हम तो मॉडर्न हैं
लोग कहते हैं अक्सर—
“हम तो मॉडर्न हैं।”
बच्चा कुछ पढ़ना चाहे,
अपनी पसंद का विषय चुने,
तो कहते हैं—
“विज्ञान लेना है या वाणिज्य,
ये हम बताएँगे।”
फिर भी कहते हैं—
“हम तो मॉडर्न हैं।”
घूमने की पूरी आज़ादी है,
बस सूर्यास्त से पहले घर लौट आना।
हम तो मॉडर्न हैं।
नौकरी करो,
हम तुम्हारा पूरा साथ देंगे,
बस नौकरी हमारी शर्तों पर हो।
कितनी दूर,
किस जगह और कैसी नौकरी—
ये हम बताएँगे।
फिर भी कहते हैं—
“हम तो मॉडर्न हैं।”
जो शौक है, पूरा करो,
हम तुम्हें रोकेंगे नहीं।
लेकिन अगर कोई किताब पढ़नी हो,
तो लेखक भी हमारी पसंद का हो—
हिंदू हो, मुस्लिम नहीं।
फिर भी कहते हैं—
“हम तो मॉडर्न हैं।”
इसलिए छोटे कपड़े पहनने में
कोई दिक्कत नहीं,
बस वहाँ जहाँ
हमें जानने वाला कोई न हो।
क्योंकि...
हम तो मॉडर्न हैं।
शादी उसी से करो
जिसे तुम पसंद करती हो,
लेकिन अगर अपनी पसंद
घर लेकर आ गई,
तो हम उससे बात तक नहीं करेंगे।
बाकी बच्चों को
चाहे जितनी आज़ादी मिले,
तुम्हारे लिए कुछ नियम अलग हैं।
क्योंकि...
हम तो मॉडर्न हैं।
हम दहेज नहीं माँगते,
क्योंकि हम रूढ़िवादी सोच से आज़ाद हैं।
बस बेटी के आराम के लिए
कुछ सामान दे दिया जाए तो
उसमें बुराई ही क्या है?
पर मुझे तो लगता है,
यह सिर्फ़ एक जुमला है—
अपनी दोहरी सोच को
तर्कसंगत ठहराने का।
आज जब हम
स्वतंत्रता दिवस मनाएँ,
तो एक सवाल खुद से भी पूछें—
क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं
कि देश तो आज़ाद हो गया,
लेकिन हमारी सोच अभी भी
कुछ पुरानी बेड़ियों में बंधी है?
इस स्वतंत्रता दिवस
सिर्फ़ तिरंगा ही न फहराएँ,
अपनी सोच को भी आज़ाद करें।
अपने विचारों में,
अपनी सोच में,
और सबसे बढ़कर—
दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करने में
सच्ची आज़ादी खोजें।
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ। 🇮🇳