इम्तिहान में बैठे हुए
बैठी थी इम्तिहान में,
प्रश्न-पत्र को देखकर
पसीने छूट गए मेरे।
इतनी घबराई,
कि नाखून संग
बाएँ हाथ की उँगली भी चबा गई।
कभी याद आया वह समय,
जिसे हँसते-खेलते यूँ ही बिता दिया।
सोचा...
काश! वह पल लौट आता।
कभी रोने का मन करता,
तो कभी इधर-उधर नज़र दौड़ाती।
सोचा...
चलो, नकल ही कर लूँ।
पर सामने खड़े अध्यापक को देखकर
हिम्मत जवाब दे गई।
फिर याद आई
बचपन में मिली सीख—
"कभी बेईमानी मत करना।"
सोचा,
चलो तुक्का ही लगा दूँ,
पर वह भी न हो पाया।
आख़िर में
ईश्वर को याद किया,
और जो मन में आया,
वही उत्तर-पुस्तिका में लिख आई।
और फिर...
जैसे-तैसे
इम्तिहान देकर घर आ गई।