Hindi Quote in Poem by Digvijay Singh Rathore

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दूध की हल्की महक

गुलाब के गले लगे,
अब उसी में लिपटकर
महकते जा रहे,
अंजुली की बूंदों से सींचे
उन्हीं से अमृत पा रहे।
पलके थाम देखते तारे को
दिनों-दिन, तीज-त्योहार
अब साज में सितारे फलक जा रहे।
किवाड़ की कुंडीयाँ दस्तक देतीं,
मौन हेतु शांति से विदा पा रहे।
फूलों के टुकड़े बदन पर मलते,
घी से वे अब नहलाते जा रहे।
हिना फबे, चूड़ियों की खनक सुनाते
वे मूक से कंधा दिए चले जा रहे।
शहर गुलाबी हुआ करते थे,
वो मुट्ठियों से राय उड़ाते जा रहे।
रंगीन फ्रेम में कसके पकड़े हैं,
दो हंसों का जोड़ा,
उस पर माला चढ़ाते जा रहे।
हल्की महक है, दूध में तेरे
सामने जलते लोबान, बत्तियों से
वही महक सभी पा रहे।
हाँ, गुलाब के गले लगे,
अब उसी में लिपटकर
महकते जा रहे।
©DSR

Hindi Poem by Digvijay Singh Rathore : 112033604
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