सर्दियों में दो फांक हो जाती हैं…
एक ओर
कश्मीर फिरन की नरमी है,
पश्मीना ओढ़े
कॉफी के प्याले में
भाप उठती है,
हीटर की गर्म साँसों के बीच
हम शहर की हवा पर
बहस करते हैं।
दूसरी ओर
फुटपाथ है—
जहाँ शहर अपनी नज़रें
जानबूझकर गिरा देता है।
वहाँ ठंड मौसम नहीं,
सज़ा बनकर उतरती है।
वे महंगे कपड़े
शौक से नहीं पहनते,
कभी मिल जाएँ तो—
सिर्फ इसलिए
कि बदन में
थोड़ी-सी जान बची रहे।
उनके लिए सर्दी में
सूप कोई स्वाद नहीं,
एक सपना है।
भरपेट खाना—
किसी त्योहार से कम नहीं।
सर्दियों में
सब काँपते हैं…
पर फर्क बस इतना है—
कुछ ठंड से,
और कुछ
भूख से।
आर्यमौलिक