कभी रिश्ते सिर्फ़ नाम के होते हैं,
लेकिन कुछ लोग… नाम के पीछे छिपी एक पूरी दुनिया को भी पहचान लेते हैं।
रागिनी अब सिर्फ आरव की बीवी नहीं थी —
वो अब खुद की पहचान की लड़ाई में उतर चुकी थी।"
रागिनी अपने पुराने दोस्तों से मिलती है
दोस्त:
रागिनी! तू तो एकदम बदल गई है।
रागिनी (मुस्कुराकर):
हाँ… अब मैं सिर्फ किसी की पत्नी नहीं,
खुद की कहानी भी हूँ।
दोस्त:
अब क्या करने का सोच रही है?
रागिनी:
एक NGO शुरू करूँगी — उन औरतों के लिए,
जिन्होंने अपनी आवाज खो दी है, जैसे मैंने खोई थी।
बॉस:
तुम्हारी वाइफ का NGO मीडिया में काफी वायरल हो रहा है।
आरव (हैरान):
क्या? उसने मुझे बताया भी नहीं…
(खुद से बड़बड़ाता है):
रागिनी… तुम मुझसे इतनी दूर कब हो गई?
आरव:
तुमने इतना बड़ा कदम अकेले क्यों उठाया?
रागिनी (शांत लेकिन दृढ़):
क्योंकि जब मैंने तुम्हारे साथ चलना चाहा,
तुमने मुझे पीछे छोड़ दिया था।
आरव:
मैं… शायद तुम्हें समझ नहीं पाया।
रागिनी:
अब समझना नहीं, साथ चलना सीखो।
"जब औरत अपने डर से बाहर निकलती है,
तब वो सिर्फ एक साथी नहीं रहती —
वो खुद की दुनिया बन जाती है।"