और इस सफ़र में
मैंने अपनी विनम्रता,
करुणा
और इंसानियत भी खो दी।
अब एक खोखली-सी आत्मा से
भला इन सबकी उम्मीद क्या करना।
अब रिश्ते हों या ज़ख्म,
दोनों एक जैसे लगते हैं,
मौजूद, मगर बेअसर।
सबसे बड़ा शोक
किसी अपने को खो देने का नहीं होता,
सबसे बड़ा शोक
ख़ुद के भीतर के इंसान को
धीरे-धीरे मरते देखने का होता है।