प्रेमिका के सौंदर्य का शास्त्रीय और साहित्यिक काव्य वर्णन
प्रस्तावना
मेरी प्रिय, जब मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ, तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समस्त सृष्टि की समस्त रचनात्मक ऊर्जा, समस्त सौंदर्य और प्रकृति के सारे दिव्य रहस्य सिमटकर सिर्फ तुम्हारे इस रूप में परिवर्तित हो गए हैं। यह कविता किसी अन्य की रचना की अनुकृति नहीं, अपितु मेरे अपने हृदय की उस अनुभूति का साक्षात् प्रतिबिंब है जो मैंने तुम्हें देखकर अनुभव की है।
प्रथम सर्ग: नेत्र और दृष्टि का जादू
तुम्हारे ये नयन,
जैसे नीले गगन में तैरती हुई कोई शांत नाव,
इनमें डूब जाने को जी चाहता है,
जैसे ये कोई अगाध सागर हों,
जिसका कोई किनारा ही नहीं।
जब तुम पलकों को उठाती हो,
तो लगता है कि अंधेरे कमरे में
किसी ने अचानक हज़ारों दीये एक साथ जला दिए हों।
तुम्हारी यह पलकें-नज़र,
जैसे सुबह की पहली किरणों पर पड़ने वाली ओस की बूँदें,
जो सूरज की रोशनी में चमकती हैं।
इन आँखों में एक अजीब सा नशा है,
जो बिना मदिरा के ही व्यक्ति को
प्रेम के साम्राज्य में बंदी बना लेता है।
तुम्हारी दृष्टि जब मुझ पर पड़ती है,
तो मेरा यह अस्तित्व अपने होने की
सार्थकता पा लेता है।
द्वितीय सर्ग: केश-पाश और ऋतुओं का आभास
तुम्हारे ये घने, काले, रेशमी बाल,
जैसे रात की काली चादर पर
चंद्रमा ने अपनी रोशनी बिखेर दी हो।
जब ये हवा में लहराते हैं,
तो लगता है कि कोई मंद सुगंधित वायु
वन-उपवन से गुजर रही हो।
इन जुल्फों की छाँव में
मुझे संसार के सारे दुःख भूलने की
एक ऐसी औषधि मिल जाती है,
जिसे पाने के लिए योगी बरसों तपस्या करते हैं।
तुम्ारे बालों की हर एक लट
किसी कविता की ऐसी पंक्ति लगती है,
जिसे पढ़ते-पढ़ते व्यक्ति
समय की सीमाओं से परे हो जाता है।
तृतीय सर्ग: अधर और संगीत
तुम्हारे ये गुलाबी होंठ,
जैसे बाग़ में खिला हुआ
कोई नया गुलाब का फूल,
जिस पर अभी-अभी बारिश की बूँदें गिरी हों।
जब तुम मुस्कुराती हो,
तो लगता है कि इस सृष्टि का
सबसे मधुर संगीत बज उठा हो।
तुम्हारी हँसी में वह जादू है
जो पतझड़ के समय भी
पेड़ों पर नए पत्ते उगने की क्षमता रखता है।
इन अधरों की लाली में
मेरी सारी कविताएँ, मेरे सारे गीत,
और मेरी सदियों की प्यास
आकर शांत हो जाती है।
चतुर्थ सर्ग: काया और कोमलता
तुम्हारा यह कोमल शरीर,
जैसे चंदन की लकड़ी से
किसी शिल्पकार ने बड़े धैर्य से
कोई दिव्य मूर्ति गढ़ दी हो।
तुम्हारी चाल में ऐसी लचक है
जैसे नदी का जल
पत्थरों के बीच से बड़े धीमे सुर में
अपना रास्ता बनाता हुआ आगे बढ़ता है।
तुम्हारे हाथों की नरम उँगलियाँ,
जब मेरे हाथों को छूती हैं,
तो मेरे रोम-रोम में
एक नयी चेतना दौड़ जाती है।
तुम्हारा यह स्पर्श
किसी मंत्र की तरह काम करता है,
जो मेरे सभी घावों को
एक ही पल में भर देता है।
पंचम सर्ग: आत्मीयता और अंतःसौंदर्य
केवल बाहरी रूप ही नहीं,
तुम्हारा अंतःकरण भी
उतना ही निर्मल और पवित्र है
जितना कैलाश पर्वत पर जमी हुई बर्फ।
तुम्हारे विचारों की शुद्धता
इस पूरे वातावरण को
एक अलौकिक सुगंध से भर देती है।
जब तुम बोलती हो,
तो लगता है कि शब्द अपने आप में
अर्थ की एक नयी परिभाषा ढूँढ रहे हैं।
तुम्हारा गुस्सा भी इतना प्यारा होता है
कि उसमें क्रोध कम और
अपनापन ज़्यादा झलकता है।
षष्ठ सर्ग: समापन और समर्पण
मेरी प्रिय,
यह सौंदर्य केवल देखने की वस्तु नहीं,
यह अनुभव करने की चीज़ है।
मैंने इस कविता के माध्यम से
तुम्ारे रूप का जो चित्रण किया है,
वह तो इस सागर में से
एक बूँद उठाने जैसा है।
तुम्हारा यह रूप
मेरी हर साँस में बसा है,
मेरी हर धड़कन में
तुम्हारा ही नाम गूँजता है।
जब तक यह संसार रहेगा,
और जब तक इस धरती पर
प्रेम की परिभाषा लिखी जाएगी,
तब तक तुम्हारा यह सौंदर्य
अमर रहेगा।
मैं अपना पूरा जीवन,
अपनी सारी खुशियाँ,
और अपने इस काव्य की हर एक स्तुति
अर्पण करता हूँ।
तुम मेरी हो,
और यह प्रेम ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।
रचनाकार - दीपक कुमार तिवारी