वो पल 💖
ये पल भी मेरा, वो पल भी मेरा, पर मैं हूं कहां,
जागती राते, सोती सुबह बिछड़ गई परछाईयां...
बटोरे जो झुककर ख़ुद को बिखर से जाते हैं,
महफुज रहने की चाह में, कुछ बदल से जाते हैं,
बिना जले भी ख्वाहिशें करती है मुझमें धुआं...
ये पल भी मेरा, वो पल भी मेरा, पर मैं हूं कहां....
मोहरे लगी हैं रूह पर, हमको वक्त के घाव बताती हैं, कुछ ख़ुद से मिले, कुछ अपनो से सारा हाल सुनाती हैं, भरते नहीं अब जख्म भी, बेअसर सारी दुहाइयां....
ये पल भी मेरा, वो पल भी मेरा, पर मैं हूं कहां....
खुमार भी किया हमनें, लड़खड़ाए कदम भी चले,
कोई वफ़ा का हाथ ना मिला, बेवफईयों में जले,
बख्शा नजरों ने ख़ुद ही को, दूजा था कहां...
ये पल भी मेरा, वो पल भी मेरा, पर मैं हूं कहां....
जलाकर दो दिए हम, सारे अंधेरों से लड़ते रहे,
एक दायरें की रोशनी से उम्मीदों में पलते रहे,
ढांक लौह कांपते रहे हाथ, बेरहम थी आंधियां...
ये पल भी मेरा, वो पल भी मेरा, पर मैं हूं कहां....
हलके कदम रखे हैं, भरोसे की कच्ची सड़क पर,
दरारें दिखती रही हैं, हर राह दूर दराज नज़र पर,
आज के किस्से ही सौदागर, कल की बिसात कहां....
ये पल भी मेरा, वो पल भी मेरा, पर मैं हूं कहाँ...।।
मेरे एहसास 🥀