मुकदमे भी फिर लाख चले
जो 'जिन्दगी' तेरे सफ़र मे, हम बन कर साफ़ चलें
जाने-अनजाने जु्बाँ फिसली भी मगर
हमें ताउम्र वहम् रहा, के हम बन कर पाक चलें
लोगों ने 'रोका-टोका-कचौटा' भी बहुत
मगर नादानी थी, हम तो बेबाक चलें
ओर अब 'गिले-शिकवे-शिकायतें' सब घेरे बैठे हैं
मगर किस से क्या कहें ? जितना चलें 'अपने-आप' चलें
यूँ जिन्दगी तेरे हर 'किस्से' में हम तेरे 'साथ' जले
जो 'जिन्दगी' तेरे सफ़र मे, हम बन कर साफ़ चलें |