Hindi Quote in Poem by sachit karmi

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आँखों से आँसू
अब नहीं बहते—
शायद आँसू भी
थककर मर जाते हैं
लगातार रोते-रोते।

वक़्त की रेत
आँखों में इतनी भर गई है
कि अब कोई सपना
अंकुरित नहीं होता।

कभी इन आँखों में
किसी के लौट आने की
एक छोटी-सी उम्मीद थी,
अब वहाँ
उम्मीद की कब्र है।

सदियों से कोई
घर लौटा ही नहीं।

दरवाज़ा अब भी खुलता है
हर आहट पर,
लेकिन भीतर से
एक आवाज़ आती है—
“किसका इंतज़ार है?”

मैं चुप रहता हूँ।

क्योंकि सच यह है
कि जिसे लौटना था
वह शायद कभी गया ही नहीं था,
और जिसे मैं अपना समझता रहा,
वह मेरे भीतर
बहुत पहले मर चुका था।

अब घर में
सिर्फ़ दीवारें बची हैं,
दीवारों पर टँगी स्मृतियाँ,
और स्मृतियों के पीछे
एक आदमी—

जो रोज़
अपने ही भीतर से
थोड़ा-थोड़ा गायब हो रहा है।

शायद यही उम्र है—
जब आदमी मरता नहीं,
बस उसके भीतर
लौटने की इच्छा
मर जाती है।

Hindi Poem by sachit karmi : 112034316
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