कविता वो स्त्री है
लेखिका डॉ वंदना शर्मा
वह निष्प्राण सी है अपनी मर्यादाओं के कारण
लेकिन मरती नहीं है
क्यूंकि वो स्त्री है
सृजन करती है दर्द सहकर
विनाश भी कर सकती है काली बनकर
वो शक्ति है जग की
उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता
समाज ने डाली बेड़िया पैरों में उसके
ताकि उसकी उड़ान रोक सके
पर बहती हवा को
कौन रोक पाया है आज तक
उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता
कोई मन्नत नहीं मांगी जाती
फिर भी वो जीती है ज्यादा
बोये जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियां
स्प्रिंग देखी है कभी आपने
जितना दबाओं उतना उछलती है
स्त्री की असीम शक्ति से डर
लगाई पाबंदी पुरूष समाज ने
पर वो शक्ति और अधिक मुखरित हुई
अपनी राह खुद बनाई
वो चांद पर जा वापिस आयी
हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया
नभ अपने कदमों में झुकाया
क्योंकि वो स्त्री है
हार नहीं सकती
परिस्थितियां अनुकूल भले न हो
वो लडऩा जानती है
वो स्त्री है
हर सीमा से परे
हर बाधा उससे डरे
वो कुछ भी कर सकती है
शक्ति बिना शिव अधूरे
शक्ति से हो सारे कार्य पूरे
कण कण में व्याप्त है जो
जो ऊर्जा जो प्राण है
वो स्त्री है
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली