ज़िंदगी की पुकार
न जाने क्यों रिश्ते अब
इतने कमज़ोर हो चले हैं,
कि छोटी-सी ठोकर पर
साँसों से भी मुँह मोड़ लेते हैं।
कहीं किसी बेटे की चिता जलती है,
कहीं किसी बेटी की आँखों में
बेबसी के आँसू ठहर जाते हैं।
दोष किसी एक का नहीं,
ज़रूरत है समझ, विश्वास और संवाद की।
क्योंकि एक ज़िंदगी चली जाए,
तो हार इंसानियत की होती है।