धागे की इन रेशमी लटों में,
बंधी नहीं है बस इक भाई की कलाई
इस कच्चे धागे की ओट में,
नारी के मान की है एक लंबी कहानी समाई।
साल में बस इक बार याद आता है धागा,
बाकी दिनों में फिर वही बंदिशों का पहरा,
रेशम की डोर से ही क्या तय होता है मान,
जब हर डगर पर उस पर रहता है सवालों का घेरा?
गरिमा किसी राखी या त्योहार की मोहताज नहीं,
नारी का वजूद सिर्फ इक दिन का विश्वास नहीं।
वह अबला नहीं, इस समाज की बुनियाद है
सम्मान चाहिए तो हर रोज उसे हक दो,
उसके सपनों को खुला आसमान और वक्त दो।
सिर्फ इक दिन कलाई पर राखी सजाने से क्या फायदा,
रक्षा का अर्थ बस कलाई पर धागा बाँधना नहीं,
हर रूप में उसके स्वाभिमान को पहचानना है।
स्त्री का आदर ही उसकी असली पूजा है,
इस सच को अब हर दिल में उतारना है।
बंधन के इस पर्व से परे भी है उसका संसार,
जहाँ हर साँस में गूँजता है उसका अपना अधिकार।
चलो इस राखी पर यह संकल्प हम पक्का कर लें,
सुरक्षित हो हर बेटी, ऐसा समाज मुकम्मल कर लें।