आख़िरी ग़ुलाब
- कौशिक दवे
चारों तरफ युद्ध के कारण विनाश फैला हुआ था। अधिकांश मकान जमींदोज हो चुके थे। चिराग गहरी निराशा में डूबा था। उसके कई अपने ईश्वर के धाम जा चुके थे।
उस समय उसे लगा કે काश मैं भी मर गया होता तो अच्छा होता। अब मेरा जीना व्यर्थ है। लेकिन मरूँ कहाँ? नदी, तालाब या सागर?
सागर दूर है। नदी और तालाब में पानी नहीं है। ओह! इस विनाशकारी युद्ध ने मानव जाति का ही अंत कर दिया। वह चलते-चलते एक बगीचे के पास आया, लेकिन वह भी उजड़ा हुआ था।
चिराग अपना सिर पकड़कर बैठ गया। अब क्या करना चाहिए?
तभी उसे एक मधुर आवाज़ सुनाई दी।
"ओह.. तो कोई है जो..."
चिराग ने नज़र उठाई तो देखा कि एक सांवली युवती हाथ में एक गुलाब लिए आ रही थी। वह चिराग के पास आई। वह दिखने में बिल्कुल साधारण थी और उसने पुराने वस्त्र पहने हुए थे।
वह बोली, "ओह.. तो तुम भी मेरी तरह जीवित हो? इस शहर में सिर्फ हम दो ही बचे हैं!"
चिराग बोला, "लगता तो ऐसा ही है। पर तुम्हारा नाम क्या है?"
युवती बोली, "आज तक मुझे देखकर लोग मुँह फेर कर चले जाते थे। पर तुमने पहली बार मेरा नाम पूछा है।"
इतना बोलकर युवती ने गुलाब का फूल चिराग को दे दिया। "यह आखिरी फूल था। मेरा नाम रोशनी है, और तुम्हारा नाम?"
चिराग ने वह गुलाब हाथ में लिया जिसकी कुछ पंखुड़ियाँ बिखरी हुई थीं। वह बोला, "चिराग..."
रोशनी बोली, "ओह.. चिराग और रोशनी, बस हम दो ही जीवित हैं!"
इतने में एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई। रोशनी की नज़र पड़ी तो एक तीन-चार साल का बच्चा रोते-रोते 'मम्मी-मम्मी' पुकार रहा था। रोशनी भावुक हो गई। उसने तुरंत उस बच्चे को गोद में उठा लिया और उसे शांत कराया।
चिराग ने अपने हाथ का वह गुलाब का फूल उस बच्चे के हाथ में दे दिया। बच्चा खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला:
"पापा... मम्मी..."
लेखक: कौशिक दवे