शब-ए-हिज्र की तन्हाई में तारे गिने हैं,
तेरी याद के साये में हम ज़ी रहे हैं।
कोई चारा नहीं अब इस दिल को मनाने का,
तेरी दूरी के सहरा में हम जल रहे हैं।
तड़पता है ये दिल तेरी एक झलक के वास्ते,
मगर बेबसी ने रोक रखे हैं सारे रास्ते।
रंज-ओ-गम की ये बारिश थमने का नाम नहीं लेती,
जैसे मंजिलों से बिछड़ गए हों तमाम रास्ते।