ज़िंदगी को किताब समझा है,
हर पन्ने को पढ़ के बैठे हैं।
कुछ पन्ने फटे हुए हैं,
फटे पन्नों को भी जोड़ के बैठे हैं।
खुशी कभी आई, कभी गई,
ग़म को ही स्थाई बना के बैठे हैं।
लोग मिले, मतलब से मिले,
हम तो बेमतलब ही निभा के बैठे हैं।
*सुनो, मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ,*
दिल में आज भी वही मासूमियत है,
मासूमियत को ही बचा के बैठे हैं।
दुनिया चालाक है, हम सादे हैं,
सादगी को ही सजा के बैठे हैं।
ज़िंदगी से अब कोई डर नहीं,
ज़िंदगी को ही दाँव पे लगा के बैठे हैं।
- Dharmendra Kumar