे अंजाम कर दूँ

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की क़भी क़भी हिमत हारने का भी मन करता हे
बस युही मन को समजाके मारनेका मन करता हे
.
सारी जिद छोड़ के जी चाहता हे बस
जो भी हो रहा हो स्वीकारने का मन करता हे
.
चलो छोडो तुम जीत गए कहके बिना बहेसके
बात से मुकरने का मन करता हे
.
बिन पलक जपकाये खुली आँख में बीती
यादें निहारने का मन करता हे

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ભીતર સળગેલી વેદનાને,
એકાંત મા બેસી ઠારુ છું.

હેરાન કરતી અમુક ધારણાઓને,
મારાં હાથે જ મારું છું
.
પોતાની આશા અને સપનાઓને,
પોતેજ ડુબાડી પોતેજ તારું છું
.
વિષય ભાવનનો નહીં પરંતુ શુદ્ધતાનો
દરિયા જેમ પાણી આંખનું ખારું છું
.
જાણે ! પોતાની જાતને અંધારે શણગારું છું
હા હું એકાંત મા બેસી પોતાને ઠારું છું

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उसका आलिंगन फूल भी बन सकता है और ज्वार भी
अगर वो खुश रही तो करेगी उद्धार नहीं तो खुलेंगे विनाश के द्वार भी.
.
कभी कोमल फूल सी कभी चंचल नदियों की धार सी कभी लेती कालिका अवतार भी
समजती समजाती कभी मन मारती तो कभी करती वो फेशले आर पार भी,
.
लड़ती कभी मन के दंद्र से तो क़भी ऊँचे आवाज़ को मात देती करके पलटवार भी,
रहती वो हर रूप मे क़भी मासूम बच्चों सी, क़भी कठोर पहाड़ सी तो क़भी इंसान समझदार भी!

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