English Quote in Book-Review by Vijay Pratap Shahi

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भक्ति एवं आध्यात्म के अजस्र प्रकाश से जनमानस को आलोकित करती दिव्य कृति 'श्री हनुमंत प्रकाश'*

भक्ति, वैराग्य एवं आध्यात्म की प्रमुख धारा नाथ पंथ की पुण्य भूमि, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के जाने- माने कवि, लेखक, परम सुहृदयी डॉ विजय प्रताप शाही जी से वैश्विक विभीषिका कोविड के दौरान, बहुधा मेरे संचालन में, विविध ऑनलाइन साहित्यिक पटलों पर आयोजित कवि गोष्ठियों में, साहित्यिक परिचय एवं संवाद स्थापित हुआ। कालांतर में दो-तीन बार, गोरखपुर में आयोजित मंचीय साहित्यिक कार्यक्रमों में उनका स्वल्पावधि साक्षात दर्शन एवं कतिपय विमर्श भी हुआ। प्रतीत हुआ कि, आप भी मेरी तरह जीवन के द्वितीय अंश में, एक शौक़ की तरह साहित्य को जीवन में गंभीरता पूर्वक उतारने के लिए संघर्षरत हैं। पारस्परिक स्नेह सूत्र मजबूत होते गये। आज उनकी सक्षम लेखनी से भारतीय जनमानस के आराध्य, अनन्य राम भक्त, पवन पुत्र हनुमान जी के जीवन वृत्त पर चौपाई, दोहा, सोरठा छंदाधारित, समग्र समर्पण भाव से नि:सृत काव्य कृति *श्री हनुमंत प्रकाश* रजिस्टर्ड पोस्ट से प्राप्त हुई। अकादमी प्रेस, दारागंज, प्रयागराज से मुद्रित छप्पन पृष्ठों, चार सर्गों का यह लघु खंडकाव्य अति विशिष्ट बन पड़ा है। अपनी बात लिखते हुए कवि ने लोकमंगल की कामना को ही इस आध्यात्मिक कृति का हेतु बताया है। प्रथम सर्ग में, मंगलाचरण के रूप में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश, ज्ञान मूर्ति सदगुरु, मां बागेश्वरी, भगवान गौरी शंकर, कलयुग आधार प्रभु श्री सीताराम व पुस्तक के प्रतिपाद्य पवनसुत की अप्रतिम अलौकिक आराधना, एक-एक पृथक सोरठा छंद के माध्यम से की गयी है। इनका अवगाहन करते ही विषय वस्तु की सार्वभौमिकता, कवि की प्रखर भक्ति भावना, कथ्य की प्राजंलता, शिल्प का सौष्ठव, सब कुछ दर्पण की तरह स्पष्ट झलकने लगता है। हृदय स्वत: श्रद्धा एवं साहित्य के आगामी सिंधु में गोते लगाने के लिए आतुर हो उठता है। एक झलक आपके लिए..
*वंदहुं बारंबार, गुरु पद पारस मनहिं मन,*
*करहिं जगत उजियार, हे सत साधक सहज बढ़ि।।*

पुस्तक में चार चौपाइयों के पश्चात एक दोहे का क्रम चार चरणों एवं 51 दोहों तक विस्तारित है, जिसका हनुमत भक्त जनमानस, पूजा करते समय, एक घंटे की अवधि में सहज ही पठन, अवगाहन कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है। लोक जीवन में प्रयुक्त अवधी भाषा में रचित यह कृति, संप्रेषणीयता की दृष्टि से अत्यंत सरल, सरस एवं प्रवाहमान है। कहीं-कहीं तो इसके अंग- उपांग तुलसीकृत श्री रामचरितमानस के ही अंश प्रतिबिंबित होते हैं यथा
*दिन दिन बढ़ै, तेज बल दूना, बुद्धि और कौशल चौगूना* *करै बाल कपि कौतुक ऐसे फूंकि पहाड़ उड़ावहिं जैसे।।*
प्रथम चरण में पिता केसरी व मां अंजनी के आंगन में पवन पुत्र के जन्म एवं बाल लीला का दिव्य वर्णन अभूतपूर्व बन पड़ा है।

*चैत्र शुक्ल, शुभ पूर्णिमा, मंगल प्रातः काल,*
*मेष लग्न चित्रा नखत, प्रगटहिं अंजनि लाल!*

इसी प्रकार फल समझ कर भगवान भानु भास्कर को ग्रास बनाने की कथा भी अत्यंत रुचिकर बन पड़ी है। बाल्य काल में बड़े-बड़े कौतुक करने वाले कपि की बाल सुलभ चेष्टाएं भी कवि की पैनी दृष्टि से ओझल नहीं हो सकी।

*गदा विश्वकर्मा से पावा,*
*यह उपहार अधिक मन भावा।।*

द्वितीय चरण में कवि अपने आराध्य के आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम जी के, जन्म से लेकर, भार्या जानकी जी एवं अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास में चित्रकूट निवास तक तथा हनुमान जी की, वानर राज सुग्रीव की रक्षार्थ ऋष्यमूक पर्वत पर आगमन की कथा का समुचित, सुघड़ वर्णन किया गया है। जिस प्रकार ऐसे श्रेष्ठ सृजन सदैव लोकमंगल की कामना से रचे जाते हैं उसी प्रकार विविध देश काल परिस्थितियों में, भगवान के धरा पर अभ्युदय का लक्ष्य इन पंक्तियों में पढ़कर सृजन की सार्थकता पर विश्वास सहज ही सुदृढ़ हो जाता है।

