*"मेरी मिट्टी मेरा धर्म"*
मेरी मिट्टी से जो खुशबू आती है,
वो भारत माँ के आँचल की खुशबू है।
जो उंगली उठाए उस आँचल पर,
दिल मेरा पहले ही रो देता है।
मेरे मंदिर की घंटी,
मेरे मंत्र की गूंज,
इनमें साँसें बसी हैं पुरखों की,
इनका मज़ाक... ये ज़ख्म बन जाता है।
पेपर बिक गए, मेहनत बिक गई,
लाखों युवा सड़क पे इंसाफ़ माँग रहे।
परंतु दुख होता है जब इस देश का युवा कुसंगति में फंसे जाता है।
अच्छे बुरे में अंतर क्यूं न समझ पाता है।
हां हुआ है पेपर लीक ये मैं भी मानती हूं ,
परंतु इस तिलचट्टों की पार्टी की नीयत अच्छे से पहचानती हूं।
कुछ लोग मंच से धर्म का मज़ाक बनाते
देश के टुकड़े-टुकड़े की बातें बनाते
रियल आतंकियों को सलाम
हिंदू आतंकवाद का बे-सिर-पैर का जहर फैलाते।
अरे इस दहिया का विलाप सिर्फ सनातन के खिलाफ ही क्यों होता है।
नास्तिक है तो क्यों तेरे मंच पर एक धार्मिक शब्द का ही हल्ला होता है।
पर हम चुप नहीं बैठेंगे,
क्योंकि सनातन हमारी साँस है।
मैं हर उस सोच के साथ हूँ,
जो देश को पहले रखती है, धर्म का सम्मान करती है।
मैं अंधी नहीं, मैं आस्था वाली हूँ,
और आस्था पे बात आई तो चुप नहीं बैठती।
ये तिलक नहीं चमकता ये चूड़ियाँ नहीं खनकतीं,
ये कलम मेरी पहचान बोलती हैं।
सनातन है तो मैं हूँ,
सनातन से ही ये देश है।
सृष्टि तिवारी शान