मिट्टी का यह खिलौना आया, बचपन का रूप निराला था,
भूल गया सब याद पुरानी, माया का वो जाला था।
आई जवानी भरम बढ़ा जो, खुद को ही भगवान चुना,
कर्मों के ताने-बाने से, फिर इच्छाओं का जाल बुना।
ढला बुढ़ापा सत्य समझ आया, झूठा था संसार यहाँ,
अन्त समय में याद आ रहा, जाना है अब वापस कहाँ।
मुक्ति की इस पावन राह पर, आत्मा अब तो मौन हुई,
सफ़र ख़त्म हुआ इस काया का, अब हरि चरणों में लीन हुई।