Hindi Quote in Poem by Ahad Rayeen

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इस्पात की आवाज़

तितलियाँ उसके गालों पर मँडराती,
जैसे मँडराती वे सरसों के फूलों पर।
पंखों से हवा में तैरती, चूमती बदन,
तैरते चुराती हैं हृदय और फूलों से रस।
मार बड़ी सावधानी से मारती, उड़कर
फ़िज़ा में उड़ाती महक, देती छाँव शीतल।
मुस्कान मीठी सी खिलखिलाती छुपाती
हाथों को मुख पर रख सदैव नाक चिढ़ाती।
घने बादल घिर आते, माहौल मलमली
ताड़क उसके अढंगे रूप से रूबरू करवाती।
जलन वायु दुपट्टे को उड़ाती, मुखौटा हटाती
समेटे स्वयं को नौजवान बाला अष्टावक्र सी
उससे ही ज्ञान, व्यवहार सी, फिर से चहकती।
मान में सागर सी दृढ़, शिथिल में मोम,
हाथों के स्पर्श में आटे सी गुड़िया के मेल
नथनी मादक घोले मन-मंदिर पट खोलते।
मिलने उँगलियाँ बढ़ीं छूने स्वयं सा अन्य रूप
इस्पात की छड़ें हिलीं, टक की आवाज़ गूँजी,
हैरत ताकती निगाहें लड़ीं, बूँदें रीसी तरंगिनी।
मिलने उठी ताकत झोंककर, बाला बल पकड़कर
इस्पात फिर टकराया, नींव बजी उसे छूकर
वह मुस्कुराई—सौंदर्य महबूब मेरे, तुम कागज़ भरो बैठकर।
©DSR

Hindi Poem by Ahad Rayeen : 112033686
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