कौन है ईश्वर?
भगवान...
यह शब्द अक्सर
मेरे मन में आता है।
और फिर
एक सवाल जन्म लेता है—
कौन है भगवान?
क्या वही,
जिसकी पूजा मंदिरों में होती है?
या वही,
जिसकी इबादत मस्जिदों में की जाती है?
या फिर वही,
जिसके आगे गुरुद्वारे में
अरदास की जाती है?
मुझे तो ऐसा नहीं लगता।
ये तो बस
हमारी आस्था के अलग-अलग रूप हैं,
हमारी कल्पना के बनाए हुए
उनके प्रतिबिंब मात्र।
ईश्वर तो एक शक्ति है,
जिसका न कोई रंग है,
न कोई रूप,
न कोई एक नाम।
हम जिस रूप में
उसे पुकारते हैं,
वह उसी रूप में
हमारे विश्वास का सहारा बन जाता है।
फिर मन में
एक और सवाल उठता है...
जब ईश्वर एक है,
तो उसके नाम पर
इतनी दूरियाँ क्यों?
जब प्रार्थनाएँ अलग हो सकती हैं,
तो दिल क्यों अलग हो जाएँ?
शायद...
धर्म हमें बाँटने के लिए नहीं,
बल्कि इंसानियत का मार्ग दिखाने के लिए बने थे।
क्योंकि अंत में
ईश्वर मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में नहीं,
उस हृदय में बसता है
जहाँ प्रेम, करुणा और मानवता जीवित रहती है।