*जब-जब होहिं विलोपित धर्मा, छीजहिं संस्कार सत्कर्मा।।*
*अत्याचार अधर्म अनीती, कुत्सित कृत्य कुबुद्धि कुरीती।।*

अनुपम प्रकृति चित्रण भी देखते ही बनता है।

*खेत खेत हर्षित हरियाली, सरसों पीत बिछावन वाली*

प्रभु श्री राम के जन्म की शुभ बेला का वर्णन भी उतना ही मनोहारी बन पड़ा है।

*चैत्र शुक्ल नवमी तिथि, नखत पुनर्वस काल।*
*कर्क लग्न मध्याह्न शुभ, आवहिं दीनदयाल।।*

धनुष भंग में असफल राजाओं को जनक राज द्वारा धिक्कारे जाने पर, लखन लाल की गर्वोक्ति सहज ही चित्ताकर्षित कर लेती है।

*जहां एक रघुवंशी होई, अनुचित बात करै नहिं कोई।।*

पुस्तक का तृतीय चरण भी प्रथम दो चरणों के अनुरूप ही रमणीयता एवं भाव प्रवणता से आकंठ आपूरित है। पवनसुत की उनके आराध्य से भेंट, उभय के साथ-साथ पाठकों को भी भाव विह्वल करने वाली है।

*हनुमत अति विह्वल भयो, रघुपति भाव विभोर।*
*अंकवारी भरि भरि नयन, हिरदय करहिं ॲंजोर।।*

लंका दहन पर बजरंगी का रौद्र रूप भी दृष्टव्य है।

*लाल लपट विकराल विशाला, अट्टालिका जरावहिं ज्वाला।*

चतुर्थ चरण माता जानकी का पता लगाकर लौटी वानरटोली व प्रभु श्री राम के मिलन से लेकर लंका विजय के पश्चात भगवान के राज्याभिषेक तक विस्तृत है। शिल्प की दृष्टि से यह संपूर्ण काव्य अत्यंत समृद्ध प्रतीत होता है। यथोचित स्थलों पर समस्त नौ रसों का समुचित समाहार है। अनुप्रास, उपमा, रूपक व अन्य शब्दार्थालंकारों का सहज प्रयोग परिलक्षित होता है। प्रयोग की दृष्टि में कहीं भी अनावश्यक चेष्टा नहीं दिखायी पड़ती।

*अति अद्भुत अति अद्वितीय, बिपुल बीर बलवान।*
*मांगि अशीष गिरीश पुनि, करहुं हेतु प्रस्थान।‌।*

शक्ति से मूर्छित लक्ष्मण हेतु संजीवनी लाने गये बजरंगबली के विलंबित होने पर व्याकुल रघुनाथ की दशा हृदय को द्रवित कर जाती है। यहां भी आनुप्रासिक छटा शिखर छू लेती है।

*विपत्ति विचारि विचारि विलंबा, रक्ष रक्ष जगती जगदंबा।*

*लगहिं शक्ति सौमित्र हिय, कपिदल अबल अधीर।*
*दौड़हिं विलखि विक्षिप्त मति, गिरत परत रघुवीर।।*

मर्माहत करने वाली उपरोक्त पंक्तियाॅं प्रस्तर हृदय को भी विचलित करने का सामर्थ्य रखती हैं। राम रावण युद्ध के समय भाषा, भाव, भंगिमा सब परिवर्तित हो जाती है।

*लड़हिं धुरंधर रूप प्रचंडा, डोलहिं धरा फटहिं ब्रह्माण्डा।*
*युद्ध भयंकर अति घनघोरा, गगनहिं होहिं ॲंन्हार ॲंजोरा।*

अंत में मारुति नंदन का आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति समग्र समर्पण, पुस्तक को संपूर्णता के साथ-साथ सार्थकता से संपृक्त कर जाता है।

*चंचल चित सुवीर बजरंगी, रहहिं सदा रघुपति अनुषंगी।*

*भय विपत्ति बाधा हरहिं, राम नाम सत्संग।*
*करहिं मनोरथ पूर्ण सब, महावीर बजरंग।।*

मेरी दृष्टि में श्री रामचरितमानस की तरह, यह लघु ग्रंथ भी धर्मोपासकों, अध्येताओं, एवं साधकों के समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला, समुचित शांति एवं सद्गति प्रदान करने वाला है।

अंतिम पृष्ठ पर रामदूत के प्रति चार पंक्तियों का अनुपम छांदस मुक्तक, भक्ति एवं समर्पण से परिपूर्ण, पूजा में प्रतिदिन उपयोज्य दोनों आरतियां भी विलक्षण हैं।
समग्र भक्तिभाव एवं साधना से समृद्ध कवि श्री विजय प्रताप शाही जी की समर्थ लेखनी से नि:सृत इस दैवीय लघु ग्रंथ को साहित्य एवं आध्यात्म में सर्वोच्च स्थान की कामना करता हुआ, सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश से यह अकिंचन हरि नाथ शुक्ल 'हरि' गौरवान्वित एवं सम्मानित अनुभव कर रहा है। श्री हनुमंत प्रकाश का प्रकाश चतुर्दिक प्रकीर्णित हो। जय श्री हनुमान। जय जय श्री हनुमंत प्रकाश 🌹

English Book-Review by Vijay Pratap Shahi : 112031115
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