आज सोचती हूं कितनी खुशनसीब रही होगी वो रात जब ये हिंदोस्तान आजाद हुआ होगा
शायद कोई खुशी से सोया ही नहीं होगा।
अपनी आजादी का जश्न, अपने लोकतंत्र का गुमान किया होगा।
कितने ही बलिदानों के बाद मिला होगा ये लोकतंत्र।
तो मुझे अपने एक गुरु जी की कुछ सालों पहले कही बात याद आती है...कुछ साल नहीं कह सकते लगभग 14-15 साल पहले की
वो कहते थे इतना खुश होने की जरूरत नहीं है, वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर से गुलाम होगा।
मैं तब सोचा करती थी कि ऐसे थोड़ी होता है।
एक इतना शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश फिर से गुलाम कैसे हो सकता है?
फिर सोचा करती कि उतरी कोरिया में अब तक तानाशाही क्यों
है ?
वहां की जनता क्यों नहीं करती विरोध?
पर धीरे धीरे इन सभी सवालों के जवाब मिल रहे है।