मैं लिखूँगी,
लिखती रहूँगी मैं,
अनंतकाल तक
जब तक धरती पर प्राण है
तब तक लिखती रहूंगी मैं
लिखूँगी पंछियों के कलरव,
भोर की पहली किरण,
चाँद की अद्भुत चमक,
हवाओं की मीठी महक,
प्रेम के निश्छल सौंदर्य के बारे में।
लिखूँगी नदियों के बहने,
फूलों के खिलने,
प्रकृति के अनुपम वैभव
और उसके निर्मल हृदय के बारे में।
लिखूँगी उस ख़ामोशी के बारे में
जो पहाड़ों के सीने में पलती है,
उस रोशनी के बारे में
जो अँधेरों के बाद निकलती है।
लिखूँगी उस धरती के बारे में
जो बिना कुछ माँगे देती रही
पर जब कभी प्रकृति कुपित होगी,
जब हरियाली की जगह
मनुष्य के कर्मों का दोष होगा
जब नदियाँ अपना रास्ता भूलेंगी,
जब जंगलों की साँसें थमने लगेंगी,
जब पंछियों के गीतों की जगह
मशीनों का शोर होगा
तब लिखूंगी मैं
लिखूँगी मनुष्य के स्वार्थ,
उसके पाखण्ड, आडंबर,
छल-कपट और अहंकार के बारे में;
उस संसार के बारे में
जिसे उसने अपने ही हाथों उजाड़ दिया।
जिसने मुट्ठी भर मिट्टी को
अपनी जागीर समझ लिया,
और भूल गया
जिस धरती पर वह अधिकार जताता है,
एक दिन उसी में
उसे विलीन हो जाना है।
यदि मनुष्य अपनी ही बनाई
इस दुनिया में स्वयं को खोता रहा
तो आखिर में लिखूँगी मैं।
मनुष्य के अंत के बारे में
ArUu ✍️