शीर्षक *इश्क़ होने तो दीजिए*
नफ़रत ही सही बेफ़िक्र कीजिए,
दफ़्तरों का शहर, ज़ख़्म होने तो दीजिए।
माना कि इश्क़ में ज़िंदगी है बसी,
मगर पहले इश्क़ होने तो दीजिए...।
दौलत-शोहरत तराज़ू की तौल है,
वज़न तो बताने तो दीजिए।
इश्क़ के अँधेरे में,
मुझे डूबने तो दीजिए...।
माना कि इश्क़ इबादत है यहाँ,
मुझे इश्क़ में दफ़न होने तो दीजिए यहाँ।
क़बूल नहीं इश्क़ मुझे,
पहले इश्क़ होने के लिए फ़रमाने तो दीजिए यहाँ...।
सुना है इश्क़ में लोग घुट-घुट कर जीते हैं यहाँ?
एकतरफ़ा इश्क़ में आशिक़ पिस जाते हैं क्या यहाँ?
आशिक़ों को आशिक़ी मुझे फ़रमाने तो दीजिए।
- *एस.टी.डी. मौर्य* ✍️
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