जब खुला दरवाज़ा तो पाँव ठहर गए,
रिहाई के ख़याल से ही हम तो डर गए।
तरसते थे जो कभी बेफ़िक्र उड़ानों के लिए,
आज वो परिंदे इस ख़ामोश ज़मीं पर मर
गए।
इन सलाखों की छाँव में ही सुकून मिलने लगा,
हम तो इस क़ैद के साए में ही सँवर गए।
जिस आज़ादी के ख़्वाब में बिताई थी उम्र,
अब उसी आज़ादी के नाम से ही बिखर
गए।
- Ritu jaiswal