घर की याद
मुझे घर की बहुत याद आती है...
अक्सर।
जब एक शांत कमरे का
ताला खोलकर
उसमें अकेली दाखिल होती हूँ।
जब मेस में
कच्ची-जली रोटियाँ खाती हूँ,
तब याद आता है
घर की घी लगी रोटी को भी
नखरों से खाना।
जब अकेले चलते-चलते
अचानक गिर जाती हूँ,
तब याद आता है
पापा का वह थामा हुआ हाथ,
जो हर ठोकर से पहले
मुझे संभाल लेता था।
जब कैंटीन में
खुद ही खाना खरीदकर खाती हूँ,
तब याद आता है
भैया का बिना पूछे
पैटीज़ लाकर खिलाना।
याद आता है
वो रूठना और मनाना,
जहाँ गलती भी मेरी होती थी
और रोना भी मेरा।
फिर भी
मनाने वाले अपने ही होते थे।
आज तो अक्सर
बिना किसी गलती के भी
लोग रूठ जाते हैं,
और मनाने वाला
कोई नहीं होता।
घर बहुत याद आता है...
और सबसे ज़्यादा तब,
जब कोई त्योहार आता है।
क्योंकि वहाँ
चेहरा देखते ही
माँ समझ जाती थी
कि मुझे क्या चाहिए।
और मेरी आवाज़ सुनते ही
पापा बिना कुछ पूछे
मेरी हर परेशानी जान लेते थे।
यहाँ तो
मुस्कुराते चेहरे के पीछे छिपे आँसू भी
खुद ही पोंछने पड़ते हैं।
धीरे-धीरे
अकेले चलना,
अकेले संभलना,
और अकेले ही मुस्कुराना सीख लिया है।
पर सच कहूँ...
कुछ दूरियाँ
समय कम कर देता है,
मगर...
घर की कमी
कभी पूरी नहीं होती।
क्योंकि...
घर सिर्फ़ चार दीवारों का नाम नहीं,
घर उन रिश्तों का नाम है
जहाँ बिना कुछ कहे भी
सब कुछ समझ लिया जाता है।
"घर से दूर रहने वाला हर व्यक्ति इस एहसास को समझ सकता है।"
— दीपांशी गर्ग ✍️