नाहं वसामी वैकुंठे
योगिनांहृदये न च।
मद्भत्ता यत्र गायंति
यत्र तिष्ठामि नारद॥
के नारद! मैं न तो वैकुंठ में रहता हूँ।
और न योगियों के हृदय में ही रहता हूँ ।
में तो वहीं रहता हूँ, जहॉ प्रेमाकुल होकर
मेरे भक्त मेरे नाम का कीर्तन किया करते हैं ।
सुप्रभातम् एवं जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
🙏
- Umakant