सूरज ढलते ही जैसे
भीतर एक भय घर कर जाता है
मेरे आसपास रहने वालों से ही
भयभीत होने लगती हूँ
लगता है जैसे
वे सभी किसी असुर की भांति मुझे देख रहे है
और समय पाते ही मेरा रक्त पी जाएंगे,
मेरी देह की नाड़ियों को खींचकर
उसी से मेरा कंठ जकड़ कर लटका देंगे मुझे
मेरी वेदना की सूली पर...
मेरे हृदय को निकाल वो उसका गमला बनाएंगे
बो देंगे उसमें एक कटीली झाड़ी और
उसके बीज में भी एक कांटा रख देंगे..
ये वही जाने पहचाने चेहरे है
जिनसे सूरज की रोशनी में,
मैं टकराने को डटकर खड़ी रहती हूँ...