आईना
अक्सर कहते हैं,
आईना कभी झूठ नहीं बोलता।
पर मुझे ऐसा नहीं लगता।
आईना तो बस
हमारी सोच का प्रतिबिंब होता है।
अगर नज़र सुंदर हो,
तो हर चेहरा ख़ूबसूरत लगता है।
और अगर सोच धुंधली हो,
तो आईना भी सच नहीं दिखा पाता।
सिर्फ़ शीशा ही
आईना नहीं होता,
कुछ लोग भी
ज़िंदगी का आईना बन जाते हैं।
वे हमें
अर्श से फ़र्श तक के सफ़र से,
हमारी कमज़ोरियों और
हमारी असलियत से रूबरू कराते हैं।
और हमारे कर्म भी
हमारे व्यक्तित्व का आईना हैं।
इसलिए
हमें कभी-कभी
खुद का आईना भी बनना चाहिए।
क्योंकि दुनिया से पहले
अगर कोई हमें सही मायनों में पहचान सकता है,
तो वह हम स्वयं हैं।
आख़िर...
खुद से बेहतर निरीक्षक
खुद का कोई नहीं होता।
— दीपांशी गर्ग ✍️🌸