दृष्य है,
अदृश्य भी है,
व्यक्त है,
अव्यक्त भी है,
आदि से,
अबतक निरंतर,
चल रहा, वह तत्व क्या है ?
शून्य से,
विस्तार में जो,
ढल रहा, वह तत्व क्या है ?
भास है,
जिससे चलित
आकाश के नक्षत्र सारे,
हर समय
करते प्रभावित,
भावनाओं को हमारे,
रोज उग कर सूर्य,
भरता है नया विश्वास हम में,
और आ कर चन्द्रमा,
भी मुस्कुराता घोर तम में,
पूछती है ज्योति,
अंधेरे तेरा अस्तीत्व क्या है ?
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही