अम्मा-पत्नी
जब अम्मा कहीं जाती,
पत्नी प्रसन्न हो जाती,
कभी पत्नी पीहर जाती,
अम्मा खुश नज़र आती।
दोनों दो ध्रुवों पर खड़ी दिखतीं,
दोनों ही खूब कट-कट करतीं,
एक पुरोधा है अपने समय की,
एक उसी दौर से गुजरने वाली।
तब भी बड़ा अंतर मन के पाट में,
कैसे-कैसे द्वंद्व खिंचे अनुपस्थिति में।
जन्म और प्रेम तले दबे अपनेपन पर,
अधिकार जतलातीं, अपने पाले में समेटतीं।
अम्मा तो अम्मा जिसने पौधा रोपा है,
पत्नी भी कम नहीं जिससे यह पौधा जुड़ा है।
हर रोज़ फाटक पर उतरता एक चेहरा,
कोई न कोई कन्नी किसी से काटता फिरता।
सुलह कठिन जब बरसे दोनों मुझ पर,
दो धाराएँ विद्युत की गिरें साथ मुझ पर।
जो घाव भर नहीं सकते मरहम से,
अम्मा दे जाती बंद सांसें मौन रहके।
पुरोधा निभा गई अपना वादा हमसे,
कभी ग़म तले, खुशियों में मुस्कुराते हमसे।
विदा यूँ ली, देर रात जोड़ रहे थे टूटे बदन को,
अँधेरे में वो सुन्न रही, ख़्वाब बन गुज़र गई सवेरे।
पत्नी अब उसी धुरी की पुरोधा है हममें,
हर बात में दिखती हल्की झलक अम्मा की उसमें।